महानगरों में ऑफिस के पास रहने का चलन बढ़ा है।
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इसी के साथ यह बात भी जोड़ी जा सकती है कि आजकल नौकरी और कामकाज के तौर तरीके भी बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। काम के घण्टे बढ़ते और समय अनियमित होता जा रहा है। कभी आप अल्ल सुबह काम पर जाते हैं तो कभी बहुत देर रात गए लौटते हैं। ज़ाहिर है कि इससे घर के और लोगों का जीवन क्रम भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। ऐसे में अगर संवेदनशील बेटियां यह तै करती हैं कि वे अलग घर लेकर रहें तो उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है और सराहा भी जाना चाहिए।
तीसरी बात जो इस सन्दर्भ में ध्यान में आती है वो है हमारे सोच में आ रहा बदलाव. जब आप किसी परिवार में रहते हैं तो एक–दूसरे का खयाल रखते हुए बहुत सारे समझौते भी करते चलते हैं। मसलन, मुझे जो खाने की इच्छा है उसे मैं यह सोच कर दबा लेता हूं कि मेरे घर वालों को अच्छा नहीं लगेगा। यह एक उदाहरण है। ऐसी अन्य बहुत सारी बातें भी हैं। लेकिन अब अपनी पसन्द नापसन्द को लेकर हम आसानी से कोई समझौता नहीं करना चाहते। मन चाहा खाना-पीना और मनचाहा पहनना ही नहीं चाहते, मनचाही तरह से अपनी ज़िन्दगी को जीना भी चाहते हैं। अपनी निजी स्पेस चाहते हैं। इस सोच के विकास में शिक्षा, आर्थिक स्वावलम्बन, परिवेश, मीडिया-सबकी अपनी-अपनी भूमिका है।
कम उम्र में ही अब लड़के-लड़कियां रिलेशन में हैं।
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बदलते भारत का बदलता समाज और आंकड़े
यहीं एक विषयांतर कर लूं. हाल ही में मुंबई की एक ई हेल्थकेयर कम्पनी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के जो आंकड़े सामने आए हैं वे भी प्रकारांतर से मेरी इसी बात की पुष्टि करते हैं। भारत के आठ महानगरों और बारह शहरों के पन्द्रह हज़ार किशोरों (13-19) पर किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार लगभग तीस प्रतिशत लड़के और अठारह प्रतिशत लड़कियां बीस साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही शारीरिक सम्पर्क बना चुके होते हैं।
और इसी सर्वेक्षण के अनुसार लड़के औसतन साढे़ पन्द्रह बरस की और लड़कियां साढे़ सोलह बरस की उम्र तक आने से पहले पहला शारीरिक सम्पर्क कर चुकते हैं। यहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाता चलूं कि कुछ समय पहले हुए इसी तरह के सर्वेक्षणों में यह उम्र इतनी कम नहीं हुआ करती थी। यानी अपनी देह को लेकर भी आज़ाद खयाली बढ़ती जा रही है। इस बात को भी ऊपर वाली बातों के साथ जोड़ कर देखा जाना ज़रूरी है।
मैं ध्यान इस बात की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं कि आज के किशोर और युवा अपनी तरह से अपनी जिन्दगी जीने के लिए अधिक से अधिक बेताब होते जा रहे हैं। भले ही अपरिपक्व अवस्था में मनचाही करने के अपने ख़तरे कम न हों, उनमें यह सोच जड़ें जमाने लगा है कि हम प्रयोग करेंगे, और अगर गलत हुए तो उसका मोल भी चुकाएंगे। इस बात पर बहुत लम्बी बहस हो सकती है कि यह कितना उचित और कितना अनुचित है, लेकिन एक यथार्थ यह भी है कि आप चाहें न चाहें, ऐसा हो रहा है और आने वाले समय में और अधिक होगा। अब देखने की बात यह है कि अपने परिवेश में आ रहे इन बदलावों को हम किस तरह लेते हैं और अगर इनमें कोई खतरे हैं तो उनका मुकाबला किस सूझ बूझ के साथ करते हैं।
श्री दुर्गाप्रसाद अग्रवाल वरिष्ठ लेखक हैं। उदयपुर के रहने वाले श्री अग्रवाल हिन्दी कथा साहित्य की आलोचना में विशेष रुचि रखते हैं। वे विविध सम-सामयिक विषयों पर भी नियमित लेखन कर रहे हैं और देश व हिन्दी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद के क्षेत्र में भी उन्होंने काफी काम किया है। विविध विषयों पर तकरीबन 10 किताबें लिख चुके श्री दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने पूर्व विदेश मंत्री श्री नटवर सिंह की संस्मरणात्मक पुस्तक 'प्रोफाइल्स एण्ड लेटर्स' का अनुवाद 'चेहरे और चिट्ठियां' शीर्षक से किया है। यह लेख उनकी अनुमति से साभार लिया गया है।
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