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स्मृतिशेष: पुष्पेंद्र ! तुम्हारा इस तरह जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा

सार

बीते दिनों दुष्यंत संग्रहालय में मुझे पुष्पेंद्र को सम्मानित करने का अवसर मिला था। उस दिन वे तनिक भावुक थे, देर तक हम दोनों पुराने दिनों की पत्रकारिता और कुछ निजी सुख-दुख की बातें करते रहे।
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पुष्पेंद्र पाल सिंह - फोटो : AmarUjala
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विस्तार
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अभी तो मिले थे, हरीश पाठक आए थे  उसी शाम पलाश में ही देर तक गपशप हुई थी। देर से आए थे तुम और देर तक ठहरे भी थे, लेकिन तुम्हारा फ़ोन उस दरम्यान भी बजता ही रहा। बहुत हो गया तो मैंने तनिक खीझ कर कहा ,भाई! बहुत हो गया । दफ़्तर का तनाव मित्रों की महफिल में क्यों लेकर आते हो। सारा मजा किरकिरा हो जाता है। तुम अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ बोले," माध्यम का कुछ अर्जेंट काम चल रहा है। देर रात तक चलेगा"।

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मैने पूछा ऐसा महीने में कितने दिन होता है? तुमने फिर हँसते हुए कहा ,"भाई साब! कुछ ठिकाना नहीं। महीने भर ही चलता रहता है"। मैंने कहा ,"भाई,कुछ सेहत का ध्यान रखो। कोविड के बाद से कुछ ठिकाना नहीं,इसलिए थोड़ी सावधानी जरूरी है"। तुम फिर मुस्कुराए, कहा कुछ नहीं  हमने फिर विषय बदल दिया । पुष्पेंद्र से यही मेरी अंतिम मुलाकात थी ।

याद है पुष्पेंद्र से पहली मुलाकात

पहली बार मेरी भेंट शायद सागर में हुई थी, सन 1990 या एकाध साल पहले दादा भुवन भूषण देवलिया जी के साथ। छतरपुर से भोपाल जाते समय दादा से मिलना चाहता था। उनके पास पहुंचा तो उन्होंने पुष्पेंद्र को भी बुला लिया। नौजवान पुष्पेंद्र समाजवादी सोच का झंडा उठाए, एकदम सहज और शिष्ट। मैं उन दिनों जयपुर नवभारत टाइम्स में मुख्य उपसंपादक था । जब छुट्टियों में छतरपुर आता तो कभी-कभी भोपाल होते हुए लौटता था। पुष्पेंद्र मुझसे करीब पांच साल छोटे थे, इसलिए मेरे लिए वे पुष्पेंद्र और उनके लिए मैं भाई साब बना रहा। पीपी कभी जबान पर आया ही नहीं ।

दूसरी मुलाकात भी याद आ रही है। मैं भोपाल आ चुका था और 1991 में नई दुनिया के समाचार संपादक पद से इस्तीफ़ा देकर स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहा था। पुष्पेंद्र सागर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के शिक्षक थे। प्रदीप कृष्णात्रे विभाग अध्यक्ष थे और उप्पल मैडम भी वहीं थीं। अहा ! क्या टीम थी वह। पत्रकारिता के मूल्यों और सरोकारों को समर्पित। अपने छात्रों को भी इस टीम ने अपनी तरह ही गढ़ने की कोशिश की थी। उन्हीं दिनों पुष्पेंद्र, सागर से प्रदीप कृष्णात्रे जी का एक औपचारिक पत्र लेकर आए थे, शायद 1992 का साल था। वे चाहते थे कि मैं कम से कम एक सप्ताह के लिए सागर आऊं और पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाऊं । 

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पुष्पेंद्र के अनुरोध में आग्रह कम, अधिकार अधिक था। मुझे वह अधिकार अच्छा लगा और मैंने हां कर दी। एक सप्ताह शानदार बीता। विश्वविद्यालय के विश्रामगृह में ठहरा था। रोज-रोज वहां का एक जैसा भोजन बोर करने लगा। पुष्पेंद्र को इसका अहसास हो गया। इसके बाद तो फिर शाम का घर जैसा भोजन अक्सर पुष्पेंद्र के साथ ही मिलता था। उस दौरान देश की राजनीति, आर्थिक चुनौतियां और विदेश नीति पर मंडराते काले बादल चर्चाओं का विषय हुआ करते थे। इनमें मैडम उप्पल और प्रदीप कृष्णात्रे जी भी साथ हुआ करते थे। कभी कभी उनके छात्र भी शामिल हो जाते थे। इस तिकड़ी ने अनेक अच्छे पत्रकार गढ़े।

अमिताभ श्रीवास्तव, मणि कांत सोनी,दीपक तिवारी और संदीप सोनवलकर के नाम तो मैं एकदम याद कर सकता हूं। तीनों ही आज अपने शिखर पर हैं। यह अध्यापन कार्यशाला मेरे पत्रकारिता के 35 साल के अध्यापकीय अनुभव के नजरिए से आज तक की सर्वश्रेष्ठ कार्यशाला है। उसमें मैंने पुष्पेंद्र का आदर्श शिक्षक वाला रूप देखा। 

