प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोबारा चुनाव जीतने के बाद पहली बार मन की बात में पानी बचाने पर जमकर जोर दिया है।
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बुरहानपुर प्रशासन और खासतौर पर यहां के तत्कालीन कलेक्टर दीपक सिंह इस विरासत को सहेजने और इसके पुनर्रुद्धार में जुटे हुए हैं। उन्होंने ने ही वैज्ञानिकों की टीम को इस कुंडीधारा को देखने और इसे फिर से बुरहानपुर में पानी की सप्लाय का मजबूत आधार बनाने के लिए बुलवाया था। बता दूं कि बुरहानपुर पानी की किल्लत से जूझने वाला शहर है इसके बावजूद यहां पानी की सप्लाय का सबसे बढ़िया माध्यम अब भी यही कुंडीधारा बना हुआ है।
कैसे काम करती है कुंडीधारा
डॉ. शैलेश ने बताया की आसपास मौजूद सतपुड़ा रेंज की पहाड़ियों पर किसी जमाने में जबरदस्त जंगल हुआ करते होंगे। वर्षा का पानी इन पर्वतों की जड़ों में जाता था और फिर यहीं से रिसकर ये पानी इस अंडर ग्राउंड पानी के स्त्रोत तक पहुंचता था। पूरे शहर में बनाई गई सुरंग के जरिए फिर इसका वितरण किया जाता था।
डॉ. शैलेश के लिए ये आश्चर्य का विषय था और इसीलिए उन्होंने इस पर विस्तृत शोध का मन बनाया है। उनका मानना है कि एक जल वैज्ञानिक के तौर पर वे मानते हैं कि यदि हम इस तरह के परंपरागत् प्रयासों और यांत्रिकी की तरफ दोबारा लौटते हैं तो पानी के भरपूर स्त्रोतों को पैदा किया जा सकता है।
इसे खूनी भंडारा क्यों कहा जाता है ये तो स्पष्ट नहीं, लेकिन कहा ये भी जाता है कि पहाड़ों से शुरुआत में आने वाला पानी बिल्कुल लाल हुआ करता था और यहीं से इसके इस नाम की शुरूआत हुई। शहर भर में सुरंग के ऊपर छोटी छोटी कुंडियों का निर्माण किया गया है जो पानी को सूर्य का प्रकाश और हवा देती है जिससे पानी शुद्ध रहता है। इसके अलावा संभवतः इन्हीं कुंडियों या छोटे-छोटे कुओं के माध्यम से शहर के नागरिक पानी भी लिया करते थे।
ये हिंदुस्तान में अपने किस्म का पहला प्रयोग था हालांकि इस तरह की तकनीक ईरान-इराक जैसे देशों में प्रचलित थी। रहीम यहीं से इस तकनीक को बुरहानपुर लाए थे। शहर के लोगों को शुद्ध पेयजल देने के मकसद से उन्होंने ऐसे 8 जल संग्रहण केंद्रों का निर्माण किया था। इनमें से 2 भंडारे तो बहुत पहले खत्म हो गए थे, लेकिन 6 बहुत समय तक काम करते रहे। इस प्रणाली के अंतर्गत उस वक्त के इंजीनियर्स ने भूमिगत जल स्त्रोतों का पता लगाकर तीन जलाशयों या भंडारों का निर्माण करवाया था।
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मूल भंडारा
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सूखा भंडारा
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चिंताहरण भंडारा
इनकी ऊंचाई शहर से करीब 100 फीट ऊंची रखी गई थी ताकि ऩीचे की तरफ प्रवाह से पूरे शहर को पानी वितरित किया जा सके। कुंडी भंडारा के भीतर जाने के लिए आज भी आपको करीब 90 फीट की गहराई में उतरना पड़ता है।
एक पतली सुरंग से जाते हुए आपको कुछ डर का अनुभव भी हो सकता है लेकिन जो इसके अभ्यस्त है उनके लिए ये बहुत आम बात है। इसके भीतर उतरने की तकनीकों का भी समय समय पर विकास हुआ आजकल आप एक संकरी लिफ्ट के जरिए इसके भीतर उतर सकते हैं।
डॉ. शैलेश के मुताबिक ये उनके जीवन का एक रोमांचक अनुभव रहा और इसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे। वे कहते हैं कि अब महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि जब 400 साल पहले लोग पानी के संरक्षण को लेकर इतने जागरूक थे तो आज क्योंकि नहीं हैं? हम जितनी तेजी से पानी बर्बाद कर रहे हैं उतनी तेजी से ही ये दुनिया भी खत्म हो रही है। यदि हम जल संरक्षण को लेकर रहीम जैसे ही जागरूक हो जाएं तो एक बड़ी चुनौती से निपटने के लिए तैयार हो सकते हैं।
पानी बिना सचमुच सबकुछ शून्य है, लेकिन यदि प्राकृतिक संपदाओं को तकनीक का साथ मिले तो पानी को पर्याप्त मात्रा में संरक्षित किया जा सकता है। डॉ. शैलेश पिछले 11 सालों से सिंगापुर युनिवर्सिटी के साथ जुड़े हुए हैं। वे बताते हैं कि सिंगापुर पानी की किल्लत से बुरी तरह जूझने वाला देश था। उसके पास कोई प्राकृतिक स्त्रोत भी नहीं हैं।
चारों तरफ संमदर से घिरे इस देश ने जिस तरह खुद को पानी के मामले में स्वावलंबी बनाया है वो एक आदर्श है। उन्हें इस बात का भी आश्चर्य है कि ये जागरूकता और तकनीक 400 साल पहले बुरहानपुर जैसे शहर में भी थी। इससे यदि प्रेरणा ली जाए तो देश में पानी की किल्लत को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।
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