शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने का फ़ैसला किया है, लेकिन कांग्रेस ने शिवसेना के इस फैसले पर निराशा व्यक्त की और कहा, "शिवसेना का यह निर्णय समझ से परे लग रहा है।" सचमुच कहा जाए तो कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया ही समझ से परे लग रही है। हालांकि यह कांग्रेस के अब तक के इतिहास के बिल्कुल अनुरूप ही है।
शिवसेना इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने आखिरकार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने का फैसला क्यों किया है, तो इसकी वजह भी साफ है। मौजूदा संकट से पैदा हुई राजनीतिक मजबूरियों के कारण ही शिवसेना प्रमुख ने द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दिया है। लिहाज़ा, कांग्रेस द्वारा इस तरह का निष्कर्ष निकालना भले ही आसान लग रहा हो, लेकिन जब मोदी, भाजपा सरकार के विरुद्ध राजनीतिक एकता समय की जरूरत है, तो कांग्रेस खुद इसके लिए तैयार नहीं है, और उसकी इस प्रतिक्रिया से एक बार फिर यह बात स्पष्ट हो गई है।
विपक्ष की हर कोशिश रही नाकाम
पिछले आठ वर्षों से कांग्रेस और विपक्ष की हर कोशिश को नाकाम करते हुए केंद्र में मोदी और बीजेपी का राज कायम है। इस सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने में विपक्षी पार्टियों को हमेशा विफलता ही हाथ लगी है।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को भाजपा सरकार ने एक झटके में खत्म ही नहीं किया बल्कि इस सीमावर्ती राज्य को दो-दो केंद्र शासित भागों में बांट दिया। अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया।
कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल में इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत नहीं थी, तो यह बात समझ में आती है। लेकिन यह मुख्य विपक्षी दल सीएए, एनआरसी के मुद्दे पर भी विपक्ष को एकजुट करने में कामयाब नहीं हुआ, कहना होगा कि उस आंदोलन की शुरुआत युवाओं ने की थी। अल्पसंख्यक समुदाय की प्रतिक्रियाएं बेहद संयमित थीं। उस आंदोलन के प्रभाव के कारण केंद्र सरकार को दो कदम पीछे हटना पड़ा।
पंजाब और उत्तर प्रदेश में किसानों के मुद्दे पर हुए विद्रोह ने पूरे देश में एक नए अवसर का मार्ग खोल दिया था। साल भर किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे रहे, लेकिन विपक्ष के घटक दल अपनी पिछली भूमिकाओं के कारण फिर से गोलबंदी नहीं कर सके।
पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव नज़दीक आते ही प्रधानमंत्री मोदी खुद पीछे हट गए, किसान विरोधी कानून वापस ले लिया। इंदिरा गांधी के बाद सबसे शक्तिशाली नेता का यूं पीछे हटना भी एक बड़ा अवसर साबित हुआ। इस कारण उत्तर प्रदेश में विरोधी पक्ष उपचुनाव हार गए।
पंजाब में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद उसे हार का सामना करना पड़ा। भाजपा ने आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता का दरवाजा खोल दिया। दलितों पर अत्याचार और अल्पसंख्यकों की मॉब लिंचिंग के मामलों से भाजपा और संघ परिवार बड़ी सफाई से खुद को अलग करने में कामयाब हो गई।
बिहार के बेलची गांव में दलित हत्याकांड के बाद इंदिरा गांधी हाथी पर सवार होकर वहां पहुंची थीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के हाथरस गांव गए ज़रूर, लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिदृश्य से पहले ही गायब हो चुकी कांग्रेस पर दलितों का विश्वास खत्म हो चुका था।
अब मुस्लिम समुदाय के खिसकते जनाधार को कांग्रेस बचा पाएगी, इस बात का भी भरोसा नहीं रहा। किसान आंदोलन में भी किसानों को कांग्रेस से कोई उम्मीद नहीं थी। पिछले दस वर्षों के कांग्रेस के शासन का आर्थिक एजेंडा बहुत अलग नहीं था।