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National voluntary blood donation day 2019ः भारत में नहीं है स्वैच्छिक रक्तदान को लेकर जागरूकता

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प्रतिवर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत रक्त की कमी रह जाती है। - फोटो : फाइल फोटो
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रक्तदान जिंदगी से जूझ रहे लोगों को नया जीवन प्रदान करता है। इसलिए रक्तदान को महादान व जीवनदान कहा गया है। भारत में प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस मनाया जाता है। समाज में महान परिवर्तन लाने, जीवनरक्षी उपायों का अनुसरण करने और हिंसा और चोट के कारण गंभीर बीमारी, बच्चे के जन्म से संबंधित जटिलताओं, सड़क यातायात दुर्घटनाओं और कई आकस्मिक परिस्थितियों से निकलने में रक्तदान की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाना ही इस दिवस का उद्देश्य है।

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गौरतलब है कि तंजानिया में 80 प्रतिशत लोग रक्तदान के लिए पैसे नहीं लेते हैं। वहीं, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में तो यह कानून है कि कोई भी रक्तदान के लिए पैसों की मांग नहीं कर सकता। इसके विपरीत भारत में रक्तदान के लिए पैसे लेने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है।


यह शर्मनाक है कि भारत जैसे देश में रक्त का व्यापार हो रहा है। निश्चित ही मशीनी युग ने हमारी सोच को विकृत करने व संवेदना को निगलने का काम किया है, तभी तो जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे किसी व्यक्ति के प्राण बचाने के लिए हमें पैसे लेने की ज़रूरत पड़ रही है। समय पर रक्त नहीं मिलने व पैसे नहीं जुटा पाने के कारण भारत में प्रतिवर्ष 15 लाख लोगों की मौत रक्त की कमी के कारण हो जाती है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंड के अनुसार, किसी भी देश में किसी भी स्थिति में उसकी जनसंख्या का कम से कम 1 प्रतिशत रक्त आरक्षित होना ही चाहिए। उक्त मानक के अनुसार, हमारे देश में कम से कम 1 करोड़ 30 लाख यूनिट रक्त का हर समय आरक्षित भंडार होना चाहिए। लेकिन, पिछले वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, हमारे पास प्रतिवर्ष रक्त की औसतन 90 लाख यूनिट ही उपलब्ध हो पाती है। 


प्रतिवर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत रक्त की कमी रह जाती है। रक्त की कमी के अलावा दूसरी चिंताजनक बात, रक्त की शुद्धता है, इसलिए संक्रमित रक्त चढ़ाने से होने वाली मौतों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता हैं।
 

भारत में कुल जनसंख्या के अनुपात में एक प्रतिशत आबादी भी रक्तदान नहीं करती है। - फोटो : फाइल फोटो
भारत में क्या है रक्तदान की स्थिति 
भारत में रक्तदान करने वाले राज्यों के आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश में वर्ष 2006 में 56.2 प्रतिशत, वर्ष 2007 में 65.17 प्रतिशत, वर्ष 2008 में 68.75 प्रतिशत के लगभग रहा। वहीं, हरियाणा की स्थिति में इजाफा हुआ, जिसने अब तक के सर्वाधिक 210 यूनिट का रिकॉर्ड 256 के साथ तोड़ दिया, जो कि काबिले तारीफ है। जबकि राजस्थान के चूरू का आंकड़ा 80 प्रतिशत तक का है।
 
दरअसल, चुरू में 2015 7 हजार 219 रक्तदाता ने रक्तदान किया। अन्य राज्यों की हालत फिसड्डी हैं। चिंताजनक है कि भारत में कुल जनसंख्या के अनुपात में एक प्रतिशत आबादी भी रक्तदान नहीं करती है। जबकि थाईलैण्ड में 95 फीसदी, इण्डोनेशिया में 77 फीसदी और म्यांमार में 60 फीसदी हिस्सा रक्तदान से पूरा होता है। भारत में मात्र 46 लाख लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। इनमें महिलाएं मात्र 06 से 10 प्रतिशत हैं।
 
