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टीवी डिबेट्स: भाषा की मर्यादा को लेकर स्वयं की लक्ष्मण रेखा खींचें नेता और न्यूज चैनल

सार

यदि किसी न्यूज चैनल पर डिबेट में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन होता है तो दर्शक न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी में शिकायत कर सकते हैं, जो एक स्वतंत्र नियामक निकाय है।  शिकायत पर यह निकाय चैनलों को चेतावनी, माफीनामा, यहां तक की कार्यक्रम हटाने का आदेश भी दे सकता है।
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टीवी न्यूज - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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भारत में यदि किसी चीज का स्तर सबसे अधिक गिर गया है तो वह न्यूज चैनल्स पर डिबेट्स की भाषा है। इन डिबेट्स में मर्यादित, शालीन और संतुलित भाषा का इस्तेमाल तो दूर, बल्कि इन दिनों गाली-गलौज भी शुरू हो चुकी है। आखिरकार न्यूज चैनल्स की डिबेट्स में नेता, विशेषज्ञ और एंकर समाज को क्या संदेश दे रहे हैं?

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डिबेट्स के गिरते असर को देखकर बड़ी संख्या में दर्शक इनसे दूर होते जा रहे हैं। फिर भी न तो राजनीतिक पार्टियां अपने नेताओं को रोक रही हैं और न ही नेता खुद की भाषा पर काबू रख रहे हैं। क्या यह समय की मांग नहीं है कि न्यूज चैनल्स पर डिबेट्स के नाम पर चल रहे तमाशे पर नियमों की सख्ती की जाए। 
 

आज से ढाई दशक पहले भारत में टेलीविजन न्यूज चैनल्स की संख्या तेजी से बढ़ना शुरू हुई। उससे पहले दूरदर्शन ही एकमात्र टेलीविजन चैनल हुआ करता था, जिस पर चंद मिनटों के समाचार दिनभर में आया करते थे। डिबेट्स का स्वरूप एंकर और विशेषज्ञ के बीच संवाद तक सीमित था।

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समय के साथ टीवी न्यूज में बदलाव

प्राइवेट न्यूज चैनल्स की शुरुआत के समय परिस्थितियां थोड़ा ठीक रहीं, लेकिन जैसे-जैसे नेताओं को न्यूज चैनल का बूम और टेलीविजन पर अपना चेहरा देखकर मजा आने लगा, स्थितियों तेजी से बदलने लगीं। न्यूज चैनल्स ने भी अपने शो में की पक्ष-विपक्ष के नेताओं को बैठकर एक-दूसरे से बहस कराना शुरू कर दिया।

शुरुआत में इन डिबेट्स को देखकर आम दर्शकों को भी रस आने लगा। कुछ समय तक तो यह रस दर्शकों को मीठा-मीठा लगा, लेकिन अब यह कड़वा हो चला है। 


वैसे तो न्यूज चैनल्स की डिबेट्स में किसी गंभीर विषय पर चर्चा होनी चाहिए। ऐसी डिबेट्स में न्यूज एंकर को मध्यस्थ से लेकर निर्णायक तक की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, लेकिन अमूमन यह देखा जा रहा है कि न्यूज चैनल पर डिबेट शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक, सामाजिक जैसे गंभीर विषयों के बजाय राजनीतिक और धार्मिक विषयों पर अधिक होने लगी हैं।

युद्ध और पाकिस्तान न्यूज चैनल्स के लिए पसंदीदा विषय बन चुके हैं। इन डिबेट्स का स्याह पक्ष यह है कि नेता या विशेषज्ञ न केवल व्यक्तिगत हो जाते हैं, बल्कि भाषा के संयम को भी भूल बैठते हैं। 

शो में गाली-गलौज और हाथापाई

पिछले दिनों एक न्यूज चैनल पर ऐसी ही एक डिबेट में भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ताओं के बीच गाली-गलौज शुरू हो गई। हालांकि, पहले भी कुछ डिबेट्स में मेहमानों के बीच हाथापाई तक की नौबत आ चुकी है। केवल भारत ही नहीं, दुनिया के अधिकांश देशों में न्यूज चैनल पर डिबेट्स होती है।

अधिकांश देशों में टेलीविजन डिबेट्स में काफी गर्मागर्मी देखने को मिलती है। चूंकि, हम भारत में स्वयं को संस्कारवान कहते हैं तो बाकी देशों की अपेक्षा हमारे न्यूज चैनल्स पर डिबेट्स में संस्कार झलकने चाहिए, लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा है।

न्यूज चैनल्स के लिए भारतीय प्रेस परिषद या ब्रॉडकास्टिंग अथॉरिटी ने कुछ नियम और दिशा-निर्देश भी तय किए हैं। जैसे, एंकरों को पेशेवर प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वो संयमित-मर्यादित भाषा, निष्पक्ष व्यवहार और संयोजक की भूमिका को निभा सकें। धार्मिक या राजनीतिक विषयों से अधिक रोजगार, स्वास्थ्य, विज्ञान, पर्यावरण जैसे विषयों पर चर्चा की जाए। 

कैसे लगेगा लगाम?

यदि किसी न्यूज चैनल पर डिबेट में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन होता है तो दर्शक न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी में शिकायत कर सकते हैं, जो एक स्वतंत्र नियामक निकाय है। शिकायत पर यह निकाय चैनलों को चेतावनी, माफीनामा, यहां तक की कार्यक्रम हटाने का आदेश भी दे सकता है, लेकिन न्यूज चैनल्स निकाय की कार्रवाई को संभवतः गंभीरता से नहीं लेते हैं।

प्रसार भारती और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी समय-समय पर टेलीविजन के कंटेंट को लेकर दिशा-निर्देश जारी करते हैं। हालांकि, इन दिशा-निर्देशों का सख्त और नियमित पालन नहीं हो रहा है, जो यह साफ नजर आता है। समय की मांग है कि न्यूज चैनल्स स्वयं की एक लक्ष्मण रेखा खींचें। किसी विषय पर चर्चा या विमर्श अच्छी बात है, लेकिन मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

नेताओं का अति, कई बार डिबेट का प्रायोजित लगना और एंकरों का एक पक्षी हो जाना बेहद गंभीर विषय हैं। केंद्र सरकार को भाषा को लेकर न केवल नियमों को और सख्त करने की आवश्यकता है, बल्कि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर ऐसी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि बाकी के लिए वो एक उदाहरण बन सके।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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