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कहानी कोठों और तवायफों की, भारत में आज भी होता है यहां मुजरा

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1606 में अकबरी सराय के आयोजन में आम जनता ने पहली बार मुजरा देखा था। - फोटो : flickr.com
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भारत में मुजरे का अपना इतिहास रहा है। कोठे, मुजरे और तवायफ के अतीत की गलियां मुगल सल्तनत से भी जुड़ती हैं। दरअसल, 16वीं सदी के मुगल साम्राज्य के संरक्षण में मुजरा खूब फला-फूला। 16वीं सदी में शहंशाह अकबर ने फारुखी बादशाह बहादुरशाह को हराकर ताप्ती नदी के किनारे बसे शहर बुरहानपुर को अपने कब्जे में ले लिया था और सत्ता संभालने के लिए अकबर ने अपने बेटे मुरादशाह को भेजा था। मुरादशाह अपनी सभी आवश्यक वस्तुओं और सेना के साथ ही अपने मनोरंजन के लिए तवायफों को भी उनके डेरों सहित लाया था। जहांगीर के पुत्र शहजादा परवेज के स्वागत में 1606 में यहां की अकबरी सराय में सार्वजनिक मनोरंजन का एक भव्य आयोजन हुआ था। इस आयोजन में आम जनता ने पहली बार मुजरा देखा था।

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मुजरा और मुगलकाल 
इधर, 1616 में जहांगीर ने इन मुंजरे वालियों को बुरहानपुर के बोरवाड़ी क्षेत्र में बसाया था। तत्कालीन समय में मोती कुंवर, बेगम गुलारा जैसी तवायफों पर जहांगीर भी मोहित था। उसने मोती कुंवर के लिए असीरगढ़ के पास एक महल बनवाया था, जिसे मोती महल कहा जाता है। इसी प्रकार गुलारा बेगम के लिए भी उतावली नदी के किनारे गुलारा महल बनवाया था। कट्टर छवि वाला बादशाह औरंगजेब भी बुरहानपुर की एक हिन्दू तवायफ हीराबाई से प्रेम करता था।

उस दौर में मुजरा कलाकारों को सुसंस्कृत और उच्च तहजीब का माना जाता था। उस समय मनोरंजन के क्षेत्र में यह कला शीर्ष पर थी। उत्तर भारत के राजदरबारियों का कथक, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और गजल से मनोरंजन करना होता था। बोरवाड़ी में आज भी मुजरे की परम्परा जिंदा है। फिल्मों की तर्ज पर यहां भी बड़े से हॉल में मुजरा होता है। लेकिन यहां का समाज भी खुद को बदलने को मजबूर है। गीत-संगीत के प्रति अपने प्रेम के कारण इस पेशे को अपनाने वाली तवायफ समीना बॉलीवुड में एक मौका चाहती है।

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मुजरे की परम्परा मुंबई के बाचूबाईवाड़ी क्षेत्र में भी जीवित है। - फोटो : Wikipedia
भारत में आज भी यहां होता है मुजरा 
मुजरे की परम्परा मुंबई के बाचूबाईवाड़ी क्षेत्र में भी जीवित है। अल्प व्यवसायिक और अल्प आवासीय क्षेत्र में लगी दुकानों के बीच बाचूबाईवाड़ी का प्रवेश द्वार ढूंढना काफी मुश्किल काम है। छोटा सा रास्ता दो कमरों की क्वाटर दीर्घा में खुलता है। बीच शहर में होने के बावजूद वाड़ी क्षेत्र के निवासी मुंबई की गतिविधियों से अनजान रहते हैं। यहां के सभी निवासी हड़बड़ी में रहते हैं। काम निबटाने की भगदड़ सुबह 8 बजे शुरू हो जाती है। जवान लड़कियां कपड़े सुखा रही होती हैं, तो बूढ़ी औरतें नीम की दातुन से दांतों पर से पान के दाग छुटा रही होती हैं। मनोरंजन का समय रात्रि 9 बजे से 12-30 बजे तक होता है।

