नवरात्र में जब दुर्गासप्तशती के मंत्रों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है, तब इस पौराणिक ग्रंथ को पाश्चात्य जगत तक पहुंचाने वाले अंग्रेज विद्वान फेडरिक ईडन पार्जिटर का स्मरण सहज ही हो उठता है। 1852 ईस्वी में इंग्लैंड में जन्मे पार्जिटर ब्रिटिश भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे और बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने।
पार्जिटर के साहित्यिक कार्यों में मार्कंडेय पुराण का सन 1904 में किया अंग्रेजी अनुवाद विशेष महत्व रखता है। श्लोकों की संख्या की दृष्टि से यह अठारह पुराणों में सबसे छोटा है। इसमें नौ हजार श्लोक और 137 अध्याय हैं। इसकी शुरुआत वेदव्यास के शिष्य जैमिनि द्वारा मार्कंडेय ऋषि से महाभारत से संबंधित चार प्रश्न पूछने से होती है।
पहला, निर्गुण परमात्मा वासुदेव ने मानव रूप क्यों धारण किया? दूसरा, द्रौपदी पांच भाइयों की पत्नी क्यों बनी? तीसरा है बलराम ने ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त केवल तीर्थ यात्रा से ही क्यों किया? चौथा, द्रौपदी के पांच अविवाहित पुत्र अश्वत्थामा द्वारा असहाय अवस्था में क्यों मारे गए, जबकि उनके सहायक महान योद्धा पांडव और भगवान श्रीकृष्ण थे? मार्कंडेय इन प्रश्नों को सुनकर जैमिनि को विंध्याचल के बुद्धिमान पक्षियों के पास जाने की सम्मति देते हैं।
इस प्रकार इन प्रश्नों के उत्तर पक्षियों द्वारा चौथे से सातवें अध्याय में दिए हुए हैं। इस पुराण के एक-दूसरे से असंबद्ध तीन भाग हैं - 1 से 42 अध्यायों तक ज्ञानी पक्षिगण वक्ता हैं। 43 से अंत तक मार्कंडेय एवं उनके शिष्य क्रोष्टुकि का संवाद है। केवल दुर्गासप्तशती ही ऐसी है, जो इस पुराण का स्वतंत्र भाग है और 78 से 90 तक के 13 अध्यायों में वर्णित है।
दुर्गासप्तशती को देवी-माहात्म्य एवं चंडी पाठ भी कहा जाता है। बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान इस ग्रंथ का पाठ अत्यंत प्रतिष्ठित है, लेकिन उन्होंने माना कि इसकी उत्पत्ति बंगाल में नहीं हुई। उन्होंने पश्चिमी भारत के पद्मावती अर्थात उज्जयिनी और मांधाता तीर्थ (वर्तमान ओंकारेश्वर क्षेत्र) को इसकी रचना स्थली माना।
पार्जिटर के प्रमुख साहित्यिक कार्यों में मार्कंडेय पुराण का अंग्रेजी अनुवाद (1904), कलियुग के राजवंशों की पौराणिक वंशावलियों का अध्ययन (1913) तथा प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक परंपरा (1922) हैं। उन्होंने पूर्वी बंगाल के ताम्रपत्र अभिलेखों और प्राचीन भूमि-अनुदानों से संबंधित संस्कृत अभिलेखों का संपादन एवं ऐतिहासिक विश्लेषण भी किया। उन्होंने संस्कृत पुराणों को केवल धार्मिक आख्यानों के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के स्रोत के रूप में देखा। फरवरी 1927 में उनका निधन हो गया, लेकिन पौराणिक साहित्य पर उनका विद्वत्तापूर्ण कार्य आज भी प्रेरक है।