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राष्ट्रपति चुनाव: शिवसेना का समर्थन और राजनीतिक गोलबंदी, आखिर इस समीकरण के अर्थ क्या हैं?

सार

शिवसेना इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने का फैसला क्यों किया है, इसकी वजह भी साफ है। मौजूदा संकट से पैदा हुई राजनीतिक मजबूरियों के कारण ही शिवसेना प्रमुख ने यह निर्णय लिया है।
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एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को शिवसेना का समर्थन - फोटो : पीआईबी
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विस्तार
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शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने का फ़ैसला किया है, लेकिन कांग्रेस ने शिवसेना के इस फैसले पर निराशा व्यक्त की और कहा, "शिवसेना का यह निर्णय समझ से परे लग रहा है।" सचमुच कहा जाए तो कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया ही समझ से परे लग रही है। हालांकि यह कांग्रेस के अब तक के इतिहास के बिल्कुल अनुरूप ही है।

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शिवसेना इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने आखिरकार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने का फैसला क्यों किया है, तो इसकी वजह भी साफ है। मौजूदा संकट से पैदा हुई राजनीतिक मजबूरियों के कारण ही शिवसेना प्रमुख ने द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दिया है। लिहाज़ा, कांग्रेस द्वारा इस तरह का निष्कर्ष निकालना भले ही आसान लग रहा हो, लेकिन जब मोदी, भाजपा सरकार के विरुद्ध राजनीतिक एकता समय की जरूरत है, तो कांग्रेस खुद इसके लिए तैयार नहीं है, और उसकी इस प्रतिक्रिया से एक बार फिर यह बात स्पष्ट हो गई है।

विपक्ष की हर कोशिश रही नाकाम

पिछले आठ वर्षों से कांग्रेस और विपक्ष की हर कोशिश को नाकाम करते हुए केंद्र में मोदी और बीजेपी का राज कायम है। इस सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने में विपक्षी पार्टियों को हमेशा विफलता ही हाथ लगी है।
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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को भाजपा सरकार ने एक झटके में खत्म ही नहीं किया बल्कि इस सीमावर्ती राज्य को दो-दो केंद्र शासित भागों में बांट दिया। अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया।

कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल में इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत नहीं थी, तो यह बात समझ में आती है। लेकिन यह मुख्य विपक्षी दल सीएए, एनआरसी के मुद्दे पर भी विपक्ष को एकजुट करने में कामयाब नहीं हुआ, कहना होगा कि उस आंदोलन की शुरुआत युवाओं ने की थी। अल्पसंख्यक समुदाय की प्रतिक्रियाएं बेहद संयमित थीं। उस आंदोलन के प्रभाव के कारण केंद्र सरकार को दो कदम पीछे हटना पड़ा।

पंजाब और उत्तर प्रदेश में किसानों के मुद्दे पर हुए विद्रोह ने पूरे देश में एक नए अवसर का मार्ग खोल दिया था। साल भर किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे रहे, लेकिन विपक्ष के घटक दल अपनी पिछली भूमिकाओं के कारण फिर से गोलबंदी नहीं कर सके।

पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव नज़दीक आते ही प्रधानमंत्री मोदी खुद पीछे हट गए, किसान विरोधी कानून वापस ले लिया। इंदिरा गांधी के बाद सबसे शक्तिशाली नेता का यूं पीछे हटना भी एक बड़ा अवसर साबित हुआ। इस कारण उत्तर प्रदेश में विरोधी पक्ष उपचुनाव हार गए।

पंजाब में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद उसे हार का सामना करना पड़ा। भाजपा ने आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता का दरवाजा खोल दिया। दलितों पर अत्याचार और अल्पसंख्यकों की मॉब लिंचिंग के मामलों से भाजपा और संघ परिवार बड़ी सफाई से खुद को अलग करने में कामयाब हो गई।

बिहार के बेलची गांव में दलित हत्याकांड के बाद इंदिरा गांधी हाथी पर सवार होकर वहां पहुंची थीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के हाथरस गांव गए ज़रूर, लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिदृश्य से पहले ही गायब हो चुकी कांग्रेस पर दलितों का विश्वास खत्म हो चुका था।

अब मुस्लिम समुदाय के खिसकते जनाधार को  कांग्रेस बचा पाएगी, इस बात का भी भरोसा नहीं रहा। किसान आंदोलन में भी किसानों को कांग्रेस से कोई उम्मीद नहीं थी। पिछले दस वर्षों के कांग्रेस के शासन का आर्थिक एजेंडा बहुत अलग नहीं था।