अपने पेशे के बारे में ये कहती हैं तवायफें 
इस कारोबार का प्रसिद्ध नाम, लालमनी की भतीजी विमलाबाई चैथी पीढ़ी की तवायफ कहती है- एक बार तवायफ बनने के बाद बामुश्किल ही कोई अपनी उम्र याद रखती है। अब मैं अपने बेटे पर आश्रित हूं जो खुद दिल का मरीज है। अब यहां की अधिकांश तवायफें आर्थिक तंगी से गुजर रही हैं। अगर हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर उक्त कारोबार से अलग नौकरी करने की सलाह ना दें तो निश्चित ही भूखे मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मुजरे की संस्कृति पूरी तरह मर चुकी है। फैजाबाद में जन्मी तथा लखनऊ में प्रशिक्षित 47 वर्षीय विमलाबाई याद कर बताती हैं कि, ‘‘मैंने व्यवसायिक नृत्य से पूर्व 6 वर्ष तक प्रशिक्षण लिया था। सुबह 10 बजे से संगीत और नृत्य का रियाज शाम तक चलता था। शिक्षा में उर्दू का ज्ञान जरूरी था ताकि गालिब और रूमी की शायरी समझ सकें।

अमीना बाई बताती है कि- मैंने मुजरे की शुरुआत 18 वर्ष की उम्र में की थी। हालांकि मुझे आज भी कुलीन परिवारों की शादी और अन्य कार्यक्रमों में सम्मान सहित बुलाया जाता है, लेकिन ब्रिटिश राज्य के पतन व जमींदारी उन्मूलन के साथ ही मुजरा में गिरावट आनी शुरू हो गई थी।

मध्य वर्ग के उदय ने तवायफों को नैतिक स्तर पर काफी हद तक प्रताड़ित किया है। वे इन्हें वैश्या समझते हैं। अब तवायफों का जीवन अनिश्चित प्रेम की उलझनों में भटक रहा है। जबकि बॉलीवुड की मशहूर कलाकार नर्गिस दत्त तथा शायराबानों की मां भी जानी मानी तवायफ थीं। लेकिन अब इस व्यवसाय में कुछ नहीं बचा है। इस कला का दिन-प्रति-दिन ह्रास हो रहा है, लेकिन यह हमारे जीवन का हिस्सा है। नुकसान अकेले वित्तीय नहीं हैं, परंपरा भी लुप्त प्रायः है।

जैसा आज फिल्मों में दिखाया जाता है, उसी तर्ज पर तब बड़े से हॉल में मुजरा होता था। - फोटो : Social Media
कोलकाता में भी हैं मुजरे की निशानियां 
मध्य कोलकाता के बाउ बाजार निवासी 42 वर्षीय तवायफ रजनी सप्ताहंत में महफिल में प्रस्तुति देने के लिए सब कुछ समय अनुसार निपटाती हैं। इसका कहना है कि दर्शकों की मांग पूरी करना आसान नहीं है, जैसे छम्मक छल्लो गाने को हरमोनियम व तबले पर कैसे गा सकते हैं। उसका कहना था कि अगर करीना कपूर को इसमें से हटा दिया जाए तो इस गाने में क्या है?

वह अपना बचपन याद करते हुए बताती हैं कि, कई कारोबारी अपने बच्चों को मेरी मां के पास तहजीब सीखने के लिए भेजते थे। मां हमें अनारकली वस्त्रों में सजाती तथा महफिल के समय शांत रहने की हिदायत देती। उनकी प्रदर्शन सूची में जगजीत सिंह व मेहंदी हसन की गजलें शामिल थीं। आज हमारे पास ज्यादा चुनाव नहीं है। अधिकतर बॉलीवुड गानों की फरमाइश आती है। ‘दिल चीज क्या है’ से लेकर ‘ओह ला ला’तक। यादों का विषाद हमारे जीवन का अंग बन चुका है।

