अभी हाल ही में बच्चों के यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटर के नतीजे आए हैं। अब जल्द ही सी.बी.एस.ई.के परिणाम आ जाएंगे। ये परीक्षाएं और इनके परिणाम महत्वपूर्ण होते हैं, खास इसलिए भी क्योंकि ये 10-12 वर्षों की लगातार मेहनत का फल माने जाते हैं।
इस समय बच्चों सहित पूरे परिवार का ध्यान केवल बच्चों के अंकों के उतार-चढ़ाव पर ही रहता है जिसके 99 प्रतिशत अंक आते हैं उसे 1 प्रतिशत कम आने का गम घेरता है जिसकी तीसरी पोजीशन होती है उसको दूसरी पोजीशन और दूसरे वाले को पहली रैंक ज्यादा आकर्षित करती है इसलिए खुशियों के माहौल में संतुष्टि नदारद रहती है।
अंकों के फेर में उलझी जिंदगी
हम सभी इस दौर से होकर गुजरे हैं पहले और आज के रिजल्ट आने की प्रक्रिया और परिणामों में बहुत परिवर्तन हो चुके है। पहले ज्यादातर माता-पिता, जो कम पढ़े लिखे होते थे और उन्हें मनोविज्ञान के विषय में जानकारी नहीं थी लेकिन वे बच्चों का मानसिक दबाव कम करने का काम बखूबी जानते थे।
वे 10वीं-12वीं की कक्षाएं प्रारंभ होने के साथ ही यह कहना आरंभ कर देते थे कि "पास होने भर के अंक आ जाएं बस, चाहे थर्ड क्लास ही क्यों न आए, बस पास हो जाना "ज्यादातर माता पिता सिलेबस और पढ़ाई के डेली रूटीन से भी अंजान रहते थे। उनकी प्रार्थना और दुआएंं भी बच्चे के पास होने तक ही रहती थी। शायद उनका डर उनकी ख्वाहिश से बड़ा रहता था कि कहीं बच्चों को तनाव न हो जाए।
हालांकि, पहले 60 प्रतिशत अंक आने में गांव में हफ्तों चर्चाएं हुआ करती थी, जिनके 60% अंक आते थे। उनके माता-पिता का सीना गर्व से महीनों तक फूला रहता था। इसके विपरीत अब तो 80 प्रतिशत अंक भी संतुष्टि के दायरे से बहार कर दिए गए हैं, जिसका परिणाम है की हम बच्चों में अनावश्यक दबाव बढ़ाते जा रहे हैं।
हम समझ ही नहीं पा रहे कि हम अपने बच्चों को जीवन की किस दौड़ में शामिल करा रहे हैं। जहां मंजिल पर पहुंच कर नंबर वन बने रहने की भूख उन्हें खोखला बना रही है और जीवन के आनंद से वो वंचित हो रहे हैं।
इधर, पहले भी सबसे संवेदनशील रिजल्ट के तौर पर 10-12 वीं का ही परिणाम था। हफ्तों पहले से परिवार वाले बच्चों पर नजर बनाए रखते थे। इतने पर भी बहुत सारे बच्चे परिणाम आने के पहले और बाद में आत्महत्या करने की कोशिश करते थे। कुछ के तो आत्महत्या के बाद आने वाले परीक्षा परिणाम में बहुत अच्छे नंबर भी होते थे जिन्हें देख उनके माता-पिता जीवन भर का दुःख सहन करने के लिए मजबूर हो जाते थे।
आस-पड़ोस वाले उन बच्चों का उदाहरण देकर दूसरे बच्चों को मोटिवेट किया करते थे ताकि वो कोई गलत कदम न उठाए, जिसका परिणाम होता था कि बच्चे अंकों की दौड़ में जीवन में संतुलन बनाना सीख लेते थे और बड़ी परीक्षाओं में फेल होने पर भी जीवन की परीक्षा में वे पास हो जाते थे। तब कोटा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि विभिन्न स्थानों से इतनी बड़ी संख्या में हृदय विदारक खबरे कम ही आती थी तब सबसे संवेदनशील पड़ाव 10-12वीं ही हुआ करते थे।
ऐसा नहीं है की आज के माता पिता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते हैं। बस नंबर और कैरियर की प्रतिस्पर्धा उनमें ठूस-ठूस कर भर रहे हैं जो बच्चों को खुद को समझने, समझाने का मौका नहीं देते।