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लहर को नहीं, सागर को देखिए: अतिचेतना को प्राप्त कर, सबकुछ पाया जा सकता है

Mon, 12 Jan 2026 06:46 AM IST
नितिन गौतम स्वामी विवेकानंद, अमर उजाला

सार

पूरे समर्पण के साथ किसी भी मार्ग पर चलो, तुम अवश्य ही संपूर्ण सत्य तक पहुंचोगे। यदि शृृंखला की एक भी कड़ी को मजबूती से पकड़ लिया, तो धीरे-धीरे पूरी शृंखला अपने आप हाथ में आ जाएगी।
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राष्ट्रीय युवा दिवस आज - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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साहसी बनो और सच्चे रहो। फिर पूरे समर्पण के साथ किसी भी मार्ग पर चलो, तुम अवश्य ही संपूर्ण सत्य तक पहुंचोगे। यदि शृंखला की एक भी कड़ी को मजबूती से पकड़ लिया, तो धीरे-धीरे पूरी शृंखला अपने आप हाथ में आ जाएगी। यदि तुम वृक्ष की जड़ों को पानी दो, तो पूरा वृक्ष अपने आप सिंचित हो जाता है। इसी तरह ईश्वर को पा लेने पर सब कुछ मिल जाता है। एकांगी दृष्टि संसार का सबसे बड़ा दोष है। जितने अधिक पक्ष तुम अपने भीतर विकसित करोगे, उतनी ही अधिक आत्माओं से तुम जुड़ पाओगे, और तब तुम ब्रह्मांड को भक्त की दृष्टि से भी देख सकोगे और ज्ञानी की दृष्टि से भी।
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पहले अपने स्वभाव को पहचानो और उसी पर दृढ़ रहो। प्रारंभिक साधक के लिए निष्ठा, यानी एक आदर्श के प्रति अडिग भक्ति ही एकमात्र मार्ग है। परंतु यदि भक्ति और सच्चाई हो, तो यही निष्ठा अंततः सब कुछ प्रदान कर देती है। सिद्धांत, धार्मिक रूप और परंपराएं कोमल पौधे की रक्षा करने वाली बाड़ की तरह हैं, लेकिन बाद में इन्हें तोड़ना ही पड़ता है, ताकि पौधा एक विशाल वृक्ष बन सके। इसी तरह विभिन्न धर्म, बाइबिल, वेद, और मत केवल छोटे पौधे के लिए बनाए गए गमले हैं। पर पौधे को अंततः गमले से बाहर निकलना ही होता है। निष्ठा का अर्थ है संघर्षरत आत्मा को उसके मार्ग पर सुरक्षित रखना। लहर को नहीं, सागर को देखो। चींटी और देवदूत में कोई भेद मत देखो। कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कैसे कहा जा सकता है? हर प्राणी अपने स्थान पर महान है।

आत्मा देश और काल से परे है और सर्वत्र व्याप्त है। हम कहीं सीमित नहीं हैं। हम जादूगर हैं, जो अपनी चेतना की छड़ी से इच्छानुसार दृश्य रचते हैं। हम उस मकड़ी की तरह हैं, जिसने अपना विशाल जाल बुना है और जिसकी किसी भी डोरी पर वह जा सकती है। मकड़ी अभी केवल उसी स्थान को जानती है, जहां वह बैठी है, लेकिन समय आने पर वह पूरे जाल को जान लेगी। वैसे ही हम अभी केवल शरीर तक सीमित चेतना रखते हैं और एक ही मस्तिष्क का उपयोग करते हैं। पर जब हम अतिचेतना को प्राप्त कर लेते हैं, तब सब कुछ जानते हैं और सभी मस्तिष्कों का उपयोग कर सकते हैं।
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आज भी हम चेतना को थोड़ा-सा धक्का दे सकते हैं और वह आगे बढ़कर अतिचेतन स्तर पर कार्य करती है। हम केवल होने का प्रयास कर रहे हैं, और कुछ नहीं। वहां कोई अहं नहीं रहता। हम एक शुद्ध स्फटिक की तरह हो जाते हैं, जो सब कुछ प्रतिबिंबित करता है, फिर भी स्वयं वही रहता है। जब यह अवस्था आ जाती है, तब करने के लिए कुछ नहीं बचता। शरीर मात्र एक यंत्र बन जाता है, शुद्ध और उसकी चिंता से मुक्त। वह फिर अपवित्र नहीं हो सकता। जैसे पानी उबलते समय पहले एक बुलबुला बनाता है, फिर दूसरा, फिर और अधिक, और अंत में सारा पानी भाप बनकर ऊपर उठ जाता है। एक समय ऐसा आएगा, जब सब बुलबुले बनेंगे और ऊपर उठ जाएंगे। लेकिन सृष्टि सदैव नई रहती है, और नया पानी फिर से इस प्रक्रिया से गुजरेगा।

किसी को कम न आंकें
किसी को छोटा मत समझें। जीवन में जिसे भी अहंकार हुआ, वह समय की मार की सच्चाई से अवगत हुआ। साहसी व सच्चे रहें, फिर हर मार्ग आपके लिए सदैव खुला रहेगा। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं और अपनी जिंदगी के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी रंग भरें। अडिग विश्वास और असाधारण प्रयास से जीवन में चमत्कार होते हैं।
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