इस क्षेत्र की शीतल नाम की तवायफ अपनी 20 की उम्र की यादें तजा करते हुए बताती हैं कि जैसा आज फिल्मों में दिखाया जाता है, उसी तर्ज पर तब बड़े से हॉल में मुजरा होता था। हॉल की चटकीले रंगों वाली दीवारों पर बड़े-बड़े आईने लगे होते थे। फॉल्स सीलिंग पर खूबसूरत झूमर लटके होते थे। मुजरा कलाकार महंगे परिधान व स्वर्ण आभूषण पहनकर मुजरा करती थीं। ये सब कुछ अतीत की बातें हैं। अब हमें 10×10 के कमरे में रहना पड़ता है। मैं लहंगा पहनती हूं जबकि अन्य कलाकार भारतीय कपड़े नहीं पहनती। यह कह पाना बहुत ही कठिन है कि कल क्या होगा?
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पाकीजा फिल्म का दृश्य - फोटो : फिल्म स्टील
दिल्ली के कोठों की कहानी, कितना बदला मुजरा!  
दिल्ली के कोठों पर 20वीं सदी के 80वें दशक तक गुजरे पूरे शानोसोक्त के साथ जारी थे लेकिन धीरे-धीरे मुजरे का स्थान डिस्को  क्लबों में होने वाले कैबरे डांस ने ले लिया था। ये क्लब रात में खुलते थे, जहां रंग बिरंगी लाइटों के बीच स्टेज पर नर्तकी चमकीले कपड़े पहनकर नृत्य करती थी। भारतीय फिल्मी गानों पर नृत्य करते-करते नर्तकी एक-एक करके अपने कपड़े उतार फेंकती। उस समय दर्शक मस्त होकर स्टेज पर पैसे फेंकना शुरू कर देते थे और जब वह डांसर अर्द्ध नग्न होकर उत्तेजक नृत्य करतीं, तब तो उस पर पैसों की बरसात होने लगती थी।

इस कैबरे डांस की आड़ में लोगों ने दूसरे काम करने शुरू कर दिये, तो पुलिस ने 20वीं सदी के अंत में कैबरे डांस पर रोक लगा दी। लेकिन अब बड़े शहरों में हुक्का बारों का प्रचलन जोरों पर है। पुलिस की टेढ़ी नजर होने के बाद भी हुक्का बारों की रंगीनियां कम नहीं हुई हैं।

इसी बीच दिल्ली में मनोरंजन का पूर्व प्रचलित मुजरा नये रंग ढंग में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। इस आधुनिक मुजरे का आनन्द लेने के लिए लोग शाम ढ़लने का इंतजार करते हैं। जब दिल्ली सो जाती है तब यहां नाच-गाने के शौकीनों की महफिल गुलजार होने लगती है। यह आधुनिक मुजरा बॉलीवुड की तर्ज पर एक बड़े हॉल में होता है।

हॉल की चटकीले रंगों वाली दीवारों पर बड़े-बड़े दर्पण लगे होते हैं। सुसज्जित हॉल में बड़ा सा एक झूमर भी लगा होता है। मुजरा के ये अड्डे दिल्ली के राजेन्द्र प्लेस मेट्रो स्टेशन के पास, वेस्ट दिल्ली की कुछ जगहों और कड़कड़ड़ूमा इलाकों में मौजूद हैं। इस आधुनिक मुजरे का आयोजन साउंडप्रूफ दीवारों के पीछे होता है, जिससे हॉल की कोई आवाज बाहर न जा सके। 

वैसे हॉल में प्रवेश की कोई फीस नहीं है, लेकिन एंट्री से पहले हर शख्स की अच्छी तरह जांच की जाती है। इसके बाद ही ऑटोमेटिक दरवाजे खुलते हैं। यहां की महफिल ग्राहकों की फरमाइश और परम्परा के हिसाब से तय होती है। रंग जमने पर नोटों की बरसात होने लगती है। स्टेज पर बैठी लड़कियां एक-एक करके अपनी परफारमेंस देती हैं।

टेबल पर बैठते ही आपको खाना और ड्रिंक्स ऑर्डर करना होता है। यहां हुक्का भी चलता है। यहां का एक ही सिद्धांत है कि बस मौज करो और मयखाने के मजे लो। स्टेज पर गानों का दौर चलता रहता है और डांसर्स के पैर थिरकते रहते हैं। फोटो खींचने की यहां सख्त मनाही होती है। दर्शक डांसरों पर कोई कमेंट न करें, डांसरों को छू तक न सकें, इसके लिए वहां बाउंसर्स तैयार रहते हैं। यहां आने वालों का केवल एक ही मकसद होता है एंजॉय करना। नियम कानूनों को ताक पर रखकर रात 2-3 बजे तक चलने वाले ये आधुनिक मुजरे कब तक चलते हैं कहना मुश्किल है।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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