करीब एक दशक पहले की बात है एक दिन पुष्पेंद्र का फोन आया, दिल्ली आए थे, आवाज़ में तनाव था। मैंने उन्हें शाम के भोजन पर आमंत्रित किया। वे विश्वविद्यालय में वैचारिक प्रपंचों से दुखी थे और नौकरी छोड़ने के मूड में आ गए थे। मैं तब राज्यसभा टीवी का कार्यकारी निदेशक था। मैंने उन्हें तुरंत सम्मानजनक पद और वेतन का ऑफर दिया लेकिन, मेरी राय थी कि ऐसे मौके पर आपका त्यागपत्र पलायन कहा जाएगा। आप जब तंत्र से लड़ते हैं तो आप छात्रों के लिए मिसाल बन जाते हैं। पुष्पेंद्र सहमत थे वे लौट गए, लेकिन रोज ही एक बार फोन पर बात हो जाती। बाद में एक दिन सुबह सुबह फ़ोन आया कि जनसम्पर्क और माध्यम के लिए कोई नई जिम्मेदारी ले ली है।
यूनिवर्सिटी में उनके लिए काफी दिक्कतें आ रही थीं। मैंने उस दिन भी कहा कि पुष्पेंद्र यह काम भी तुम्हारी रुचि का नहीं है, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के चलते स्वीकार कर रहे हो, लेकिन मेरा तुमको स्थायी निमंत्रण है जब चाहो,मेरे चैनल में ज्वाइन कर सकते हो। उसके बाद पुष्पेंद्र ने स्वयं को बदली भूमिका के हिसाब से तैयार कर लिया। सच कहूं, तो अंदर से नई जिम्मेदारी पुष्पेंद्र को कभी खुश नहीं रख सकी। पत्नी के नहीं रहने का झटका भी था, बड़ी मुश्किल से संभले थे, अब बेटी की चिंता रहती थी।
बीते दिनों दुष्यंत संग्रहालय में मुझे पुष्पेंद्र को सम्मानित करने का अवसर मिला था। उस दिन वे तनिक भावुक थे, देर तक हम दोनों पुराने दिनों की पत्रकारिता और कुछ निजी सुख-दुख की बातें करते रहे। बाद में बोले, बरसों बाद आपसे इस तरह बात हुई, मन हल्का है...।
लेकिन आज मेरा मन हल्का नहीं है, अभी तुम अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाए थे, बहुत काम छोड़ गए हो हम लोगों के लिए। पुष्पेंद्र, तुमको न भूल पाएंगे, फांस चुभती रहेगी कि तुम्हें अंतिम विदाई देने नहीं आ सका।
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