नाबालिगों के बाल अधिकार की सुरक्षा सिर्फ कानून बनाने से नहीं होती है, उसे लागू कराने की ईमानदार इच्छाशक्ति भी बेहद जरूरी है।
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पॉक्सो अधिनियम (Protection of children from sexual offences Act – 2012) को लागू हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसका उद्देश्य बेहद साफ है- 18 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण-यौन अपराधों से बचाना, लेकिन मध्यप्रदेश जैसे राज्य में जहां बाल यौन शोषण के मामले रोजमर्रा के जीवन में लगातार प्रकाश में आते हैं वहां पुलिस की लापरवाही इस कानून की महत्ता पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर देती है।
गौरतलब है कि पिछले कई सालों से लगातार इस तरह के मामले नजर में आ रहे हैं जिसमें नाबालिग पीड़िताओं को शिकायत दर्ज करवाने के लिए थाने के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। उनकी सुनवाई नहीं हो रही। कच्ची रिपोर्ट से एफआईआऱ का सफर बहुत लंबा और मुश्किल होता है। कभी-कभी तो शिकायत पर कार्यवाही भी नहीं हो पाती है। कुछ मामलों में पीड़िता मानसिक रूप से परेशान होकर आत्महत्या जैसे भयावह कदम तक उठा लेती है। नरसिंहपुर, राजगढ़, सागर, उज्जैन जैसे जिलों से आईं घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि पीड़िताओं को कानूनी सरंक्षण की जगह व्यवस्था की बेरुखी मिली है।
प्रशासनिक और नैतिक विफलताः यह लापरवाही सिर्फ प्रशासनिक नहीं है, यह नैतिक औऱ मानवीय विफलता भी है। एक नाबालिग जब साहस करके अपने साथ हुए अपराध की रिपोर्ट करने थाने पहुंचती है तो उसे कानून और व्यवस्था दोनों से उम्मीद होती है। जब वही व्यवस्था उसकी उपेक्षा कर दे, झिड़क दे, या रिपोर्ट दर्ज करने में जानबूझ कर देरी करे तो यह न केवल उसके अधिकारों का हनन है बल्कि कानून की मूल भावना के साथ विश्वासघात भी है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने कई बार दोहराया है कि पॉक्सो के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है। इसमें देरी गंभीर अपराध मानी जानी चाहिए इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालत जस के तस हैं।
गर्भपात के लिए अदालत की राह
हालिया मामला मध्यप्रदेश के धार का है। यहां एक रेप पीड़ित नाबालिग पीड़िता पुलिस थाने के चक्कर लगाती रही लेकिन उसकी शिकायत पर प्राथमिकी भी दर्ज नहीं हुई। पीड़िता की शिकायत थी कि तिरला और राजगढ़ के बीच उसका अपहरण हुआ था। उसके बाद दुष्कर्म। दुष्कर्म के कारण पीड़िता गर्भवती हो गई थी। जब नाबालिग पीड़िता ने गर्भपात के लिए कोर्ट से इजाजत मांगी तब कोर्ट ने पूछा, केस क्यों नहीं किया। तब यह बात खुलकर सामने आई कि पुलिस ने सिर्फ चक्कर खिलाए, रिपोर्ट दर्ज नहीं की। अब हाईकोर्ट ने पुलिस से जवाब तलब किए हैं।
वहीं दूसरी ओऱ सिकलसेल की बीमारी से पीड़ित नाबालिग का गर्भपात भी नहीं हो पा रहा है। सोच-समझ भी नहीं सकते कि उसकी मानसिक औऱ शारीरिक स्थिति कितनी कमजोर होगी। क्या वह कभी इन परिस्थितियों को भुला एक सामान्य जीवन जी पाएगी। जबकि पॉक्सो कानून में साफ है कि 18 साल से कम उम्र की नाबालिग के साथ यौन संबंध रखना अपराध है ( चाहे वह मर्जी से ही क्यों ना हो)। उसके बाद भी रिपोर्ट लिखने में यह देरी, नाबालिग के साथ दूसरा अपराध ही है।
नाबालिगों के बाल अधिकार की सुरक्षा सिर्फ कानून बनाने से नहीं होती है, उसे लागू कराने की ईमानदार इच्छाशक्ति भी बेहद जरूरी है। यदि रक्षक पुलिस ही अपनी जिम्मेदारियों से इस तरह मुंह मोड़ ले तो समाज में बच्चों के लिए किसी तरह का कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचेगा। पॉक्सो कानून पर पुलिस की सुस्ती नाबालिगों के अधिकारों के साथ मजाक ही है। क्योंकि पॉक्सो कोई सुझाव नहीं कानून है। कानून की अवहेलना सिर्फ लापरवाही नहीं, बच्चों के भविष्य के साथ धोखा है।
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