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शराब बंदी से बिगड़ी राज्यों की आर्थिक सेहत, और कितना पड़ेगा असर

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दिल्ली में शराब की दुकान के बाहर सुबह से लगी भीड़ - फोटो : अमर उजाला
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शराब और शराबियों के बारे में आप चाहे जितना भला-बुरा कह लो, मगर सच्चाई 4 मई को देशभर में तब सामने आई जब 40 दिन तक घरों में बैठे लोग शराब की दुकानों पर ऐसे टूट पड़े मानों कि वे न जाने कब से प्यासे हों।

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इस अफरातफरी को देख कर साफ लग रहा था कि भले ही समाज शराब को एक बुराई मानें मगर पीने वालों के साथ ही राज्य सरकारों के लिए यह एक आवश्यक चीज है। पीने वालों के साथ ही महामारी के कारण आर्थिक संकट झेल रही राज्य सरकारों के लिए तो शराब अभिशाप नहीं बल्कि एक वरदान ही है।

बेंगलूरू के तवारेकरे क्षेत्र की दुकान से एक शख्श 4 मई को 52,841 रुपये की शराब खरीद कर ले गया। उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर में शराब की दुकान खुलते ही दुकान संचालकों द्वारा शुभ बोनी के प्रतीक के रूप में ग्राहकों पर पुष्प वर्षा का वीडियो सोशियल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।
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कर्नाटक के कोलार की एक दुकान पर जब 75 वर्षीय महिला लक्षमम्मा पहुंची तो उसे लक्ष्मी का प्रतीक मानकर दुकानदार ने उसे अपनी पहली ग्राहक बना कर सम्मानित किया ताकि दुकान पर इसी तरह धनवर्षा होती रहे।

अब तक तो पुरुष ही शराब के लिए बदनाम रहे हैं। शराबियों पर पत्नियों के उत्पीड़न का आरोप लगता रहा है, लेकिन देश के कई हिस्सों में शराब की दुकानों के आगे जहां पुरुषों की कई किमी. लंबी कतारें देखीं गई वहीं महिलाओं के लिए उनकी मांग पर अलग से लंबी कतारें सजाई गईं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो लाॅकडाउन में ढील के पहले दिन लाखों नहीं बल्कि करोड़ों देशवासी सोशियल डिस्टेंसिंग की परवाह न करते हुए शराब की दुकानों पर उमड़ते नजर आए। यही नहीं लोगों ने अगले दिन शराब की दुकानों के आगे सुबह 6 बजे से ही लाइनें लगानीं शुरू कर दीं, जबकि दुकानों को 10 बजे पूर्वाहन पर खुलना था। शराब के दीवानों को न तो महामारी का डर और ना ही आर्थिक संकट की चिंता।

भारत में 16 करोड़ शराबी....

सर्वेक्षण के अनुसार देशभर में लगभग 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं - फोटो : अमर उजाला
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार देशभर में 10 से 75 साल की आयु वर्ग के लगभग 16 करोड़ लोग (14.6 प्रतिशत) शराब पीते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में शराब का सबसे ज्यादा सेवन किया जाता है।

एम्स द्वारा यह सर्वे सभी 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में किया गया था, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय स्तर पर 186 जिलों के 2 लाख 111 घरों से संपर्क किया गया और 4 लाख 73 हजार 569 लोगों से इस बारे में बातचीत की गई।

कुल 12 महीनों की अवधि में लगभग 2.8 प्रतिशत यानी कि लगभग 3 करोड़ 1 लाख लोगों ने भांग या अन्य चीजों का इस्तेमाल किया। भारत में पांच में एक व्यक्ति शराब पीता है। सर्वे के अनुसार 19 प्रतिशत लोगों को शराब की लत है।

जबकि 2.9 करोड़ लोगों की तुलना में 10-75 उम्र के 2.7 प्रतिशत लोगों को हर रोज ज्यादा नहीं तो कम से कम एक पेग जरूर चाहिए होता है। सर्वे में पहली बार महिलाओं से जुड़े आंकड़े भी शामिल किए गए।

