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पेरिस पैरालंपिक: डिप्रेशन में जा रहे युवा अवनि लेखरा से प्रेरणा लें

सार

जयपुर की अवनि लेखरा ने भारत के लिए लगातार दो पैरालंपिक में शूटिंग स्पर्धा में दो गोल्ड मैडल जीतकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। खेल के साथ अवनि को रामचरितमानस से भी शक्ति मिली है।
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अवनि ने जब पहला मैच खेला तो उसके पास खुद की राइफल तक नहीं थी। उधार की राइफल से उसने गोल्ड मैडल जीता था। - फोटो : Twitter
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विस्तार
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जयपुर की अवनि लेखरा ने भारत के लिए लगातार दो पैरालंपिक में शूटिंग स्पर्धा में दो गोल्ड मैडल जीतकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। खेल के साथ अवनि को रामचरितमानस से भी शक्ति मिली है। अवनि के पिता प्रवीण लेखरा ने स्वयं यह बात बताई। पिता प्रवीण ने बताया कि रामचरितमानस की चौपाई 'कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥' को अवनि दोहराती है। पेरिस पैरालंपिक में जाते समय भी यह चौपाई अवनि लेखरा कागज पर लिखकर ले गई है। 

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मात्र 11 साल की उम्र में यदि कोई बच्चा दुर्घटना का शिकार हो जाए और आगे की जिंदगी अपंगता में बीते तो उसका मनोबल टूट जाएगा, लेकिन अवनि लेखरा अपवाद है। वर्ष 2012 में जयपुर से धौलपुर जाते समय एक भीषण सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई अवनि एकाएक व्हीलचेयर पर आ गई थी। लग रहा था कि जीवन में आगे कोई उम्मीद नहीं है। निराशा ने चारों ओर से घेर लिया था, लेकिन परिवार ने संबल दिया। विशेषकर पिता प्रवीण लेखरा ने मनोबल बढ़ाया। टोक्यो पैरालंपिक के बाद पेरिस पैरालंपिक में अवनि ने गोल्ड मैडल जीतकर उन सभी लोगों में एक नए आत्मविश्वास का संचार किया है, जो जीवन में कहीं न कहीं निराश हो चुके हैं। 

जब सड़क हादसे के बाद बेटी व्हीलचेयर पर आ गई और निराशा में डूबी रहती थी, तब पिता ने उसे राइफल शूटिंग के प्रति प्रोत्साहित किया। मन बहलाने के लिए एक दिन शूटिंग रेंज तक ले गए। वर्ष 2015 में अवनि ने शौकिया शूटिंग की शुरुआत की। हालांकि, चुनौतियां पहाड़ जैसी बड़ी थीं। अवनि की उम्र भी बेहद कम थी। परिवार के पास संसाधन भी नहीं थे। जयपुर में शूटिंग को लेकर सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं थीं। शुरू-शुरू में अवनि को राइफल तक उठाने में परेशानी होती थी।
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अवनि ने जब पहला मैच खेला तो उसके पास खुद की राइफल तक नहीं थी। उधार की राइफल से उसने गोल्ड मैडल जीता था। 2016 का साल अवनि के जीवन में एक नया सवेरा लेकर आया। उसने स्पर्धाओं में तीन गोल्ड मैडल जीते, जिससे उसका इंटरनेशनल टूर्नामेंट के लिए चयन हो गया। वर्ष 2017 में यूएई में अवनि ने पहला वर्ल्ड कप खोला और सिल्वर मेडल जीत कर देश का मान बढ़ाया। 

टोक्यो पैरालंपिक में अवनि पहली भारतीय महिला बनीं, जिसने गोल्ड मैडल जीता। वो एक पैरालंपिक में दो मैडल (एक गोल्ड और एक ब्रॉन्ज) जीतने वाली पहली भारतीय हैं। अवनि पहली भारतीय ओलंपियन भी हैं, जिसने लगातार दो पैरालंपिक खेलों में गोल्ड मैडल जीते हैं। अवनि आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है, जो जरा सी असफलता से निराश हो जाती है। डिप्रेशन में चली जाती है। जो युवा आज डिप्रेशन में जा रहे हैं, वो अवनि की जिंदगी से सीख सकते हैं। अवनि के परिवार ने उसे बहुत सपोर्ट किया। उसी सपोर्ट की वजह से अवनि इस मुकाम पर पहुंची है। इसलिए हर परिवार की जिम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों को अकेला न छोड़ें। बच्चे को सही राह दिखाएं। 

प्रत्येक बच्चे में कुछ न कुछ अद्भुत गुण छिपे होते हैं। बस उन्हें उभारने की जरूरत है। परिवार के बाद बच्चों को दिशा देने की जिम्मेदारी समाज की है। समाज के बाद सरकार का नंबर आता है। यदि बच्चे को इन तीनों संस्थाओं से सही राह मिले तो देश का पूरा परिदृश्य ही बदल जाएगा।

आज भारत में लाखों युवा डिप्रेशन का शिकार हैं। कुछ नशे के आदी हो जाते हैं तो कुछ खुदकुशी तक कर लेते हैं। जैसे अवनि लेखरा रामचरितमानस से प्रेरणा लेती है, वैसे ही पेरिस ओलंपिक में दो ब्रॉन्ज मैडल जीतने वाली मनु भाकर श्रीमद्भगवद् गीता का नियमित पाठ करती है। युवा इन दोनों खिलाड़ियों के जीवन से सीख सकते हैं। यदि सही राह और अध्यात्म की शक्ति मिले तो हमारे युवा दुनिया जीतने का जज्बा रखते हैं।

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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