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अमर जवान ज्योति की ज्वाला: नेशनल वॉर मेमोरियल पर ज्वाला जले, इसमें परेशानी क्या है?

सार

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नरेंद्र मोदी सरकार ने शहीद भारतीय सैनिकों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। 50 वर्षों से नई दिल्ली के दिल में बने इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्योति की ज्वाला अब निकट बने नेशनल वॉर मेमोरियल में प्रज्वलित होगी। इस निर्णय से विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस पार्टी एकाएक मोदी सरकार पर हमलावर हो गई है।
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देश के बनाए अपने नेशनल वॉर मेमोरियल पर शहीद भारतीय सैनिकों की याद में ज्योति प्रज्वलित करने में आखिर ऐतराज क्यों है? - फोटो : विवेक निगम
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विस्तार
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नरेंद्र मोदी सरकार ने शहीद भारतीय सैनिकों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। 50 वर्षों से नई दिल्ली के दिल में बने इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्योति की ज्वाला अब निकट बने नेशनल वॉर मेमोरियल में प्रज्वलित होगी। इस निर्णय से विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस पार्टी एकाएक मोदी सरकार पर हमलावर हो गई है।

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पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से मोदी सरकार पर तंज कसा कि बहुत दुख की बात है कि हमारे वीर जवानों के लिए जो अमर ज्योति जलती थी, उसे आज बुझा दिया जाएगा। कुछ लोग देशप्रेम व बलिदान नहीं समझ सकते- कोई बात नहीं…हम अपने सैनिकों के लिए अमर जवान ज्योति एक बार फिर जलाएंगे।

वैसे, राहुल गांधी के विरोध में कुछ नयापन नहीं है। वो तो मोदी सरकार के हरेक निर्णय का विरोध करते हैं। राहुल गांधी के अलावा कुछ पूर्व सैनिकों और बुद्धिजीवियों ने भी मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय का विरोध करते हुए पुनर्विचार का आग्रह किया था, जिसे भी माना नहीं गया।

हालांकि, यह भी सोचनीय है कि देश को अंग्रेजों से मुक्त हुए 75 साल हो गए हैं। इन दिनों हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, ऐसे में अंग्रेजी हुकूमत की निशानी इंडिया गेट, जिसे अंग्रेज दिल्ली मेमोरियल कहते थे, के बजाय देश के बनाए अपने नेशनल वॉर मेमोरियल पर शहीद भारतीय सैनिकों की याद में ज्योति प्रज्वलित करने में आखिर ऐतराज क्यों है?

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इतिहास के झरोखे से 

138 फीट (42 मीटर) ऊंचे इंडिया गेट का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने उन्हीं सर एडविन लुटियंस से करवाया था, जिन्होंने नई दिल्ली को डिजाइन किया, जिसे आज भी हम लुटियंस डेली के नाम से संबोधित करते हैं।

दरअसल, तब ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1914 और 1919 के बीच लड़े गए प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे अफगान युद्ध में ब्रिटिश सेना की तरफ से शहीद हुए 84,000 भारतीय सैनिकों की याद में इस युद्ध स्मारक का निर्माण कराया था।

पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित इंडिया गेट आज के राजपथ, जिसे अंग्रेज किंग्सवे कहते थे, पर बनाया गया था। इम्पीरियल वॉर ग्रेव कमीशन ने उस दौरान दुनिया के कई शहरों में वॉर मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया और सर लुटियंस को इनके डिजाइन का कार्य सौंपा गया था।

वर्ष 1921 में ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया के तृतीय पुत्र ड्यूक ऑफ कनॉट ने इंडिया गेट की आधारशिला रखी थी और इसका निर्माण वर्ष 1931 में पूर्ण हुआ था। इंडिया गेट पर 13,516 ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम अंकित हैं। साथ ही, इंडिया गेट पर ब्रिटिश सरकार ने लिखवाया था, ‘भारतीय सेनाओं के शहीदों के लिए, जो फ्रांस और फ्लैंडर्स मेसोपोटामिया फारस पूर्वी अफ्रीका गैलीपोली और निकट पूर्व व सुदूर पूर्व की अन्य जगहों पर शहीद हुए और उनकी पवित्र स्मृति में भी जिनके नाम दर्ज हैं और जो तीसरे अफगान युद्ध में भारत में या उत्तर-पश्चिमी सीमा पर मृतक हुए।’

नेशनल वॉर मेमोरियल वर्ष 1947 में आजादी के बाद से अब तक देश के लिए वीरगति प्राप्त करने वाले 26,466 भारतीय सैनिकों के सम्मान में बनाया गया। - फोटो : Vinod Pathak
वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति का निर्माण हुआ, जिसे इस युद्ध में शहीद हुए 3843 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 फरवरी 1972 को इसका उद्घाटन किया और तब पहली बार अमर जवान ज्योति पर ज्वाला प्रज्वलित की गई थी।

करीब 50 वर्ष से यह ज्वाला प्रज्वलित हो रही थी और 26 जनवरी, 15 अगस्त, भारत-पाक युद्ध के विजय दिवस 16 दिसंबर सहित विशेष अवसरों पर प्रधानमंत्री, सैन्य प्रमुख, अन्य राजनेता अमर जवान ज्योति आते रहे हैं। दिल्ली भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह खास जगह बनी रही है। प्रत्येक शाम इंडिया गेट के करीब पिकनिक सा नजारा देखा जा सकता है।


