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नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं की एकात्मता समझने की जरूरत

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नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता की संस्तुति का विरोध हुआ है। - फोटो : अमर उजाला
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नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता की संस्तुति का जिस तरह से विरोध हुआ है यह बहुत पुरानी परम्परा नहीं है और सूर्य के प्रकाश में आंख मूंदकर अंधेरे का आभास करने जैसा है। दक्षिण में हिंदी विरोध आजादी के बाद गढ़ा गया राजनीतिक मुद्दा है जिसकी प्रस्तावना पादरी रोबर्ट कोल्डवेल ने लिखी थी।

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पादरी रोबर्ट कोल्डवेल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक भाषा-ज्ञान के प्रवर्तकों ने शोधादि का स्वांग रचकर यह साबित कर दिया गया कि उत्तर भारत की भाषाओं का यूनानी, ईरानी, जर्मन और लातीनी भाषाओं से सम्बन्ध तो है लेकिन विध्यांचल के दक्षिण में प्रचलित “उन भाषाओं” से इनका कोई संबंध नहीं, जिसकी व्याकरणिक व्यवस्था में उत्तर से जाकर ऋषि अगस्त्य ने योगदान दिया था। 

अपनी पुस्तक “द्रविड़ भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन”के जरिये कोल्डवेल ने तमिल लोगों में उस भावना बीज बोया कि उनकी भाषाओं की उत्तर भाषाओं से कोई मेल नहीं हो सकता है। वहीं जब उत्तरापथ और दक्षिणापथ की परम्पराएं, शास्त्र, सामाजिक व्यवस्था व आराध्य देव एक ही हैं फिर उनकी भाषा में कोई अंतर्भाषिक सम्बन्ध न हो?
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यह हजम होने वाली बात नहीं है। लेकिन तत्कालीन शासकों व मिशनरियों को यही अभीष्ट था कि भाषावर्ग के नाम पर दोनों प्रान्त अलग ही रहें और भाषा व सांस्कृतिक समानता पर इनकी दृष्टि कभी न पड़े। शायद इसीलिए आजादी के बाद देश में प्रान्तों या राज्यों का बंटवारा भाषाई आधार पर हुआ और वर्तमान में भारत के प्रत्येक प्रान्त के पास अपनी एक अभ्यासी भाषा है। 

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दक्षिण के लोगों को हिंदी सीखने में बहुत आनंद आया। - फोटो : फाइल फोटो
दरअसल, यहीं से भाषा आधारित राजनीति शुरू हुई और पादरी कोल्डवेल फिर याद किए गए। कोल्डवेल का महिमामंडन शुरू हुआ, मरीना बीच के पास उनकी मूर्ति स्थापित हुई। दक्षिण में सक्रिय मिशनरियां इसकी प्रायोजक रहीं। देखते- देखते भाषाई आधार पर कथित “आर्य और द्रविड़” के बीच दीवार मोटी और ऊंची होती गई। भारत में उत्तर और दक्षिण दो  भारत हो गए, जिनके शास्त्र और संस्कृति एक ही है उनमें विभेद हो गया। उससे पहले देश में ऐसी स्थिति कहीं नहीं थी।

आजादी से दो दशक पूर्व ही तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार-प्रसार को अपार समर्थन मिला था और वहां एक के बाद एक शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय खोले गए थे। इसमें गांधी जी के कनिष्ठ पुत्र देवदास गांधी, डॉ.सीपी रामस्वामी अय्यर, पं. हरिहर शर्मा, पं. ऋषिकेश शर्मा, स्वामी सत्यदेव, मोटूरि सत्यनारायण, देवदूत विद्यार्थी और राम नरेश त्रिपाठी सहित कई मनीषियों का बड़ा योगदान रहा।

बालसुब्रमण्यम जी ने राजभाषा भारती में लिखा था कि तमिलनाडु में हिंदी प्रचार की सफलता का प्रमुख कारण यह रहा कि तमिलनाडु के लोगों को हिंदी सीखने में बहुत आनंद आया, अपनापन सा लगा क्योंकि भाषा की प्रकृति के स्तर पर हिंदी और तमिल के क्रियापदों व क्रियापद की रचना में जो अद्भुत समानता मिलती है वह खड़ी बोली और अवधी में नहीं मिलती या तमिल और मलयालम में नहीं मिलती।

हिंदी को संस्कृत का सार सर्वस्व विरासत में मिला है और तमिल के दैनिन्दन वार्तालाप देखें तो संस्कृत से ओत-प्रोत मिलेंगे। जैसे अय्या वांग, सौक्किय्मा? (श्रीमान आइये, कुशल से तो हैं) या एन्न समाचारम (क्या हाल समाचार)। यहां अय्या संस्कृत आर्य का और सौक्किय्मा, संस्कृत सौख्यम ही रूपांतरण है, वैसे ही जैसे नक्षत्र को लोकभाषा में नखत, लक्ष्मण को लखन, व अक्षर को आखर कहा जाता है।

