जहां 14 देशों के 103 भाषाओं के 575 लेखक-रचनाकार एक जगह जमा हों वह बिरला और दिलचस्प साहित्य समागम तो माना ही जाएगा। इतना बड़ा ‘उत्सव’ अगर पूरी तरह व्यवस्थित भी नजर आए तो कहना ही क्या। बहरहाल, अपनी तरह के इस अनूठे चार दिवसीय आयोजन का उद्घाटन महामहित राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने किया। इस साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन ‘उन्मेष’ और ‘उत्कर्ष’ का साक्षी बना भोपाल रवीन्द्र भवन सभागार। एशिया के सबसे बड़े इस लिटररी प्रोग्राम को ‘इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टीवल’ के नाम से ‘सही ही’ पुकारा गया। साहित्य अकादेमी ने 03 से 06 अगस्त तक चलने वाले अपने इस चार दिवसीय आयोजन को नाम दिया था – ‘उन्मेष’।
ये दौर विज़ुअल्स का दौर है जहां लोगों को सिर्फ सुनना नहीं सुहाता उनकी आंखें हलचल भी देखना चाहती हैं, सो इस आयोजन में दर्शक-श्रोताओं के लिए इसका भी इंतज़ाम था। इसी सभागार में तीन दिन (03 से 05 अगस्त) तक भारत की लोक एवं जनजातीय अभिव्यक्तियों का राष्ट्रीय उत्सव भी देखने को मिला। इसमें देश भर के लोक 750 से ज्यादा कलाकारों ने शिकरकत की। 35 दलों में बंटे ये कलाकार 29 राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ‘उत्कर्ष’ शीर्षक के तहत संगीत नाटक अकादेमी नई दिल्ली और मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग इसके आयोजक थे।
उदघाटन सत्र का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने कहा कि ‘मानवता का वास्तविक इतिहास विश्व के महान साहित्य से ही मिलता है।’ उन्होंने कहा कि है। ’साहित्य के आदान-प्रदान से ही दुनिया में एक बेहतर समझ का निर्माण होता है। इस आयोजन में प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अकादेमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक भी मौजूद थे।
भोपाल के जिस रवीन्द्र भवन में ये प्रतिष्ठा आयोजन हुआ उसके नये भवन का निर्माण कुछ साल पहले ही हुआ है। नए भवन में छोटे-बड़े आयोजनों के हिसाब से अलग-अलग आकार के एकाधिक सभागार बने हैं। इन सभागारों का एक साथ समांनांतर प्रयोग होते देखना भी कम रोचक नहीं था।
यह चार दिन तक और हर रोज पूरे दिन चलने वाला आयोजन था। अलग-अलग सभागार में एक साथ कार्यक्रम चलते थे, सो सबको समेटना और उन पर बात करना संभव नहीं है। लेकिन जिन समसामयिक और साहित्यिक विषयों पर चर्चाएं और परिचर्चाएं हुईं, उनके शीर्षक विषयागत जानकारी दे देते हैं। इनकी रोचकता इनके शीर्षकों से जाहिर होती है।
उदाहरणार्थ ‘बहुभाषी कविता पाठ’ ‘सिनेमा और साहित्य पर चर्चा’ ‘ ‘सागर साहित्य पर परिचर्चा’ ‘आदिवासी कवि सम्मेलन’ ‘मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ’ ‘ भारत @ 75 पर कविता पाठ’ ‘भारत की अवधारणा’ ‘मध्य प्रदेश की गीत’ ‘बहुभाषी कहानी पाठ’ ‘युवा साहिती – नई फसल’ ‘मशीनों का उदय – लेखक विहीन साहित्य’ ‘एक नया विश्व बुनना’ ‘अनूठा पूर्वोत्त्र साहित्य’ ‘भारतीय नाटकों में अलगाव की भावना’ ‘भारतीय भक्ति साहित्य’ ‘योग साहित्य’ ‘फंतासी और विज्ञान कथा साहित्य’ ‘हाशिए का स्वर – उत्पीडि़तों का उत्थान’ ‘भारतीय लोक साहित्य की गाथा’ ‘भारत में बच्चों के साहित्य का अनुवाद’ ‘भारत में कहानी सुनाने की परंपरा’ ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता की भूमिका’ ‘वैचारिकता और साहित्य’ ‘नारीवाद और साहित्य’ ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में पुस्तकों की भूमिका’ ‘भारतीय भाषाओं में अनुवादकों के समक्ष चुनौतियां’ ‘मैं क्यों लिखता हूं/लिखती हूं’ और ‘विविधता में एकता’ इत्यादि।
इनमें से कुछ को टटोल लेते हैं
साहित्य और सिनेमा का रिश्ता सदाबहार
