वर्तमान समय में कई बड़े उद्दमी, कलाकार, संगीतकार, टेक ब्रोज और बड़े इन्वेस्टर्स साइकेडेलिक की माइक्रोडोजिंग ले रहे हैं। उनके मुताबिक साइकेडेलिक उनकी रचनात्मकता और प्रोडक्टिविटी को बढ़ाने का सबसे कारगर विकल्प है। गौरतलब बात है कि साइकेडेलिक अभी भी गैर कानूनी और काफी ज्यादा कंट्रोवर्शियल है।
मनुष्य लंबे समय से साइकेडेलिक का सेवन करता आ रहा है। वहीं बात अगर आधुनिक साइकेडेलिक की करें, तो इसकी शुरुआत साल 1943 में हुई। स्विस कैमिस्ट डॉक्टर अलबर्ट हॉफमैन रेसपाइरेटरी सिस्टम से जुड़े एक बेहद ही खास ड्रग पर काम कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने पाया कि इस ड्रग का काफी अलग प्रभाव मानव शरीर पर पड़ता है।
ट्रायल के दौरान अचानक ड्रग का कुछ हिस्सा हॉफमैन की उंगलियों पर जा गिरा, जिसमें से ड्रग की माइक्रो क्वांटिटी उनके ब्लड स्ट्रीम में चली गई। इसके बाद जो हुआ वह वाकई हैरान करने वाला था। हॉफमैन एक ड्रीम स्टेट में चले गए। इस दौरान उन्होंने अपने आप को एक राक्षस से घिरा हुआ पाया। इस ट्रिप के समय हॉफमैन ने एक डायन (Witch) को भी देखा।
ट्रिप के बाद जब हॉफमैन वापस आए, तो उन्हें प्रकृति के साथ एकात्म जुड़ाव की अनुभूति हुई। हॉफमैन ने जिस ड्रग का सेवन किया था। उसे बाद में लाइसर्जिक एसिड डाईथेलेमाइड (Lysergic Acid Diethylamide - LSD) के नाम से जाना गया। यही से मॉडर्न साइकेडेलिक की शुरुआत होती है।
एलएसडी एक बेहद ही खास प्रकार का ड्रग है। इसका दिमाग के सेरोटोनिन पर काफी ज्यादा असर पड़ता है। सेरोटोनिन एक खास प्रकार का कैमिकल मैसेंजर होता है, जो हमारे मूड को ठीक करने का काम करता है। हमारे दिमाग में 14 प्रकार के सेरोटोनिन रिसेप्टर होते हैं।
यही हमारी भवनाओं और अनुभूतियों को नियंत्रित करने का काम करते हैं। एलएसडी इनमें से एक सेरोटोनिन रिसेप्टर को प्रभावित करके हमारे मूड को पूरी तरह बदल देता है। ऐसे में हमारी वास्तविकता और समय को लेकर समझ पूरी तरह बदल जाती है।
व्यक्ति जब एलएसडी का सेवन करता है। उसके बाद वह एक ड्रीम स्टेट में चला जाता है। इसी प्रक्रिया को एलएसडी ट्रिप के नाम से जाना जाता है। ट्रिप के दौरान जिन अनुभवों से व्यक्ति गुजरता है। वह कई बार काफी खूबसूरत होते हैं, तो कई बार काफी ज्यादा डरावने। ट्रिप डरावनी होगी या खूबसूरत यह व्यक्ति की मानसिक अवस्था पर निर्भर करती है।
साल 1960 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजी के प्रोफेसर टीमोथी लियरी (Timothy Leary) मैक्सिको में एक बेहद ही खास तरह का रिसर्च कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक मशरूम का सेवन किया, जिसमें सिलोसाइबिन (Psilocybin) नामक कैमिकल था।
अपने इस एक्सपीरियंस को साझा करते हुए टीमोथी कहते हैं - इन मशरूम का सेवन करने के बाद मेरा पहला अनुभव यह था कि इससे मेरी रचनात्मकता और चीजों को लेकर समझ पहले के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ गई। मैंने मनोविज्ञान (Psychology) के क्षेत्र में जितना पिछले 16 सालों में पढ़ा और सीखा था। मशरूम का सेवन करने के बाद इसको लेकर मेरी समझ पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ गई।
ऐसे में सवाल उठता है क्या साइकेडेलिक ड्रग्स (LSD, Psilocybin etc) को पार्टी ड्रग्स की बजाए मनोचिक्तसा और व्यक्ति की मानसिक अवस्था को सुधारने के क्षेत्र में उपयोग किया जा सकता है? इसका जवाब है हां, इसको लेकर बड़े बड़े रिसर्च संस्थानों में कई तरह के ट्रायल्स को अंजाम दिया जा रहा है।
मनोचिकित्सा के क्षेत्र में साइकेडेलिक को लेकर अभी कोई विकसित समझ स्थापित नहीं हुई है। इसको लेकर अभी क्लीनिकल ट्रायल ही किए जा रहे हैं। हालांकि, इन क्लीनिकल ट्रायल में साइकेडेलिक थैरेपी के नतीजे काफी शानदार हैं। आज दुनिया भर में जब एक बड़ी आबादी अवसाद, डिप्रेशन और तनावग्रस्त जीवन जी रही है। ऐसे में साइकेडेलिक के क्षेत्र में की जा रही ये खोजें आने वाले समय में मनोचिक्तसा के क्षेत्र में एक क्रांति ला सकती हैं।
डिस्कलेमर - यह लेख साइकेडेलिक का किस तरह से साइकोथैरेपी में इस्तेमाल किया जा सकता हैै। उसको लेकर लिखा गया है। इस लेख में अमर उजाला किसी भी प्रकार के ड्रग्स के सेवन को बढ़ावा नहीं देता है। मेडिकल साइंस की दिशा में इन ड्रग्स को लेकर जो खोज और ट्रायल किए जा रहे हैं उन तथ्यों का जिक्र इस लेख में किया गया है।
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