व्लादिमीर पुतिन (फाइल फोटो) संविधान को बदलने के लिए पुतिन देशभर में जनमत संग्रह कराएंगे। उ
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सत्ताईस साल पुराने संविधान को बदलने के लिए पुतिन देशभर में जनमत संग्रह कराएंगे। उनके पक्ष में यह जनमत संग्रह आया तो ही वे संविधान बदल सकेंगे। पुतिन ने रूस में अपनी एक चमत्कारिक छवि गढ़ी है, इसलिए नहीं लगता कि उन्हें आने वाले अनेक बरस कोई समस्या हो सकती है। इस तरह भले ही पुतिन- मेदवेदेव की जोड़ी टूटी, मगर पुतिन एक महानायक के रूप में अभी भी प्रतिष्ठित रहेंगे।
वर्तमान संविधान के मुताबिक़ एक व्यक्ति लगातार दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं रह सकता। पुतिन 2000 से 2008 तक दो बार राष्ट्रपति रहे। उस समय राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का ही होता था। इसके बाद उन्होंने 2008 में अपने साथी मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनवाया। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वे मेदवेदेव का प्रचार ख़ुद कर रहे थे और प्रचार में मेदवेदेव यह वादा कर रहे थे कि अगर वे जीते तो पुतिन को प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे।
ऐसा ही हुआ। मेदवेदेव के राष्ट्रपति रहते हुए ही उन्होंने सितंबर 2011 में राष्ट्रपति का कार्यकाल छह साल करा लिया और जब 2012 में मेदवेदेव ने इस पद पर कार्यकाल पूरा किया तो एक बार फिर पुतिन ने राष्ट्रपति की कुर्सी की शोभा बढ़ाई। छह साल बाद 2018 में उन्होंने फिर राष्ट्रपति का चुनाव जीता। इस तरह उन्हें 2024 तक तो कोई ख़तरा नहीं है। इसके बाद की पारी खेलने के संकेत उन्होंने कल अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में दे दिए हैं।
पुतिन ने अपने को महानायक के रूप में अगर स्थापित किया है तो उसके पीछे उनकी उपलब्धियां भी कम नहीं हैं। उन्होंने उस दौर में देश की कमान संभाली ,जब बोरिस येल्तसिन के कार्यकाल में यह शानदार देश जड़ता महसूस कर रहा था और नए नेतृत्व की मांग उठने लगी थी। जब व्लादिमीर पुतिन 1999 में प्रधानमंत्री बने तो अपने कार्यकाल में काफी लोकप्रियता बटोरी।
बेरोज़गारी और ग़रीबी पर क़ाबू पाया,विदेशी क़र्ज़ घटाया और देश के ख़ज़ाने में बढ़ोतरी की।उन्होंने चेचन्या और क्रीमिया को रूस का हिस्सा बनाया। अमेरिका के सामने पूरी ताक़त से खड़े रहने की वजह से पुराने दौर के सोवियत संघ जैसी स्थिति बहाल की। इन सब कारणों से पुतिन रूस के घर घर में लोकप्रिय हो गए।
आमतौर पर वर्तमान विश्व किसी अधिनायक को पसंद नहीं करता। व्लादिमीर पुतिन को आप एक तरह से सकारात्मक अधिनायक कह सकते हैं ,जिसे उनका देश पसंद करता है। एक तरह से पुतिन की मज़बूती ही रूस की ताक़त है।
सोवियत संघ के बिखरने के बाद मिखाईल गोर्बाचेफ़ की छबि एक कमज़ोर राजनेता की बन गई थी। रूस अब पुतिन चाहता था। मिखाईल गोर्बाचेफ़ नहीं। इस जन मनोविज्ञान को पुतिन ने बख़ूबी समझा है।
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