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इमरान खान का एक साल: भरोसे पर कितने खरे उतरे पाकिस्तानी पीएम

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- फोटो : अमर उजाला
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ठीक एक साल पहले अठारह अगस्त को इमरान ख़ान सत्ता में आए थे। उससे पहले उन्हें कभी भी पाकिस्तान की राजनीति में गंभीरता से नहीं लिया जाता था। बीते एक साल में उनकी हरकतों ने साबित कर दिया है कि उनकी छबि प्लेबॉय की क्यों थी और अब उन्हें यू टर्न प्राइम मिनिस्टर क्यों कहा जाता है। प्रधानमंत्री बनने से पहले वे पाकिस्तान पर अमेरिका का ग़ुलाम होने का आरोप लगाते थे।

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अपने वतन पर चीन के चंगुल में फंंसने का आरोप लगाते थे। चीनी बैंकों के पाकिस्तान में कारोबार करने और चीनी मुद्रा को पाकिस्तान में मान्यता देने का विरोध करते थे। दिवालिया होने की कग़ार पर खड़े मुल्क़ को जादुई छड़ी से अमीर बना देने के वादे करते थे।

मंंहगाई रोकने और बेरोज़गारी दूर करने के सपने दिखाते थे। अंंधेरे में डूबे रहने वाले पाकिस्तान को बिजली के उजाले से भर देने का वादा करते थे और सबसे बड़ी बात अपने देश में दिए जा रहे आतंकवाद को सरकारी संरक्षण का विरोध करते थे। आज पाकिस्तान के लोग पाते हैं कि वे सपनों के इस सौदागर के जाल में फंंसकर रह गए हैं।

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आज का पाकिस्तान इस एक बरस में इंच भर भी आगे नहीं खिसका है। - फोटो : ANI
आज का पाकिस्तान इस एक बरस में इंच भर भी आगे नहीं खिसका है। इसके उलट इमरान तानाशाही  के विकृत संस्करण के रूप में सामने आए हैं। उन्होंने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों को जेल में डाल रखा है। नवाज़शरीफ़ की बेटी जेल की सलाख़ों के भीतर हैं। पूर्व राष्ट्रपति आसफ़ अली ज़रदारी को कारागार की हवा खानी पड़ रही है। एक पूर्व राष्ट्रपति निर्वासित हैं।

कुल मिलाकर फ़ौज के हाथों में झुनझुने की तरह बज रहे इमरान का अपना अस्तित्व कुछ भी नहीं है। जिस चीनी राष्ट्रपति की पाकिस्तान यात्रा के विरोध में वे धरने पर बैठे थे और शी ज़िंग पिंग को अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी थी,उन्हींं की शरण में जाकर सुरक्षा परिषद् की बंद कमरा बैठक के लिए घुटनों के बल गिड़गिड़ाना पड़ा। सवाल यह है कि सुरक्षा परिषद् की इस बैठक से उसे क्या हासिल हुआ ?
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अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पाकिस्तान कश्मीर के मसले पर ध्यान देने के लिए हाथ जोड़ रहा है। - फोटो : Instagram
सुरक्षा परिषद् की कमरा बंद बैठक का वैसे तो कोई औपचारिक महत्व नहीं था। एक तरह से वैसी ही थी, जैसे कुछ लोग वक़्त काटने के लिए चाय पीने बैठ जाएंं। न तो ऐसी बैठक का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है और न ही बैठक में किसी सदस्य देश के बयान को रिकॉर्ड पर लाया जाता है। पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने से चीन को कुछ तो दिखावा करना ही था। वही हुआ।

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पाकिस्तान कश्मीर के मसले पर ध्यान देने के लिए हाथ जोड़ रहा है।पाकिस्तान के हुक़्मरान क्या नहीं जानते कि यह कोई फ़रमाइशी गीत सुनने का कार्यक्रम नहीं है। जिस दिन संसार की सबल ताक़तें इस पर विचार करेंगीं तो कोई एक अध्याय नहीं पढ़ा जाएगा। सारे उदाहारण खंगाले जाएंंगे। इनमें अक्साईचिन से लेकर गिलगित -बाल्टिस्तान और लद्दाख़ से लेकर पाक अधिकृत कश्मीर की जन्मपत्री को कैसे छोड़ा जाएगा ?  
 
पाकिस्तान और चीन का यह तर्क है कि कश्मीर विवादास्पद क्षेत्र है इसलिए भारत को उस पर फ़ैसले का हक़ नहीं है। कमाल की बात है कि भारत के हिस्से का कश्मीर वह विवादास्पद मानता है और अपने अवैध क़ब्ज़े वाले कश्मीर को बपौती मानता है।

यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पाकिस्तान का अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर को दो हिस्सों- आज़ाद कश्मीर और गिलगित - बाल्टिस्तान में बांंटना किस क़ानून के तहत जायज़ है? गिलगित क्षेत्र को पाकिस्तान ने 1949 में अपने देश में शामिल कर लिया था। अगर वह विवादास्पद था तो पाकिस्तान ने अपने में मिलाया कैसे? यही नहीं ,1963 में उसी विवादास्पद कश्मीर का एक टुकड़ा चीन को उपहार में दे देना किस नज़रिए से जायज़ है? वही चीन आज भारत के अंदरूनी निर्णय पर सवाल उठा रहा है।

चीन ने 1962 की जंग के बाद उसी विवादास्पद कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था।यह इलाक़ा तब से आज तक उसके नियंत्रण में है। निष्कर्ष यह है कि 1947 में भारत का बाक़ायदा हिस्सा बने इलाक़े पर हमला करके हथियाए इलाक़े को डकार कर पाकिस्तान और चीन संयुक्त राष्ट्र में एक मंच पर खड़े हैं। इन दो आक्रमणकारियों पर क्या दुनिया का कोई विधान लागू नहीं होगा? सुरक्षा परिषद् क्या आँख मूंंदकर पाकिस्तान या चीन के पक्ष में कोई व्यवस्था देगी। 

अब चीन को लीजिए। जो हिस्सा चीन को पाकिस्तान ने उपहार के तौर पर दिया और हिन्दुस्तान के लद्दाख़ का जो भू भाग 1962 की जंग के बाद चीन ने हथियाया, वहांं के निवासियों के साथ चीन ने क्या सुलूक़ किया है - कोई जानता है ? उनके आत्मनिर्णय और मानव अधिकार हनन की बात संयुक्त राष्ट्र में क्यों नहीं हो रही है ?

शिनझियांग प्रांत के दस लाख से अधिक  मुसलमान बुनियादी अधिकारों से महरूम हैं। उन्हें नज़रबंदी शिविरों में क़ैद करके रखा गया है। उन्हें कोई धार्मिक और आर्थिक आज़ादी नहीं है। उनसे कहा गया है कि वे अपने इस्लाम और क़ुरान को चीन की कम्युनिस्ट नीतियों के हिसाब से बदलें। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से जब उनकी स्थिति के बारे में पूछा जाता है तो वे मासूमियत से उत्तर देते हैं कि उन्हें चीनी मुसलामानों के बारे में नहीं पता।

दूसरी ओर म्यांमार में रोहिंग्या मुसलामानों के हाल पर वे आंंसू बहाते हैं। कश्मीर के मुसलमानों के लिए क़समें खाते हैं। यह कैसा प्रधानमंत्री पाकिस्तान को मिला है ,जो अपने देश का इतिहास नहीं जानता और अन्य देशों के घर में दख़ल देना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है।  
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।       
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