सितम्बर 2013 में संसद द्वारा ‘‘हाथ से मैला साफ करने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013’’ पास किया गया।
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स्केवेंजिंग से कानून नहीं दिला पाया मुक्ति
दरअसल, कानून अकेले किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकता। अगर इस अमानवीय समस्या का समाधान कानून के पास होता तो नब्बे के दशक में समस्या तब समाप्त हो जाती जब पहली बार 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 आ गया था। जिसका उद्धेश्य मानव मल-मूत्र को हटाने के लिए सफाई कर्मचारियों के नियोजन को अपराध घोषित कर सफाई कार्य के हाथ से किए जाने का अन्त करने और देश में शुष्क शौचालयों की और वृद्धि पर पाबंदी लगाने के लिए संपूर्ण भारत के लिए एक समान विधान अधिनियमित करना था।
जब इस कानून से काम नहीं चला तो उसके बाद सितम्बर 2013 में संसद द्वारा "हाथ से मैला साफ करने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013" पास किया गया। वह अधिनियम 6 दिसम्बर 2013 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम में अस्वच्छ शौचालयों और मैनुअल स्केवेंजिंग संबंधी उपबंधों का पहली बार उल्लंघन करने पर 1 वर्ष की सजा या 50 हजार का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
दूसरी बार उल्लंघन करने पर 2 वर्ष की सजा और 1 लाख का जुर्माना हो सकता है। तीसरी बार उल्लंघन करने पर 5 पांच साल की सजा या 5 लाख के जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। इस अधिनियम की धारा 22 के अन्तर्गत पाए गए अपराध संज्ञेय एवं गैर जमानती हैं, लेकिन फिर भी समाज के एक खास वर्ग को इससे पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल सकी।
नगर निकायों ने भी कानून का पालन नहीं किया
अब तक कानून तो बनते रहे मगर वे कानून अपने उद्धेश्य की पूर्ति न कर सके। करते भी कैसे? क्योंकि बिना सफाई के नगर नर्क बन जाएंगे। इसलिए 2011 के कानून का उल्लंघन स्वयं नगर निगम और नगरपालिका जैसे नगर निकाय भी नहीं कर रहे थे। इस समस्या का निदान के लिए पहले भी सुझाव आए थे कि सफाई का काम हाथ से या मजदूरों से कराने के बजाय नगर निकाय मशीनों से कराएं।
उन मशीनों पर कोई भी और और किसी भी जाति का सामान्य कर्मचारी काम कर सकता है, लेकिन नगर निकायों को ऐसी मशीनें नहीं दी गई। अब उम्मीद की जा सकती है कि भारत सरकार की मदद से सारे देश के शहरों में मशीनों से ही नालियों, सीवरलाइनों और सेप्टिक टैंकों की सफाई हो सकेगी। मैनुअल स्कैवेंजिंग से एक जाति विशेष का उद्धार नहीं हो पा रहा है। संसद में 2021 में स्वयं सरकार ने स्वीकार किया था कि इस पेशे में लगे लोगों में 97.25 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति के थे।
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