इंदिरा गांधी के दौर की गोलाबंदी को समझिए - फोटो : Social Media
इसमें राहुल गांधी का कोई दोष नहीं है। मनमोहन सिंह के शासन के दौरान राहुल गांधी को सत्ता से बाहर रखने वाले जी 23 गुट ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। एक बार फिर से पूरा समूह राहुल गांधी के नेतृत्व को दोष देने के लिए एक पांव पर खड़ा है।

इंदिरा गांधी के दौर की गोलबंदी

इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल और उसके खिलाफ जनता पार्टी का विद्रोह उस समय विपक्षी दलों की एक प्रकार की गोलबंदी ही थी, लेकिन वह गोलबंदी केवल इंदिरा हटाओ के नारे से नहीं आई थी।

इंदिरा गांधी ने 1971 में जब पाकिस्तान को दो भागों में विभाजित करके बांग्लादेश का निर्माण किया था, तब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। जिस इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहा जाता था, उनकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी ने मां दुर्गा से की, लेकिन उसके बाद सिर्फ 7 सालों में देश का पूरा माहौल ही बदल गया। बिहार और गुजरात में भ्रष्टाचार विरोधी नारों ने एक युवा आंदोलन को जन्म दिया। जयप्रकाश जी के नेतृत्व में देश के तमाम विरोधी दल जनसंघ के साथ जुड़ गए।

इस तरह अंततः जनता पार्टी का जन्म हुआ। 18 महीने के आपातकाल के बाद, भारतीयों ने विद्रोह कर दिया था। इसकी शुरुआत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुई। जयप्रकाश जी ने संपूर्ण क्रांति का नारा देकर उस विद्रोह की परिणीति सत्ता परिवर्तन में कर दी।

इसे लोकतंत्र को बचाने के लिए दूसरे स्वतंत्रता संग्राम के रूप में वर्णित किया गया। वामपंथी समाजवादियों, जनसंघ और कुछ क्षेत्रीय ताकतें भी एकजुट होकर कांग्रेस के खिलाफ हो गई थीं। जनता पार्टी विभाजित हो गई, लेकिन कांग्रेस विरोध के उसी मुद्दे के आधार पर भाजपा देशभर में शक्तिशाली पार्टी बन गई। बिखर चुकी जनता पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों के क्षेत्रीय नेतृत्व को ठेंगा दिखाते हुए भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ हिंदुत्व का कार्ड खेल दिया।

आपातकाल ने लोकतंत्र का गला ही घोंट दिया था। लेकिन आजकल आपातकाल की स्थिति घोषित किए बिना ही लोकतंत्र के सभी स्तंभ ढह गए हैं।
 
अब तीन प्रमुख चुनौतियां हैं- भारतीय संविधान द्वारा अपेक्षित संघराज्य, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ और लोकतंत्र का निर्माण। इन तीनों को जबरदस्त चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में जबरदस्त अशांति है। बेरोजगारी के मुद्दे पर भारी असंतोष है। अग्निपथ पर अग्निवीरों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया की आग अभी बुझ नहीं पाई है।

संकट से घिरे किसान और बढ़ती महंगाई। इन तमाम मुद्दों के बावजूद कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोधी दल की पूरी लड़ाई व्यक्तिगत रूप से नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही केंद्रित रही है। भले ही मोदी देश का नेतृत्व कर रहे हैं, भले ही उनके नेतृत्व में भाजपा की सरकार है, लेकिन मोदी और ये मुद्दे दो अलग-अलग बातें हैं। मोदी की लोकप्रियता में अशांति और असंतोष को पचाने की ताकत है। मोदी का हर कदम विपक्ष की छवि खराब कर रहा है।

रमजान में इफ्तार के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन के साक्षी रहे एक मुस्लिम संगठन के  नेता ने देश के एक युवा नेता से कहा-
 
'तुम लोग मुसलमानों की फ़िक्र करना छोड़ दो। तुम लोग जितना ज़्यादा मोदी-मोदी करोगे, मोदी का कद उतना ही बड़ा होता जाएगा। इस देश में हिंदू सेक्यूलर थे और हैं। सवाल है, उन्हें (हिंदू बनाम मुस्लिम नैरेटिव से) कैसे बचाएं? वास्तविक मुद्दों पर तुम लोग गोलबंदी नहीं कर रहे हो।"
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यशवंत सिन्हा बनाम द्रौपदी मुर्मू - फोटो : Twitter
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा की। ये घोषणा उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार की घोषणा के बाद की। जब राजनाथ सिंह बोलने आए, तो विपक्षी दलों ने उस मौके का फायदा नहीं उठाया। थोड़ा भी इंतजार नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे भाजपा के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर दिया। यदि यशवंत सिन्हा विपक्ष की राजनीति के प्रतीक हैं तो विपक्ष के पास भाजपा से अलग विकल्प क्या है?