नेशनल वॉर मेमोरियल

ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियंस के विपरीत नेशनल वॉर मेमोरियल का डिजाइन वीबी डिजाइन लैब, चेन्नई के योगेश चंद्रहासन ने किया है। नेशनल वॉर मेमोरियल के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने इंटरनेशनल डिजाइन कॉम्पिटिशन आयोजित की थी, जिसमें वेब डिजाइन लैब को अप्रैल 2018 विजेता घोषित किया गया।

नेशनल वॉर मेमोरियल वर्ष 1947 में आजादी के बाद से अब तक देश के लिए वीरगति प्राप्त करने वाले 26,466 भारतीय सैनिकों के सम्मान में बनाया गया। नेशनल वॉर मेमोरियल पर वर्ष 1947-48, वर्ष 1961 (गोवा), वर्ष 1962 (चीन), वर्ष 1965, वर्ष 1971, वर्ष 1987 (सियाचिन), वर्ष 1987-88 (श्रीलंका), वर्ष 1999 (कारगिल) और युद्ध रक्षक जैसे अन्य युद्धों में शहीद हुए सैनिकों के नाम, आजादी के बाद शहीद हुए 13,300 भारतीय सैनिकों के नाम पत्थरों पर अंकित किए गए हैं।

25 फरवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेशनल वॉर मेमोरियल का उद्घाटन किया। खास बात यह है कि यह वॉर मेमोरियल इंडिया गेट के बेहद करीब छतरी (चंदवा) के आसपास बना है। अब सभी विशेष अवसरों पर प्रधानमंत्री, सैन्य प्रमुख, विदेशी राष्ट्राध्यक्ष 44 एकड़ में बने नेशनल वॉर मेमोरियल पर सैनिकों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

यह भी गौर करने वाली बात है कि इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के निर्माण से 12 वर्ष पहले वर्ष 1960 में सशस्त्र बलों ने पहली बार नेशनल वॉर मेमोरियल का प्रस्ताव रखा था, लेकिन देश की सरकारों को नई दिल्ली में अपना स्वयं का नेशनल वॉर मेमोरियल बनाने में छह दशक लग गए। अमर जवान ज्योति की ज्योति को नेशनल वॉर मेमोरियल के साथ समाहित करने को लेकर मोदी सरकार ने कांग्रेस समेत सभी आलोचकों पर पलटवार किया है।
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क्या हमारी पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्मारकों के निर्माण पर एकमत नहीं हो सकते? - फोटो : विवेक निगम
सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि अमर जवान ज्योति की लौ बुझ नहीं रही है। इसे नेशनल वॉर मेमोरियल की ज्वाला में मिलाया जा रहा है। सरकार की ओर से कहा गया है कि ये अजीब बात थी कि अमर जवान ज्योति की लौ ने वर्ष 1971 और अन्य युद्धों में जान गंवाने वाले जवानों को श्रद्धांजलि दी, लेकिन उनका कोई भी नाम वहां मौजूद नहीं है।

ये विडंबना ही है कि जिन लोगों ने 7 दशकों तक नेशनल वॉर मेमोरियल नहीं बनाया, वे अब हंगामा कर रहे हैं, जब युद्धों में जान गंवाने वाले हमारे भारतीय सैनिकों को स्थायी और उचित श्रद्धांजलि दी जा रही है।
 
कांग्रेस और अन्य आलोचकों को प्रधानमंत्री कार्यालय के ट्विटर हैंडल से जवाब दिया गया कि आजादी के बाद दिल्ली में कुछ गिने-चुने परिवारों के लिए ही नव-निर्माण हुआ, लेकिन आज देश उस संकीर्ण सोच को पीछे छोड़कर, नए गौरव स्थलों का निर्माण कर रहा है, उन्हें भव्यता दे रहा है। ये हमारी ही सरकार है, जिसने दिल्ली में बाबा साहेब मेमोरियल का निर्माण किया। ये हमारी ही सरकार है जिसने रामेश्वरम में एपीजे अब्दुल कलाम स्मारक को बनवाया।

इसी तरह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और श्यामजी कृष्ण वर्मा से जुड़े स्थानों को भव्यता दी गई है। हमारे आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने के लिए देशभर में आदिवासी म्यूजियम्स भी बनाए जा रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सभी लोग मोदी सरकार के इस निर्णय के विरोध में हैं। पक्ष में भी बड़ी संख्या में आवाजें बुलंद हो रही हैं। भारतीय सेना के पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) विनोद भाटिया ने तो मोदी सरकार के इस निर्णय को अच्छा फैसला बताया है। गंभीर सवाल यह भी है कि अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के बाद हमें अपने स्तंभ खड़े करने में इतना समय क्यों लगा या लग रहा है?

अंग्रेजों की बनाई पार्लियामेंट का विकल्प हम 75 साल बाद खड़ा करने जा रहे हैं। कांग्रेस ने सरकार में रहते नई पार्लियामेंट का प्रस्ताव रखा था, पर वो अब इसका भी विरोध कर रही है। क्या हमारी पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्मारकों के निर्माण पर एकमत नहीं हो सकते?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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