छात्रों के प्यारे पीपी सर

इसके बाद पुष्पेंद्र और मैडम उप्पल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय आ गए। कमल दीक्षित भी जयपुर से आ चुके थे । यहां इन लोगों ने शानदार पारी खेली और अच्छे पत्रकारों की फसल तैयार की। तब तक पुष्पेंद्र छात्रों के चहेते पीपी सर बन चुके थे। करीब पंद्रह साल तक विश्वविद्यालय की प्रत्येक शैक्षणिक  गतिविधि में मेरी भूमिका रही और इसके पीछे पुष्पेंद्र ,मैडम उप्पल और कमल दीक्षित केंद्र में थे।

अफसोस, हमने तीनों को खो दिया। मैं आजतक चैनल का संपादक था तो पुष्पेंद्र लगभग हर बैच के चुनिंदा छात्रों को इंटर्नशिप के लिए भेजते थे। वे खुद उन बच्चों को लेकर आते थे और मैं उनसे कहता था कि आप पुष्पेंद्र जी के छात्र हैं? इंटर्नशिप के बाद आपको भोपाल नहीं लौटना है और न ही घर जाना है। आपको इतनी मेहनत करनी है कि वहीं नौकरी मिल जाए।

मुझे याद है कि एक छात्र रजनीकांत को लेकर वे आए थे। वह छात्र वाकई मेधावी था। मैंने उसे भी कहा था कि रजनीकांत! पुष्पेंद्र सर की इज्जत का ख्याल रखना। मैं तुमको भेज रहा हूं, बाद में वही रजनीकांत स्टार न्यूज चैनल में एक शिखर पद पर पहुंचा। यह पुष्पेंद्र का जादुई व्यक्तित्व था कि उनके सामने कोई भी छात्र हो, पैर छूकर जाता था चाहे वह कितने ही गुस्से में आया हो।

जब मैं 2005 में दिल्ली गया तो लगभग हर साल पुष्पेंद्र मुझे चुनिंदा छात्रों को इंटर्नशिप के लिए भेजते रहे। मैं जिन चैनलों का प्रमुख रहा ,वहां उन छात्रों ने पुष्पेंद्र के नाम पर इंटर्नशिप ही नहीं ,नौकरी भी पाई। 
 

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करीब एक दशक पहले की बात है एक दिन पुष्पेंद्र का फोन आया, दिल्ली आए थे, आवाज़ में तनाव था। मैंने उन्हें शाम के भोजन पर आमंत्रित किया। वे विश्वविद्यालय में वैचारिक प्रपंचों से दुखी थे और नौकरी छोड़ने के मूड में आ गए थे। मैं तब राज्यसभा टीवी का कार्यकारी निदेशक था। मैंने उन्हें तुरंत सम्मानजनक पद और वेतन का ऑफर दिया लेकिन, मेरी राय थी कि ऐसे मौके पर आपका त्यागपत्र पलायन कहा जाएगा। आप जब तंत्र से लड़ते हैं तो आप छात्रों के लिए मिसाल बन जाते हैं। पुष्पेंद्र सहमत थे वे लौट गए, लेकिन रोज ही एक बार फोन पर बात हो जाती।  बाद में एक दिन सुबह सुबह फ़ोन आया कि जनसम्पर्क और माध्यम के लिए कोई नई जिम्मेदारी ले ली है।

यूनिवर्सिटी में उनके लिए काफी दिक्कतें आ रही थीं। मैंने उस दिन भी कहा कि पुष्पेंद्र यह काम भी तुम्हारी रुचि का नहीं है, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के चलते स्वीकार कर रहे हो, लेकिन मेरा तुमको स्थायी निमंत्रण है जब चाहो,मेरे चैनल में ज्वाइन कर सकते हो। उसके बाद पुष्पेंद्र ने स्वयं को बदली भूमिका के हिसाब से तैयार कर लिया। सच कहूं, तो अंदर से नई जिम्मेदारी पुष्पेंद्र को कभी खुश नहीं रख सकी। पत्नी के नहीं रहने का झटका भी था, बड़ी मुश्किल से संभले थे, अब बेटी की चिंता रहती थी।  

बीते दिनों दुष्यंत संग्रहालय में मुझे पुष्पेंद्र को सम्मानित करने का अवसर मिला था। उस दिन वे तनिक भावुक थे, देर तक हम दोनों पुराने दिनों की पत्रकारिता और कुछ निजी सुख-दुख की बातें करते रहे। बाद में बोले, बरसों बाद आपसे इस तरह बात हुई,  मन हल्का है...। 

लेकिन आज मेरा मन हल्का नहीं है, अभी तुम अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाए थे, बहुत काम छोड़ गए हो हम लोगों के लिए। पुष्पेंद्र,  तुमको न भूल पाएंगे,  फांस चुभती रहेगी कि तुम्हें अंतिम विदाई देने नहीं आ सका। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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