हम सर्वत्र ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो मनुष्य को ऊपर उठाए। हम ऐसे सिद्धान्त चाहते हैं जो मनुष्य के उन्नति का मार्ग बताएं।
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पर उनके बाद वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने इस फार्मूले को सिद्ध किया। आइंस्टीन की खोज E=mc2 से ही दुनिया को महासंहारक परमाणु अस्त्र और आणविक उर्जा की अपेक्षाकृत कम पर्यावरण प्रदूषित ऊर्जा की प्राप्ति सम्भव हुई। टेस्ला और बिजली बल्ब के आविष्कारक वैज्ञानिक एडिसन को लेकर भी यह बहस चलती ही है कि दुनिया के महान वैज्ञानिक कौन है वह जिसने दुनिया को बिजली के बल्ब से रोशन किया अथवा वह जिसने डी सी बिजली को ए सी (अल्टरनेट करेंट) में बदल कर बिजली को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचना संभव किया?
जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका पहुंचे थे
स्वामी विवेकानंद के अमेरीका पहुंचने से पहले टेस्ला ए सी की खोज कर चुके थे। निकोला टेस्ला के लिए "ब्रह्मांड बस एक महान फिल्म है, जो कभी अस्तित्व में आया और कभी खत्म नहीं होगा।" उनका भविष्य के वैज्ञानिकों के लिए सुझाव है कि यदि ब्रह्मांड के रहस्यों को खोजना चाहते हो, तो ऊर्जा, आवृत्ति और कंपन के संदर्भ में खोजो। जिस दिन विज्ञान गैर भौतिक घटनाओं का अध्ययन करना शुरू कर देगा, वह अपने अस्तित्व की सभी शताब्दियों की तुलना में एक ही दशक में सबसे अधिक प्रगति करेगा।
वैदिक ऋषि दीर्घतस् अपने योग बल से यह देख पाए कि सूर्य के चारों ओर ऊर्जा का अक्षय भंडार है। आज पर्यावरण के लिहाज से सबसे सुरक्षित और सस्ती ऊर्जा का स्रोत 'सौर ऊर्जा' को ही माना जा रहा है। दुनिया में आज एक सूर्य, एक विश्व और एक ग्रिड की बात पुरजोर तरीके से उठ रही है। इस अर्थ में वैज्ञानिक टेस्ला की यह खोज भी महत्वपूर्ण होती जब वे बिजली के ऐसे टावर के निर्माण करने जा रहे थे। जहां बिना तारों के बिजली की अबाध आवाजाही सम्भव होती।
तब बिजली के बिना तारों की दुनिया आज की दुनिया से कितना अलग होती! इतिहास के जिस मोड़ पर एक धर्म प्रचारक सन्यासी और सदी के महान वैज्ञानिक के बीच समान विचारों का आदान-प्रदान हो रहा हो वह क्षण सचमुच कितना महत्वपूर्ण होगा! पर सच यह है कि कोई युग महज इस नाते महत्वपूर्ण नहीं होता कि इस युग में कितनी लड़ाइयां हुई। किस राजा-महाराजा को क्या कुछ हासिल हुआ, बल्कि इस नाते ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि उस युग विशेष ने किन महापुरुषों को पैदा किया? जिन महापुरुषों ने युग की धारा ही नहीं बदली, बल्कि जिनके सद्प्रयासों से युग परिवर्तन की धारा आने वाली कई शताब्दियों तक प्रवाहित होती रही।
1893 का स्वर्णिम काल
इस लिहाज से देखा जाए तो सन् 1893 का साल भारतीय इतिहास का ऐसा ही स्वर्णिम काल रहा है। सन् 1893 में ही महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर जाते हैं। स्वामी विवेकानंद का अमेरीका के शहर शिकागो के विश्व धर्म संसद में महत्वपूर्ण भाषण होता है। सन् 1893 में महर्षि अरविंद कैम्ब्रिज की शिक्षा पूरी कर भारत लौटते हैं। सन् 1893 में ही यूरोपीय सभ्यता के खोखलेपन, हृदयहीन शोषण और अमानवीय अन्याय-अत्याचार से पीड़ित- क्षुब्ध आयरिस महिला एनी बेसेन्ट भारत आती है।
ये सभी महाप्रभु-भगिनी भारत की आध्यत्मिक चेतना से ओतप्रोत होकर दुनिया को नया संदेश और नई दिशा देने की ओर उन्मुख दिखाई देते हैं। एक ऐसी धारा जो दुनिया को आधात्मिक चेतना से आप्लावित कर दें। जो आने वाली कई शताब्दियों तक दुनिया का मार्गदर्शन करती रहे। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ही कहें तो "हमें मनुष्य का निर्माण करने वाला धर्म चाहिए।"
हम सर्वत्र ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो मनुष्य को ऊपर उठाए। हम ऐसे सिद्धान्त चाहते हैं जो मनुष्य के उन्नति का मार्ग बताएं। ऐसे विश्वासी-उत्साही सौ नवजवानों के बूते ही स्वामी विवेकानंद दुनिया को बदलने का संकल्प लेकर पैदा हुए। कम उम्र ही उनकी कृति की पताका दुनिया में फहराने लगी। आज दुनिया जिस भयावह दौर से गुजर रही है, उससे निजात पाने के लिए स्वामी विवेकानंद नए अवतार की आवश्यकता महसूस हो रही है।
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