स्वाद के साथ ‘यश’ की एक दुनिया बसती है और किसी गली का परांठा तो किसी दुकान की जलेबी मशहूर हो जाती है। लेकिन स्मार्टफोन के इस दौर में स्वाद ने अपना संस्कार बदल लिया है। अब आपको बाहर जाने की जरूरत नहीं है। गली के चाट-पकोड़े से लेकर फाइव स्टार होटल के लजीज व्यंजन तक आपके दरवाजे पर दस्तक देने को बेताब हैं। आपका किचन लगातार छुट्टी के मूड में दिखता है और आप दुनिया भर के जायके में खोए जा रहे हैं। आप तक स्वाद पहुंचाने की यह अद्भुत शैली है... जो आप से महज एक क्लिक दूर है।
राधिका को ऑफिस के लिए देर हो रही थी। घर का काम भी निपटाना था, तो जल्दी-जल्दी उसने सब कुछ निपटाया और ऑफिस के लिए निकल पड़ी। आधे रास्ते में उसे याद आया, अरे, खाना ? एक पल रुककर उसने सोचा, चलो फूड एप है न? खाना बाहर से मंगवा लूंगी। देखा कितना आसान हो गया है आज के समय में पेट भर लेना।
खानपान की संस्कृति में आया यह बदलाव बहुत तेजी से हुआ है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि आज हमारे पास वक्त की कमी है। लेकिन इस कमी को स्मार्टफोन के एक क्लिक से आप पूरा कर सकते हैं। भूख लगने पर दो मिनट में मैगी का कॉन्सेप्ट फेल जरूर हो सकता है, लेकिन कुछ ही देर में एक क्लिक पर खाना आप तक आसानी से पहुंच सकता है। एक एप डाउनलोड किया और स्वाद की दुनिया आपकी मुट्ठी में।
भूख लगी हो और खाना बनाने का मन न हो या दोस्तों या परिवार के साथ किसी अच्छे रेस्तरां में जाना हो और विकल्प न चुन पा रहे हों, तो कई ऐसे मोबाइल एप हैं, जिनकी मदद आप ले सकते हैं। आपके मोबाइल पर यह फूड एप्स कई विकल्पों की पेशकश करते नजर आते हैं। यह एप्स 'रेस्टोरेंट सर्च और फूड डिस्कवरी' की थीम पर बेस्ड हैं, यानी हर तरह का खाना और आपके शहर या घर के आसपास बेहतरीन रेस्तरां कौन से हैं, यह एप आपको एक क्लिक में बता देंगे।
एक समय तक महज इक्का-दुक्का फूड डिलिवरी एप सर्विस ही हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ समय से कई नए फूड डिलिवरी एप्स ने अपनी सर्विस देनी शुरू की है। इनमें से कुछ एप्स बाजार में प्रतिस्पर्धा और ग्राहकों को लुभाने के लिए भारी छूट और नए ऑफर्स देकर इस रेस में आगे चल रहे हैं।
रेस में आगे है जोमैटो
शुरुआत में ऑनलाइन फूड डिलिवरी एप्स के नाम पर सिर्फ 'फूड पांडा' ही था, लेकिन 2008 में जोमैटो 'फूडीबे' के नाम से शुरू हुआ, हालांकि नवंबर 2010 में इसका नाम बदलकर 'जोमैटो' रख दिया गया। आज इस रेस में यह वैश्विक स्तर पर 24 देशों में मौजूद है और हर महीने पांच करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ताओं को अपनी सेवा दे रहा है। जोमैटो ने अपनी सर्विस शुरू करने के साथ ही नए यूजर्स को पहले पांच ऑर्डर्स पर 50 पर्सेंट की छूट देनी भी शुरू की थी। अब जोमैटो ने गोल्ड सदस्यता के साथ अपनी प्रीमियम सेवा भी लॉन्च की है।
300 से अधिक रेस्तरां के साथ टाई-अप
स्विग्गी का संचालन बंगलुरु के स्टार्टअप हब कोरामंगला में अगस्त 2014 से प्रारम्भ हुआ था। रेस्तरां के लिए आने वाले ऑर्डर पर कमिशन के तौर पर स्विग्गी एक प्रतिशत लेता है। शुरू में यह 200 रुपये से नीचे के ऑर्डर के लिए ग्राहकों से डिलिवरी शुल्क लेता था, लेकिन फिर कुछ महीनों में इसे हटा दिया गया। स्विग्गी पहले से ही 300 से अधिक रेस्तरां के साथ टाई-अप कर चुकी है और 1000 से ज्यादा ऑर्डरों का वितरण कर रही है।
लंबी रेस का घोड़ा
