पं. बनारसीदास चतुर्वेदी पर स्मरण-सम्वाद में बोलते वक्तागण
- फोटो : Amar Ujala
प्रवासी भारतीयों में मातृभाषा के अनेक पक्ष
आत्माराम शर्मा ने कहा कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के अलावा दुनियाभर में रहने वाले प्रवासी भारतीयों में अपनी भाषा, संस्कृति और उनके नॉस्टेल्जिया के अनेक पक्ष हैं। हिंदी के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस देश में विगत् 70 सालों से हिंदी को राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संयुक्त राष्ट्र संघ में बोली जाने वाली भाषा बनाये जाने के पक्ष में अभियान चलाये जा रहे हैं। हिंदी हितैषी अनेक संस्थाएं हैं, समितियां हैं, विश्वविद्यालय हैं, लेकिन दिखाई दे रहा है कि हिंदी का हित तो नहीं पता पर कुछ हिंदीसेवियों का ज़रूर हित हुआ है।
उन्होंने ने कहा कि हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आजादी के समय हिंदी की हैसियत के बारे में जो निर्णय लिया गया था, उसे तुरंत लागू न करते हुए कुछ समय के लिए स्थगित किया गया था। लेकिन आज इतने वर्षों बाद उसे उसी स्वरूप में लागू नहीं किया जा सकता। हमें आज सम्पूर्ण देश के संदर्भ में हिंदी की एक नई भूमिका खोजनी होगी और यह भूमिका सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर ही तय की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर अगर हम भारतीय भाषाओं के पक्ष में बात कर रहे हैं तो हमें कभी न कभी आपसी सम्पर्क के लिए अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यतः से मुक्त होना होगा। इसे विड़ंबना ही कहा जाएगा कि हिंदी का देशभर की सम्पर्क भाषा के तौर पर प्रचलित होना, देश के राजनेता, प्रशासक और उद्योग जगत अपने हित में नहीं मानता और यही सबसे बड़ी बाधा है। हमें सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करना होगी साथ ही अंग्रेजी की सम्पर्क-भाषा की हैसियत को हिंदी से स्थानापन्न करना होगा।
क्या होगी भविष्य के संवाद की भाषा?
उन्होंने कहा कि हमें भविष्य के बारे में स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि सन् 2050 में भारत के बच्चे आपस में किस भाषा में संवाद करेंगे? अंग्रेजी की बढ़ती स्वीकार्यता और लिपि के तौर पर रोमन के बढ़ते प्रयोग का असर हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं पर प्रतिकूल पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि माध्यमिक स्तर के बच्चों को कम्प्यूटर पर यूनिकोड में टाइप करने का प्रशिक्षण देकर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। गर्भनाल-न्यास द्वारा यह अभियान व्यापक स्तर पर चलाया जा रहा है।
प्रख्यात कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल ने "दुनियादार होती हिंदी और पं. बनारसीदास चतुर्वेदी" विषय बोलते हुए कहा कि हमें अपनी जड़ों से ऊर्जा लेते रहना होगा साथ ही नई और पुरानी पीढ़ी के समन्वय को भी साधना होगा। अगर अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है तो हमें हिंदी और सारी भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के इस ज्ञान को समाहित करना होगा। आपने आगे कहा कि कुंडेश्वर में जहां पं. चतुर्वेदी जी रहते थे उस कोठी के एक कक्ष में पंडित जी के नाम पर गैलरी बनना चाहिये जहां उनके साहित्य और कृतित्व को प्रदर्शित किया जाए।
पत्रकारिता के संदर्भ बदल गए और युवा पीढी अंग्रेजीदा हो गई
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने "बाजार के दवाब में आज का पत्रकार" विषय पर बोलते हुए कहा कि पत्रकारिता अब प्रभाव क्षेत्र वाले संदर्भ से ऊपर पहुंच गई है अब बाजार ने इसका चरित्र ही बदल दिया है। उनका कहना था कि आगामी दशकों में भारत और चीन के अलावा दुनिया में कहीं भी अखबारों का चलन बाकी नहीं बचेगा। आपने विश्वविद्यालय की ओर से कुंडेश्वर में पं. बनारसीदास जी की स्मृति को स्थायी करने में सहयोग का आश्वासन दिया।
राज्यसभा टीवी के पूर्व एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर और प्रख्यात पत्रकार राजेश बादल ने "हिंदी की अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों की सच्चाई" पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हिंदी का बाजार तो बढ़ा है, लेकिन उसके बोलने बालों के दिलों में उसका सम्मान घटा है। युवा पीढ़ी अंग्रेजीदा हो गई है, जबकि पुरानी पीढ़ी भारतीय भाषाओं की समर्थक है। इससे सम्वादहीनता की स्थिति बन गई है। अब यह छुपी हुई बात नहीं रह गई है कि हिंदी सम्मेलनों के नाम पर क्या-कुछ होता है। यह समझने की बात है कि घूमने-फिरने और पिकनिक मनाकर हिंदी का बड़ा हित कभी नहीं किया जा सकता है। उन्होंने इस अवसर पर चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को फिल्म के माध्यम से प्रदर्शित करने की आवश्यकता बताई।
पं. बनारसीदास चतुर्वेदी पर स्मरण-सम्वाद को सुनते श्रोतागण
- फोटो : Amar Ujala
पत्रकारिता बाजार के कब्जे में
माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र संग्रहालय के संस्थापक-संयोजक विजयदत्त श्रीधर ने "हिंदी में "प्रवासी साहित्य" और उसके मंतव्य" विषय पर बोलते हुए कहा कि प्रवासी साहित्य के नाम पर जो चुनिंदा साहित्य लिखा और प्रचारित किया जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा साहित्य अप्रचारित है, जिसे हिंदी समाज के सामने लाने की आवश्यकता है। यह बात जोर-शोर से उठाई जाना चाहिए कि हिंदी के साहित्य को दलित साहित्य, महिला साहित्य और प्रवासी साहित्य जैसे अलग-अलग खण्डों में नहीं बांटा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि डाइट परिसर में पं. चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व की जानकारी स्मृति-पटल के तौर पर दर्ज होना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने आज की पत्रकारिता को बाजार ने कैसे अपने कब्जे में ले लिया है इसके अनेक प्रसंग सामने रखे। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज से समाचारों की विश्वसनीयता दाव पर लग गई है। अंत में बुंदेलीमाटी शोध संस्थान के निदेशक रज्जू राय ने आभार व्यक्त किया और चतुर्वेदी जी की स्मृति को स्थायी करने कि दिशा में काम करने का आग्रह किया।
परिसंवाद की पूर्व संध्या पर बुंदेली कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें बुंदेली के स्थानीय कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।