‘सिनेमा और साहित्य’ पर चर्चा करते हुए दिलीप कासरवल्ली ने कहा कि इन दौनों विधाओं की क्षमताएं और इनकी प्रामाणिकता अलग-अलग है। सिनेमा से साहित्य कभी गायब नहीं हो सकता। तमाम दबावों के बावजूद यह अलग-अलग रूपों में यहां आता रहेगा। कार्यक्रम की शुरूआत में त्रिपुरारी शरण ने कहा कि सिनेमा और साहित्य का रिश्ता हमेशा से रहा है और हमेशा रहेगा भी। लेकिन वह एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते। उन्होंने खासतौर पर सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ और कवि शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये साहित्य द्वारा सिनेमा में रची गई ऐसे दुनिया है जो हमारे समाज को सामने लाती है। रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने कहा कि नई तकनीक आने से सिनेमा की पूरी दुनिया बदली है, लेकिन निर्देशक पर ही निभर है। ओपी श्रीवास्तव ने कहा कि दौनों की दुनिया अलग है। रचना की कोई सीमा नहीं होती लेकिन सिनेमा एक खास समय में सीमित रहता है।
एलजीबीटीक्यु समाज के लोगों का आमंत्रण स्वागतयोग्य
बहुभाषी कविता पाठ में कार्यक्रम के अध्यक्ष कल्कि सुब्रहमण्यम ने जो कहा उससे इस कार्यक्रम की झलक मिल जाती है। उन्होंने कहा कि जहां ब्रिटिश शासनकाल में एलजीबीटीक्यू समुदाय का शोषण और उन पर अत्याचार होता था वहीं आज इस समाज के लोगों को आयोजन में बराबरी से आमत्रित किया गया है, जो स्वागतयोग्य है।
समुद्र जब शालीनता तोड़ता है तो सुनामी आ जाती है
सागर साहित्य पर परिचर्चा में मेल्विन रोड्रिग्स ने कहा कि समुद्र जब अपनी शालीनता तोड़ता है तो सुनामी आ जाती है। 1857 के युद्ध के ताप को अंडमान निकोबार ने सहा है, इसकी आत्मा की आवाज को उन्होंने कविता के माध्यम से जाहिर किया ‘ काले मन के गोरों ने मेरा नाम खराब किया, मैं अनुपम गोरा था फिर भी काला पानी नाम दिया।’ सत्र में हसित मेहता, के दामोदर राव और व्यासमणि त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।
आदिवासी गीत अंधविश्वासों का पुलिंदा नहीं हैं
‘आदिवासी कवि सम्मेलन’ में गोंडी, कैकाडी, मिज़ो, कॅकबरॅक, खासी, तिवा, देसिया आदि भाषाओं की कविता का पाठ किया गया। कहा गया कि आदिवासी कविता धरती के मूल गीत हैं। जैसा कि प्राय: कहा जाता है ये गीत अंधविश्वासों का पुलिंदा नहीं हैं। बल्कि इनमें उदात्त दर्शन और आधुनिक जीवन के चिह्नों से रहित उनकी प्राचाीन दुनिया की सूचनाएं और विविध रूप की उत्कृष्ट कविताओं का समावेश है।
कवयित्री शब्द ही आपत्तिजनक
‘मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ’ विषय पर परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए अर्जुनदेव चारण ने प्राचीन साहित्य से उदाहरण देते हुए स्वतंत्रता की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि ‘स्व’ की प्रतिष्ठा में ‘पर’ की चिंता होना बहुत जरूरी है। ‘भारत @ 75 पर कविता-पाठ’ पंजाबी कवि वनीता ने ‘रंग’ पर कविता सुनाई – जिस उम्र में मिले उसे रंगों की पहचान न थी/ जब तक उसने की रंगों की पहचान, रंगों ने अपना रंग बदल लिया। लीलाराम जगूड़ी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कवयित्री शब्द पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि कवि होने के लिए पुरूष या महिला होना आवश्यक नहीं, बल्कि व्यक्ति होना जरूरी है।
भारत की अवधारणा विषयक परिचर्चा में बात करते हुए मोहन गोहाणी ने कहा कि विविधताओं के बावजूद भी भारत की भौगोलिक संरचनाओं – नदियों, पहाड़ों जनजातीय समाजों के साथ अद्भुत है।
शिक्षा अपने आप में रचनात्मकता बढ़ाने वाली है
बिस्वा भूषण हरिचंदन ने कहा कि शिक्षा अपने आप में रचनात्मकता बढ़ाने वाली है। कार्यक्रम में देश के अनेक जाने-माने शिक्षाविदों ने भाग लिया। स्वागत उद्बोबधन में के। श्रीनिवासराव ने कहा कि संपूर्ण शिक्षा सीखने व उसे जीवन में उतारने का उपक्रम ही है।