इस पुरस्कार को मिलने की सूचना के तुरंत बाद चंडीगढ़ से मेरे पापा का फोन आया। वह बहुत भावुक हो रहे थे और ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे थे। तो मैंने पापा से कहा कि आप 10 मिनट बाद फोन करिए। मेरी पत्नी भी फोन पर बहुत भावुक हो रही थी और दिक्कत यह थी कि फिल्म सिटी में जहां मैं शूटिंग कर रहा था, वहां मोबाइल सिग्नल भी ठीक से नहीं आ रहे थे तो अच्छे से बात ही नहीं हो पा रही थी। लेकिन कुछ भी हो, राष्ट्रीय पुरस्कार का किसी भी कलाकार के जीवन में अलग महत्व होता ही है। इस इज्जत का हकदार मुझे माना गया, यही अपने आप में बड़ी बात है। मेरी फिल्म को समीक्षकों ने भी सराहा और बॉक्स ऑफिस पर भी दर्शकों ने इसको दुलार दिया। सिनेमा का यह एक बहुत अच्छा दौर चल रहा है कि जो फिल्में अच्छी कमाई कर रही हैं, वे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीत रही हैं। यह वह सिनेमा है, जिसके लिए आपको दिमाग घर पर छोड़कर नहीं आना पड़ता। हिंदी सिनेमा और भारतीय सिनेमा के लिए यह काफी फायदेमंद है। इस पुरस्कार ने मुझे कई बार भावुक किया। मुझे याद आया वह पहला दिन, जब मैं मुंबई की धरती पर ट्रेन से उतरा था। हमारा थिएटर ग्रुप यहां हर साल ‘मूड इंडिगो फेस्टिवल’ में शामिल होने आया करता था। मैं पहली बार सुबह कोई पांच बजे के करीब मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा था। ज्यादातर लोग सोने की फिराक में थे, लेकिन मैं काफी पहले से जगा हुआ था। आंखों में आधी नींद के सपने थे। ये सपने अब पूरे हो रहे हैं। मैं प्लेटफॉर्म पर उतरा तो बिल्कुल फिल्मी अंदाज में मैंने मुंबई की धरती को नमन किया। मुंबई की हवा का अहसास ही मुझे बिल्कुल अलग लग रहा था। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि यह शहर मुझे यहीं बसने के लिए बुला रहा है। खास बात यह है कि मुंबई अब भी मुझे उतना ही रोमांचित करता है, जितना इसने मुझे पहले दिन किया था।
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मुंबई से मेरा पहला नाता रंगमंच के जरिए बना। मैं जो कुछ भी अब तक बना हूं, उसमें रंगमंच का ही सबसे बड़ा योगदान है। मुझे जब मौका मिला तो उसके पहले मैंने खुद को काफी तैयार किया। अब भी मैं चंडीगढ़ जाता हूं तो अपने कॉलेज के नए छात्रों से जरूर मिलता हूं। उनके साथ रंगमंच पर चर्चा करता हूं। बदलते माहौल में एक कलाकार के लिए बढ़ती चुनौतियों पर बात करता हूं और उन्हें अपनी फिल्म 'अंधाधुन' के निर्देशक श्रीराम राघवन के काम करने के तरीके भी बताता हूं।
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श्रीराम राघवन सिनेमा की एक हस्ती हैं। लेकिन, काम करने के मामले में वह बिल्कुल जमीन से जुड़े रहते हैं। वह 50 के ऊपर हैं, लेकिन उनकी सोच किसी भी 20-25 साल के लड़के जैसी है। सोच को युवा बनाए रखना ही दर्शकों से उन्हें सीधे जोड़ता भी है। वह अपने काम के लिए इतने तैयार रहते हैं कि कई बार हैरानी भी होती है। दुनिया का बेहतरीन सिनेमा वह अब भी देखते हैं। हमेशा सेट पर ऊर्जा से लबरेज रहते हैं। उनके साथ काम करते हुए कभी ऐसा नहीं महसूस होता कि वह सिनेमा में पिछले 20-25 साल से काम कर रहे हैं। हमेशा खुद को बदलते रहने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी यही खूबी और उनके साथ जुड़े लोगों की कामयाबी की असली वजह है। कामयाबी मिलने के बाद इसे दूसरों के साथ बांटने से ही इसकी खुशी बढ़ती है। मैंने जो भी मनोरंजन जगत से पाया, उसका कुछ न कुछ मैं अपने बाद आने वालों के लिए छोड़ना चाहता हूं। उन्हें एक साथी की तरह मदद करना चाहता हूं। हर युवा अपनी गली, मोहल्ला या शहर छोड़कर मुंबई नहीं आ सकता तो उसी के लिए हमने जैम इन की शुरुआत की है। मेरे साथ गाने के लिए या मेरी टीम में जुड़ने के लिए जिन लोगों ने भी हौसला दिखाया, उनका मैं शुक्रगुजार भी हूं। मुझे उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से जल्द ही हम एक नया चेहरा लोगों के सामने पेश कर पाएंगे।
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