इसके अनुसार जहां 27 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं वहीं शराब का सेवन करने वाली महिलाओं की संख्या करीब 2 प्रतिशत है। इतना ही नहीं करीब साढ़े 6 प्रतिशत महिलाएं ऐसी भी हैं जिनकी शराब पर निर्भरता इतनी ज्यादा है कि उन्हें इलाज की जरूरत है।

शराब गृहणियों के लिए अभिशाप तो सरकार के लिए वरदान...

शराब की दुकान खुलते ही उमड़ा जन सैलाब - फोटो : फाइल फोटो
इस लाॅकडाउन में शराबियों और शराब के मामले में दकियानूसी चाहे जितनी भी हो मगर सच्चाई यह है कि राज्य सरकारों के कर राजस्व की 15 से लेकर 25 प्रतिशत तक की भरपाई शराब की ब्रिक्री से होती है। इसलिए शराबियों के परिवारों के लिए भले ही शराब एक अभिशाप हो मगर राज्य सरकारों की आर्थिकी के लिए यह एक वरदान है।

पिछले 40 दिनों से शराब की बिक्री पर रोक के चलते अकेले दिल्ली राज्य को सेकड़ों करोड़ की चपत लग गई है। राज्य के 2020-21 के बजट में आबकारी से 6,279 करोड़ का राजस्व मिलने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अब दिल्ली सरकार ने यह लक्ष्य 5,480 करोड़ का पुनरीक्षित कर दिया है।

राज्य को 40 दिन के लाॅकडाउन में ही लगभग 654 करोड़ की राजस्व हानि होने का अनुमान है। पंजाब के मुख्यमंत्री पहले ही शराब की बिक्री पर रोक से होने वाले नुकसान की भरपाई की मांग कर चुके हैं।

पंजाब के बजट में शराब से प्रतिमाह 521 करोड़ का आबकारी राजस्व अनुमानित था। कर्नाटक ने लाॅकडाउन के कारण प्रतिदिन के 50 करोड़ के हिसाब से कुल 2,050 करोड़ रुपये के आबकारी राजस्व का नुकसान होने का दावा किया है।
 

आज आबकारी विभाग का काम राजस्व अर्जित करना ही रह गया है...

शराब से 2 लाख करोड़ राजस्व मिलना था - फोटो : फाइल फोटो
शराब किसी भी राज्य सरकार की आर्थिकी को तेजी देती है। ब्रिटिश शासनकाल में जब आबकारी विभाग का गठन किया गया था तो उसका उद्देश्य शराब की अधिक से अधिक बिक्री से अधिकतम राजस्व वसूलना नहीं बल्कि शराब के अवैध व्यवसाय पर रोक के साथ ही लोगों को मद्य निषेध के लिए प्रेरित करना था।

आजादी के बाद संविधान के अनुच्छेद 47 में निरूपति सिद्वांत के अनुरूप ही आबकारी विभाग की मौलिक नीति मादक वस्तुओं के अनौषधियं उपयोग के निषेध का उन्नीयन, प्रवर्तन एवं मद्यनिषेध को प्रमुखता देना था।

लेकिन आज आबकारी विभाग का काम मद्य निषेध नहीं बल्कि केवल बिक्री बढ़ाना और राजस्व अर्जित करना ही रह गया है। उत्तराखंड जैसे राज्य में तो सरकार गांव-गांव तक मोबाइल दुकानों से शराब पहुंचा रही है जबकि यह क्षेत्र इसकी विशिष्ट परिस्थितियों के कारण काफी लंबे समय तक मद्य निषेध क्षेत्र रहा है।

एक अनुमान के अनुसार राज्य सरकारों ने वर्ष 2018-19 में प्रति माह शराब से लगभग 12,500 करोड़ का और 2019-20 में 15,000 करोड़ का राजस्व अर्जित किया। राज्य सरकारों के 2019-20 के बजट में शराब आबकारी से लगभग 1.70 लाख करोड़ का राजस्व अनुमानित था।

