बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग तो मई, 2023 में हिंसा भड़कने के बाद से ही उठने लगी थी। लेकिन तब तस्वीर अलग थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत और मैतेई समुदाय में उनके मजबूत पकड़ के कारण न तो बीरेन सिंह ने ऐसी मांग को कोई तवज्जो दी और न ही केंद्र सरकार या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने।
बीते करीब 21 महीनों से बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा से जूझने वाला पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर अब राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है। मैतेई और कुकी तबके के बीच लगातार भारी हिंसा के बीच ही मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने रविवार शाम को अचानक इस्तीफा दे दिया है। इससे राज्य में अटकलों और कयासों का दौर तेज हो गया है। केंद्र ने हाल में ही पूर्वोत्तर मामलों के जानकार पूर्व केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को राज्यपाल नियुक्त किया था। लेकिन उसके बाद तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच बीरेन सिंह के इस्तीफे ने राज्य को राजनीतिक अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है।
बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग तो मई, 2023 में हिंसा भड़कने के बाद से ही उठने लगी थी। लेकिन तब तस्वीर अलग थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत और मैतेई समुदाय में उनके मजबूत पकड़ के कारण न तो बीरेन सिंह ने ऐसी मांग को कोई तवज्जो दी और न ही केंद्र सरकार या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने। लेकिन अब हाल के दिनों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। पार्टी के जिन विधायकों के बूते बीरेन सिंह मजबूते से कुर्सी पर जमे थे, वही उनको कटघरे में खड़ा करने लगे थे।
पार्टी पर मजबूत पकड़ रखने वाले बीरेन सिंह बीते करीब सात-आठ वर्षों के दौरान राज्य में भाजपा के एक मजबूत नेता के तौर पर उभरे थे। वह दौर ऐसा था जब पार्टी में उनके फैसलों पर कोई सवाल नहीं उठता था। लेकिन एक पुरानी कहावत है कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी। यही वजह है कि कभी जो नेता उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे वही अब उनको आंखें दिखाने लगे थे। इनमें विधानसभा अध्यक्ष थोकचोम सत्यब्रत सिंह समेत कुछ मंत्री भी शामिल थे। पार्टी के बागी विधायकों की तादाद धीरे-धीरे एक दर्जन के पार पहुंच गई थी।
भाजपा सूत्रों का कहना है कि बीरेन सिंह ने बजट अधिवेशन से पहले उसके प्रावधानों और वित्तीय आवंटन पर चर्चा करने के लिए राजधानी इंफाल में पार्टी के विधायकों की एक बैठक बुलाई थी। लेकिन करीब डेढ़ दर्जन विधायक उस बैठक में नहीं पहुंचे। उसी समय साफ हो गया था कि पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा है। उसके बाद मुख्यमंत्री बुधवार को दिल्ली पहुंचे लेकिन तमाम केंद्रीय नेता दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर व्यस्त थे। इसी वजह से बीरेन सिंह ने प्रयागराज में महाकुंभ में डुबकी लगाने का फैसला किया। वहां से लौटने के बाद शनिवार को गृह मंत्री अमित शाह और जे।पी। नड्डा समेत दूसरे नेताओं के साथ मुलाकात के दौरान ही उनके इस्तीफा देने पर सहमति बनी। इसी दौरान शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी के नेता संबित पात्रा को असंतुष्ट विधायकों को मनाने के लिए इंफाल भी भेजा लेकिन बात नहीं बन सकी। वहां से लौटने के बाद रविवार शाम को उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया।
मैतेई समुदाय के एक भाजपा विधायक बताते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व को इस बात की भनक मिल चुकी थी कि इस्तीफा नहीं देने की सूरत में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बीरेन सिंह सरकार का गिरना तय है। वह पार्टी के लिए शर्मनाक स्थिति होती। इसलिए उनको इस्तीफा देने को कह दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दरअसल, मई, 2023 में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू होने के बाद भी बीरेन सिंह पर इस हिंसा को भड़काने के आरोप लगते रहे। उन पर मैतेई संगठनों को हथियार मुहैया कराने तक के आरोप लगे। बीरेन सिंह के खिलाफ सबसे गंभीर आरोप सशस्त्र मैतेई संगठन आरामबाई टेंग्गोल की मदद करने का लगा है।
इसके बावजूद केंद्र सरकार खासकर मैतेई समुदाय के बीच उनकी भारी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उनको कुर्सी से हटाने का खतरा नहीं मोल लेना चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह साफ होने लगा था कि बीरेन सिंह ने मैतेई और कुकी समुदाय के बीच इतनी कड़वाहट पैदा कर दी है जिसे पाटना संभव नहीं है। मणिपुर में अब ज्यादा विकल्प नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व यहां बीरेन सिंह की जगह किसी बागी नेता को कमान सौंप सकता है या फिर कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगा कर परिस्थिति सामान्य होने का इंतजार किया जा सकता है। ऐसे में यह सप्ताह काफी अहम होगा। फिलहाल विधानसभा का बजट अधिवेशन स्थगित कर दिया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर राष्ट्रपति शासन लागू करने पर ही सहमति बनी तो संसद के मौजूदा अधिवेशन के खत्म होने का इंतजार किया जाएगा। लेकिन भाजपा के एक विधायक ने दावा किया कि इसकी संभावना कम ही है। इस बीच, कुकी संगठनों ने कहा है कि बीरेन सिंह की जगह भाजपा के किसी और नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। उन्होंने कुकी बहुल इलाकों के लिए एक प्रशासनिक ढांचा बनाने की मांग दोहराई है। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री बदलने की जगह राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग उठाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीरेन सिंह के इस्तीफे के बावजूद मणिपुर की जमीनी हालत में बदलाव की उम्मीद कम ही है। केंद्र सरकार की यह बात जानती है। इसलिए वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। किसी भी फैसले पर पहुंचने वह उसके तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसकी वजह यह है कि उसके किसी भी फैसले का दूरगामी असर होना तय है।
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