एक ही भूखंड की भाषाएं होने के कारण उत्तर और दक्षिण भारतीय भाषाओं की वाक्य रचना में प्रकृति एवं प्रत्यय में,शब्द धातु में, कथन शैली में, भाव धारा में एवं चिंतन प्रणाली में यत्र-तत्र-सर्वत्र समानता मिलती है। इसी तरह आधुनिक भारतीय भाषाओँ में जैसा अंतर दिखता है वैसा लोकभाषाओं में नहीं है। यह एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

परवर्ती तमिल सिद्धों की “बानी”उत्तरापथ के संतों की “वाणी”से मिलती-जुलती है। अवधी से पूरब चलें तो क्रमशः भोजपुरी, बज्जिका, मैथिली, बंगला, असमिया आदि में अंतर और एकत्व की छटाएं दिखेंगी। इसी प्रकार अवधी से दक्षिण चलें तो कुछ परिवर्तन के साथ बुन्देली, बघेली से छत्तीसगढ़ी जुडी हुई मिलेगी। छत्तीसगढ़ की एक भाषा का रूप कलिंगा उड़िया से जुड़ा हुआ है दूसरा बस्तर का भाषा रूप हाल्वी तेलगु के निकट पहुंचता है।

हमें जोर देने की जरूरत है कि भाषा की पाश्चात्य अवधारणा से अलग भारत की भाषा संबंधी अवधारणा अपनी रही है, जिसमें एकात्म दृष्टि है और अंतर्भाषिक सम्बन्ध की स्वीकृति भी। भाषा की भारतीय अवधारणा ने भाषाओं के मध्य संगमन को हमेशा जोर दिया है। विविध भाषाओं में एकत्व की धारणा के कारण ही निरुक्तकार यास्क ने वैदिक और लौकिक शब्दों की समानता के अंतर्गत अर्थ को स्थित माना है। शौनक ने भी अर्थ संधान की दृष्टि से वैदिक और लौकिक वचनों में सम्बन्ध मानते हुए कहा है कि जो वैदिक है उसे लौकिक बना लेना चाहिए। 

लौकिक को पाणिनि ने भाषायाम (भाषा) कहा है, वहीं वैदिक को छन्दसि कहा है। परिष्कृत होने के कारण ही भाषा को संस्कृत कहा जाने लगा। आगे चलकर संस्कृत ने न सिर्फ भारतीय भाषाओं की प्रतिनिधि भाषा के रूप में काम किया बल्कि भारतीय भाषाओं की व्याकरणिक व्यवस्था में सहयोग दिया। भारत की सभी भाषाओं में परस्पर आदान-प्रदान होता रहा है, साथ ही उनके परिष्करण में संस्कृत अपनी भूमिका निभाती रही है। सभी भाषाएं संस्कृत व्याकरण दर्शन का अनुसरण करती रही हैं, जिन भाषाओँ का उद्गम मूल संस्कृत नहीं हैं, या जिनके साथ संस्कृत ने सहयात्रा की है उनके परिष्कार में संस्कृत का बड़ा योगदान रहा है।

भाषा की भारतीय अवधारणा व भाषाओं का संगमन समझने से आर्य-द्रविड़ भाषा विभेद का “पादरी षड़यंत्र”ढह जाता है, और इसके साथ ही उत्तर-दक्षिण के बीच बनाई गई भाषाई दीवार ढह जाती है। जरूरत भाषाओं की एकात्मता को “स्थापित”करने की है। भारतीय भाषाओं की एकात्मता पर एनसीईआरटी के प्रोफेसर प्रमोद दुबे के नेतृत्व में शब्दकोष का प्रकाशन हुआ है उसी तरह से भारतीय भाषाओं का “एक व्याकरण” बनाया जा सकता है, लेकिन भारतीय भाषाओं की एकात्मता की संसिद्धि संस्कृत के नेतृत्व में अंतर्भाषिक संबंधों के निर्णय से ही संभव हो सकता है,  क्योंकि संस्कृत की दृष्टि में भारतीय भाषाएं एक परिवार की भाषाएं हैं। अतः संस्कृत को अन्य 22 भाषाओं की भांति एक भाषा न मानकर प्रतिनधि भाषा के रूप में स्थापित करना चाहिए। संस्कृत व्याकरण दर्शन के आलोक में ही भारतीय भाषाओं की एकात्मता को समझा जा सकता है और भाषाई विभेद को खत्म किया जा सकता है।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।       

 
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