अब इसके स्वास्थ्य दुष्प्रभावों को जानिए?
ध्वनि प्रदूषण से सेहत को होने वाले दुष्प्रभावों की एक लंबी श्रृंखला है। बहरेपन से लेकर रक्तचाप बढ़ाने, हृदय रोग और गंभीर स्थितियों में यह मृत्यु का भी कारण बन सकता है। साल 2018 के समीक्षा अध्ययन के अनुसार,ध्वनि प्रदूषण रक्तचाप बढ़ा सकता है। लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। हृदय रोग दुनियाभर में मृत्यु के प्रमुख कारकों में से एक हैं।
इसी तरह साल 2018 में कनाडा में हुए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि ध्वनि प्रदूषण प्रीक्लेम्पसिया की समस्या को बढ़ा सकता है। प्रीक्लेम्पसिया, एक ऐसी स्थिति जो गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप का कारण बनती है। इससे गर्भवती और शिशु दोनों के लिए खतरा हो सकता है।
देश के भविष्य पर खतरा
साल 2018 में
अध्ययनों की समीक्षा में वैज्ञानिकों ने पाया कि बड़ी संख्या में बच्चे ध्वनि प्रदूषण के कारण बहरेपन का शिकार होते जा रहे हैं, वो बच्चे जिनसे देश का भविष्य आस लगाए बैठा है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि दिन में अक्सर करीब 8 घंटे शोर के लगातार संपर्क में रहने से बच्चों में स्थायी बहरेपन का जोखिम बढ़ सकता है।
इसी तरह
द इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में शोधकर्ताओं ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण भ्रूण, शैशवावस्था और किशोरावस्था सहित विकास की आयु वाले बच्चों में कानों की समस्या का कारण बन सकता है। ज्यादा तेज आवाज बच्चों के सीखने की क्षमता को कम कर सकती है।
जन्म लेने से पहले बीमारियों के शिकार होते शिशु
ध्वनि प्रदूषण गर्भावस्था की जटिलताओं का भी कारण बनता है। अधिक शोर के संपर्क में रहने से गर्भवती की नींद प्रभावित होती है। यह हार्मोनल असंतुलन के कारण अंतःस्रावी तंत्र के माध्यम से भ्रूण के विकास को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे बच्चों में तंत्रिका और मस्तिष्क से संबंधित समस्याओं का खतरा अधिक होता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
ध्वनि प्रदूषण, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की सेहत के लिए हानिकारक है। मस्तिष्क हमेशा खतरे के संकेतों के लिए ध्वनियों की निगरानी करता रहा है, यहां तक कि नींद के दौरान भी यह प्रक्रिया जारी रहती है। नतीजतन, शोर बढ़ने के कारण दिमाग हमेशा हाइपरएक्टिव मोड में रहता है जिससे मस्तिष्क को आराम नहीं मिल पाता। यह चिंता या तनाव को ट्रिगर कर सकती है।
अध्ययन बताते हैं कि ध्वनि प्रदूषण के निरंतर संपर्क के कारण तनाव के प्रति व्यक्ति की संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
इस जानलेवा खतरे को कम कैसे किया जाए?
विशेषज्ञों की मानें तो पर्यावरण संरक्षण की बात करते समय हमें इसके सभी आयामों और प्रदूषण कारकों को लेकर सतर्क रहना चाहिए। ध्वनि प्रदूषण इस संबंध में गंभीर विषय है, जिसपर इतनी ही गंभीरता से विचार करने और इसके रोकथाम के उपाय करने की आवश्यकता है। सभी शोर मचाने वाले कारकों का अधिकतम ध्वनि मानक तय करके इसकी गंभीरता से निगरानी की जानी चाहिए। पुराने उपकरण, वाहन और अन्य सामानों को अपग्रेड करने या बदलने पर विचार करने की आवश्यकता है।
सरकार के साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी सभी लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन को लेकर गंभीरता दिखानी होगी। सेहत को खतरे को ध्यान में रखते हुए खुद से लाउडस्पीकर-साउंड की आवाज को कम रखें, 'आंटी पुलिस बुला लेगी' का इंतजार न करें। साउंडप्रूफिंग सिस्टम को बढ़ावा दिया जाए साथ ही इससे बचाव के व्यक्तिगत तौर पर उपाय करते रहना आवश्यक है।
ध्यान रहे, पर्यावरण और प्रदूषण के लिए सरकारों पर ठीकरा फोड़ने से पहले हमें खुद की गतिविधियों और ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा देने में स्वयं के योगदान पर विचार करना आवश्यक है। पर्यावरण और सेहत दोनों को सुरक्षित रखना, हमारी-आपकी, हम सबकी जिम्मेदारी है। तो अगली बार से आयोजनों में जब भी डीजे-लाउडस्पीकर की आवाज तेज हो, तुरंत इसके व्यापक दुष्प्रभावों को याद कर लीजिएगा।
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