नड्डा ने कहा-

हमें द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा करनी पड़ रही है, क्योंकि विपक्षी दल सहमत नहीं थे। द्रौपदी मुर्मू पूर्वी भारत की रहने वाली हैं। महिला हैं और आदिवासी हैं।


भाजपा और जनता पार्टी, जनता दल के अल्पकालिक शासन को छोड़कर, देश में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार थी। आदिवासियों ने हमेशा बढ़-चढ़कर कांग्रेस को वोट दिया, लेकिन कांग्रेस ने कभी भी आदिवासियों को सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर स्थान नहीं दिया। यशवंत सिन्हा का यह बयान कि 'मेरा कार्य द्रौपदी मुर्मू से अधिक है' चौंकाने वाला है। मनुस्मृति के खिलाफ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विद्रोह पर अब सहमति जताने वाली कांग्रेस और अन्य वामपंथी दलों के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अब मनुस्मृति की भाषा बोल रहे हैं, ये बेहद चौंकाने वाली बात है।

डॉ. राधाकृष्णन और द्रौपदी मुर्मू

नड्डा ने द्रौपदी मुर्मू की तुलना डॉ. राधाकृष्णन से की। यह तुलना कुछ लोगों को शायद स्वीकार्य नहीं होगी। लेकिन अगर राधाकृष्णन राष्ट्रपति बन सकते हैं, तो द्रौपदी मुर्मू क्यों नहीं बन सकतीं? यह एक साधारण सा प्रश्न है। संघ परिवार चाहे 'वनवासी' की भाषा बोलता हो, लेकिन नड्डा ने द्रौपदी मुर्मू आदिवासी हैं, ट्राइबल हैं, इन शब्दों का उल्लेख किया। भाजपा नेता अपनी परिभाषा बदल रहे हैl  यशवंत सिन्हा की भाषा दर्शाती है की अब तक सोच बदली नहीं है l

मुर्मू के नाम की घोषणा के बाद जितनी तत्परता से नीतीश कुमार और नवीन पटनायक ने अपना समर्थन दिया, उतनी तत्परता तो छोड़िए, बाद में भी विपक्षी दल पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं हुए।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को भारत रत्न देने के लिए जनता दल सरकार को आना पड़ा। जयपाल सिंह मुंडा को भारत रत्न तो दूर की बात है, उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार भी नहीं मिला। यह बात आज भी प्रबुद्ध आदिवासी वर्ग के दिलों में ज़ख्म बनकर टीस रही है।

हॉकी के स्वर्ण युग के दौरान जयपाल मुंडा ने तीन बार भारतीय टीम का नेतृत्व किया। वे संविधान सभा के सदस्य थे। बाद में वे लोकसभा में भी आदिवासियों की प्रखर आवाज बने रहे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इस महान विद्वान के योगदान को हम आज तक पहचान नहीं दे पाए हैं और शिवसेना द्वारा द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने पर कांग्रेस के नेता 'यह समझ से परे है' ये प्रतिक्रिया देते हैं।

नीतीश कुमार और नवीन पटनायक अपने राज्य में किसी भी हाल में सामाजिक सौहार्द को बिगड़ने नहीं देते। धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर किसी तरह का समझौता नहीं करते। नीतीश कुमार भाजपा के साथ होते हुए भी सीएए, एनआरसी के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव रखते हैं। हिंदू-मुस्लिम का शोर मचाने वाली राजनीति को राज्य की सीमाओं से बाहर रखते हैं। सर्वसम्मति राजनीति के माध्यम से ओबीसी जनगणना की प्रक्रिया शुरू करते हैं।

नीतीश कुमार और नवीन पटनायक भाजपा के साथ रहते हैं या भाजपा के उम्मीदवार को समर्थन देते हैं, भाजपा के एजेंडे को नहीं। विपक्ष और विकल्प इस में व्यापक अंतर है।

जयपाल सिंह मुंडा के साथ हुए अन्याय के जख्मों पर द्रौपदी मुर्मू के समर्थन का मरहम लगाने की बजाय यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी का नमक छिड़का जा रहा है तो राजनीतिक गोलबंदी कैसे होगी?


नोट: लेखक महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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