देश के तमाम शहरों में टैक्सी और बाइक की सुविधा दे रहा उबर अब अपना फूड डिलिवरी एप भी ले आया है। भारत में उबरईट्स पहली बार मई, 2017 में मुंबई में लॉन्च हुआ। पांच महीनों में ही यह सेवा दिल्ली, गुड़गांव, बंगलुरु में विस्तृत हुई। यह अपने ग्राहकों को 35 मिनट में डिलिवरी करने का वादा करता है और इसका डिलिवरी चार्ज 20 रुपये है। आप अपनी सेवा का भुगतान उबर एकाउंट से ही कर सकते हैं, इसके लिए आपको अलग से अकाउंट बनाने की आवश्यकता नहीं है।
विश्वसनीय फूडपांडा
एक समय था, जब भारतीय बाजार में ऑनलाइन फूड डिलिवरी के नाम पर सिर्फ 'फूडपांडा' ही याद आता था। फूडपांडा जर्मनी की डिलिवरी हीरो ग्रुप की ही कंपनी है, जिसके पास भारत के 100 से अधिक शहरों में 15 हजार से अधिक रेस्तरां रजिस्टर्ड हैं। 2016-17 में इसका राजस्व 62.16 करोड़ रुपये था। यह एप 45 मिनट में डिलिवरी की गारंटी देता है और यदि आपका ऑर्डर आने में थोड़ी भी देर हो जाए, तो यह दावा करता है कि आपको आपके ऑर्डर पर 100 फीसदी पूर्ण कैशबैक देगा।
कितना फ्रेश है फ्रेशमेन्यू
यह जोमैटो और अन्य एप्स के अपेक्षाकृत बाजार में नया खिलाड़ी है, लेकिन इसे ग्राहकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। फ्रेशमेन्यू क्लाउड किचन कॉन्सेप्ट पर काम करता है, जिसमें यहां से डिलीवर होने वाला भोजन किसी रेस्तरां से नहीं आता, बल्कि यहां इसे खुद बनाया जाता है। इनके अलावा, जस्टईट और फूड मिंगो जैसे कई अन्य एप्स भी हैं। ये एप्स अब हमारी जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। समय की कमी के कारण यह बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन फिर भी कभी न कभी कुछ वक्त अपने किचन में बिताने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।
विदेशी फूड चेन की शुरुआत
बात है 1990 की। भारत में हुए बड़े पॉलिसी रिफॉर्म के तहत उदारवाद अपनाया गया और विदेशी ब्राड्ंस के लिए दरवाजे खोल दिए गए थे, ताकि भारतीय बाजार को वैश्विक बनाया जा सके। इसी समय पहले विदेशी ब्रांड विंपी ने अपना आउटलेट दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में खोला था और इसके एक दशक बाद तमाम विदेशी फूड चेन की बहार आ गई।
मैकडोनाल्ड्स
सन 1398 में मैकडोनॉल्ड्स की शुरुआत की थी रिचर्ड और मोरिस डोनाल्ड भाइयों ने, लेकिन उसकी कामयाबी का श्रेय जाता है एक व्यापारी रे क्रॉक को, जो इस कंपनी के हिस्सेदार थे। उन्होंने कुछ आक्रामक व्यापारिक रणनीतियां अपनाकर दोनों भाइयों को बाहर कर दिया और उनकी इक्विटी खरीदकर कंपनी का प्रसार पूरे विश्व में किया।
केएफसी
केएफसी दुनिया की दूसरी बड़ी फास्ट फूड चेन है। इसकी शुरुआत हारलैंड सैंडर्स ने की थी। 13 वर्ष की उम्र में अनाथ हुए हारलैंड 1930 में केंटकी के एक छोटे कस्बे में आने वाले यात्रियों को फ्राइड चिकन सर्व करना शुरू किया। स्वादिष्ट और अलग मसालों से बने उनके व्यंजन को खूब पसंद किया गया और उन्होंने 'केंटकी कर्नल' की स्थापना की।
पिज्जा हट
वर्ष 1958 में डेन और फ्रेंक कार्नी नामक भाइयों ने अपने दोस्त के सुझाव पर अपने क्षेत्र कंसास में 'पिज्जा हट' की शुरुआत की थी। खास बात यह है कि उन्होंने यह नाम इसलिए चुना, क्योंकि अपने रेस्तरां के लिए जो साइन उन्होंने खरीदा था, उसमें सिर्फ नौ अक्षर ही आ सकते थे, इसलिए उन्होंने हैटनुमा लोगो के साथ यह नाम रख दिया।
शेफ, पंकज भदौरिया बताती हैं कि आज हम ज्यादा वक्त बैठे-बैठे बिता देते हैं या व्यस्त दिनचर्या के चलते वक्त न मिलने पर इन एप्स के जरिए खाना मंगवा लेते हैं। स्मार्टफोन की दुनिया में हम इतना रम गए हैं कि किचन से भी दूरी हो गई है।
शेफ, संतोष राणा कहते हैं, पारंपरिक व्यंजनों में स्वाद और सेहत दोनों होते हैं, लेकिन हम इन बातों को नजरअंदाज कर बाहर के खाने को तव्वजो देते हैं। हालांकि, कामकाजी लोगों के लिए यह मददगार है, पर स्वस्थ रहना बड़ी चीज है।