कोल आदिवासी समाज आज भी मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है।
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दरअसल, कोल आदिवासी समाज को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का बीड़ा उठाए तथाकथित ठेकेदार और संस्थाओं से लेकर फोटॉस और छपास रोग से पीड़ित नेताओं को शर्म आनी चाहिए जिनके रहते भी इस गांव में शिक्षा ,स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सूविधाओ की समुचित व्यवस्था नही हो सकी। प्रयास अधूरे रहे और आदिवासी समाज की स्थिति वैसी की वैसी ही। ना पीने का साफ पानी है, ना शिक्षा की व्यवस्था और ना ही बीमारी पड़ने पर स्वास्थ्य और चिकित्सा की सुविधा। बदलते भारत में आखिर ऐसे गांवों की सुनवाई कहां होगी?
वैसे प्रशासन की भी कम गलती नही है क्योंकि हर कार्य को धरातल पर उतारने का कार्य उन्हीं का है। हालांकि गढ़चपा ग्राम पंचायत के प्रधान धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इन आदिवासी गांवों में कुछ ठोस और सार्थक पहल की है जो देखने लायक है। लेकिन बदलते भारत और डिजिटल होते इंडिया में बहुत कुछ ऐसा है जो यहां नहीं पहुंचा है। यहां के लोगों को इंतजार है कि आखिर उम्मीद की नई रौशनी यहां कब पहुंचेगी।
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