चालू वर्ष 2020-21 के वार्षिक बजटों में आंध्र प्रदेश, गुजरात और बिहार के अलावा देश के 16 अन्य बड़े राज्यों ने 1.65 लाख करोड़ के आबकारी कर राजस्व का लक्ष्य रखा हुआ है, जिसे हासिल करना अब बहुत दूर की कौड़ी लगता है।

कर्नाटक के आबकारी विभाग के अनुसार राज्य में प्रतिदिन लगभग 65 करोड़ की शराब बिकती है। गुजरात और बिहार, मीजोरम और नागलैण्ड में पूर्ण मद्य निषेध लागू है। जबकि आंध्रप्रदेश में भी जगन्न रेड्डी द्वारा चुनाव के समय पूर्ण नशाबंदी की घोषणा की गयी थी, मगर सच्चाई से वास्ता पड़ने पर वहां सीमित बिक्री तक वायदा समिट गया।

आंध्र प्रदेश ने इससे 2018-19 में 6,222 करोड़ का राजस्व कमाया, जबकि पूरे राज्य की कमाई 1,05,062 करोड़ रुपये थी। लेकिन विभाजन से राज्य पर 16 हजार करोड़ रुपये का कर्ज भी चढ़ गया था। देशभर में इस वर्ष 2 लाख करोड़ का आबकारी कर राजस्व हासिल करने का लक्ष्य है।
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शराबबंदी भारत में लंबे वक्त तक नहीं चली...

भारत में नशाबंदी कभी सफल नहीं हो सकी - फोटो : सोशल मीडिया
लाॅकडाउन के कारण इस लक्ष्य की प्राप्ति असंभव ही लग रही है। राज्यों के कुल कर राजस्व में शराब की बिक्री से मिलने वाले आकारी राजस्व का हिस्सा 15 से लेकर 25 प्रतिशत तक होता है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के कुल कर राजस्व में शराब का अंशदान 20 प्रतिशत से अधिक आंका गया है। जबकि केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडू के कुल कर राजस्व में शराब की बिक्री से अर्जित कर राजस्व का योगदान 10 प्रतिशत से कम है। हाल ही में राजस्थान ने आबकारी कर राजस्व में 10 प्रतिशत की वृद्धि की है।

इतिहास गवाह है कि है कि शराबबंदी भारत में लंबे वक्त तक नहीं चली। जीएसटी आने के बाद शराब से होने वाला राजस्व राज्य सरकारों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। मोरारजी देशाई के नेतृत्व में 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार केंद्र में बनी थी तो राष्ट्रीय स्तर पर मद्य निषेध की नीति बनी थी जो कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे केवल उन राज्यों में लागू की गई जहां जनता पार्टी की सरकारें बनीं थीं।

लेकिन जनता पार्टी की सरकार के पतन के साथ ही मद्य निषेध भी चलता बना। वर्तमान में गुजरात, बिहार, मिजोरम और नागालैंड में पूर्ण रूप से शराबबंदी है। बिहार में 1977 से लेकर 1980 तक नशाबंदी रही जो कि अन्ततः विफल रही।

हरियाणा ने भी 1996 में राज्य में शराबबंदी का प्रयोग किया था, लेकिन 1998 में इसे हटा लिया गया। अधिकारियों ने अनुमान लगाया है कि शराबबंदी के दौरान प्रदेश राजस्व के मामले में 1200 करोड़ रुपए पीछे चला गया।

1993 में आंध्र प्रदेश में भी शराबबंदी को लेकर प्रयोग किए गए। लेकिन सितंबर 1995 में सत्ता की चाबी चंद्रबाबू नायडू के हाथों मेंआई और 1997 में उन्होंने केवल 16 महीने पहले शराब पर लगाए गए प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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