भारत में है ब्लड बैंक की समस्या 
इसके अलावा हमारे देश में पर्याप्त मात्रा में ब्लड बैंक नहीं होने की अलग समस्या है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में देश में सभी ब्लड बैंकों ने कुल मिलाकर 28 लाख यूनिट से ज्यादा खून बर्बाद किया है। अगर इसे लीटर से जोड़ा जाए तो पांच सालों में करीब 6 लाख लीटर खून बर्बाद हुआ है, जो पानी के 56 टैंकरों के बराबर है।
 
देश के तेलंगाना राज्य में 31 जिले हैं, जिनमें से 13 जिले में तो ब्लड बैंक हैं ही नहीं। वहीं, छत्तीसगढ़ में 11 जिले, मणिपुर और झारखंड में 9-9 जिले, यूपी के चार जिले ऐसे हैं, जहां ब्लड बैंक का कोई अता-पता ही नहीं है। इसके अलावा नागालैंड, उतरांचल, त्रिपुरा, कर्नाटक के प्रत्येक तीन जिलों में ब्लड बैंक की तो कोई सुविधा ही नहीं है।
 
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भारत में रक्तदान को लेकर अभी तक पूरी तरह से जागरूकता आनी बाकी है। - फोटो : अमर उजाला
सिक्कम के दो जिलों और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के एक-एक जिले में ब्लड बैंक उपलब्ध ही नहीं है। वहीं, बिहार, असम और मेघालय में से प्रत्येक राज्य के पांच जिले में ब्लड बैंक नहीं है।

अगर रक्त की बर्बादी में राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र, यूपी, कर्नाटक जैसे राज्य इनमें सबसे आगे हैं। इन राज्यों में सिर्फ खून की ही बर्बादी नहीं हुई है, बल्कि रेड ब्लड सेल्स और प्लाज्मा भी काफी मात्रा में बर्बाद हुए हैं।

ब्लड कलेक्शन में महाराष्ट्र का आंकड़ा भले ही 10 लाख लीटर के पार गया हो, लेकिन रक्त की बर्बादी करने में भी यह कहीं न कहीं टॉप पर रहा है, जिसके बाद कहीं जाकर पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश का नंबर आता है। 

भारत में नहीं है जागरूकता 
भारत में रक्तदान को लेकर अभी तक पूरी तरह से जागरूकता आनी बाकी है। अधिकांश लोगों में अब भी यह भ्रांति फैली हुई हैं कि रक्तदान करने से शरीर में रक्त की कमी हो जाती है, जो कि बिलकुल गलत है।

रक्तदान करने से रक्त बढ़ता है और शरीर में नये रक्त का संचार होता है। रक्तदान करने के बाद तकरीबन 21 दिनों के भीतर ही शरीर पुनः रक्त निर्माण कर लेता है। यह दिल को मजबूत कर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव करता है।

नियमित अंतराल पर रक्तदान करने से शरीर में आयरन की मात्रा संतुलित रहती है और रक्तदाता को हृदय आघात से दूर रखता है। नियमित रूप से रक्तदान करने के बाद शरीर में जो नया खून बनता है वह स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है।

यह वजन को नियंत्रण में करने में भी मददगार है, इसलिए किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को रक्तदान करने से कतई कतराने की आवश्यकता महसूस नहीं होनी चाहिए। अत: सरकारी प्रयासों को भी गति देनी होगी। देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी सर्वसुविधायुक्त ब्लड बैंक स्थापित करने होंगे।

भारत जैसे भौगोलिक विभिन्नता वाले विशाल देश में जहां कई क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं अक्सर दस्तक देती हैं, उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में हमारे जवान कर्तव्य निभाते हुए खून बहाते हैं तथा हमारे अस्थिर पड़ोसी देश हमेशा युद्ध जैसे हालात पैदा करते हैं, ऐसे में रक्त का पर्याप्त आरक्षित भंडार होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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