राष्ट्रीय टेक्नॉलॉजी डे भारत के वैज्ञानिकों को याद करने का भी दिन है।
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पिछले कुछ समय में भारत ने अपनी उन्नत स्वदेशी प्रौद्योगिकी का परिचय देते हुए अंतरिक्ष के क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ दिए है। देश को यही जरुरत बाकी दूूसरे क्षेत्रों के लिए भी है जब हम अपनी स्वदेशी तकनीक पर काम कर सकें।
हम स्वदेशी प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहें है। लेकिन ये कामयाबियांं अभी मंजिल तक पहुंंचने का पड़ाव भर है और हमें काफी बड़ा रास्ता तय करते हुए विश्व को यह दिखाना है कि भारत में प्रतिभा और क्षमता की कोई कमी नहीं है।
टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ने के बाद भी भारत दुनिया के कई देशों से पिछड़ा हुआ है और उसे अभी बहुत से लक्ष्य तय करने होंगे। वर्तमान में हम अपनी जरूरतों का लगभग 60 फीसदी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात कर रहे हैं।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना और लगभग तीन लाख करोड़ रुपये के सालाना रक्षा बजट के बावजूद यहां करीब 60 फीसदी सैन्य उपकरण आयातित होते हैं। देश में डिफेंस इंडस्ट्री पूरी तरह से विकसित न हो पाने की वजह से हथियारों के लिए भारत की निर्भरता दूसरे देशों पर लगातार बनी हुई है। भारत हथियार और रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक देश है।
देश की समग्र उन्नति और आर्थिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना बहुत जरूरी है। इसको प्रभावी बनाने के लिए कॉलेजों में हाफ-हाफ सिस्टम होना चाहिए मतलब कि आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाए और आधे समय में उसी ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिन्दगी में कराया जाए।
चीन ने इस प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया और आज स्थिति यह है कि उत्पादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है, अभी भी भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे पड़े है, लेकिन कोरोना संकट के बाद अब भारत को चीन से आयात अगर पूरी तरह से बंद न हो सकें तो कम जरूर कर देना चाहिए।
ऐसी स्थिति में भारत को बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ाना होगा साथ ही गुणवत्ता भी सुनिश्चित करनी होगी। अब देश में तकनीकी और इंजीनियरिंग शिक्षा के ढांचे को ठीक करना होगा क्योंकि अब शिक्षा में इनोवेशन की जरुरत है सिर्फ रटें रटाए ज्ञान की बदौलत हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना साकार नहीं कर सकते ।
भारत ने परमाणु शक्ति बनकर निसंदेह दुनिया में आज अपनी धाक जमा ली है, लेकिन देश अब भी कई देशों से कई मोर्चे पर पिछड़ा हुआ है। तकनीक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को अभी बहुत काम करने हैंं।
अमेरिका,चीन ,जापान जैसे विकसित देशों की व्यवस्था स्थापित करने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी। मसलन चीन ने राडार की पकड़ में न आने वाला ‘स्टेल्थ’ विमान विकसित कर लिया है जो अब तक केवल अमेरिका के पास था। भारत को विश्व शक्ति बनने के लिए दूसरों से श्रेष्ठ हथियार प्रौद्योगिकी भी विकसित करनी पड़ेगी ।
कोरोना संकट के समय में आरोग्य सेतु एप कारगर हथियार साबित हुआ है।
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अंतरिक्ष के क्षेत्र में हालिया कई कामयाबियांं देश के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इनमें स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का प्रयोग किया गया है। ये कामयाबियांं देश में स्वदेशी तकनीक के साथ साथ आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम की भी पुष्टि करतीं हैं।
इससे पता चलता है कि अगर सकारात्मक सोच और ठोस रणनीति के साथ हम लगातार अपनी प्रौद्योगीकीय जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाते रहें तो वो दिन दूर नहीँ जब हम खुद अपने नीति नियंता बन जाएंगे और दूसरे देशों पर किसी तकनीक,हथियार और उपकरण के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी। क्योंकि भारत पिछले छह दशक के दौरान अपनी अधिकांश प्रौद्योगीकीय जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से कर रहा है।
रक्षा जरूरतों के लिए भारत का दूसरों पर निर्भर रहना कई मायनों में खराब है एक तो यह कि अधिकतर दूसरे देश भारत को पुरानी प्रौद्योगिकी ही देने को राजी है, और वह भी ऐसी शर्ता पर जिन्हें स्वाभिमानी राष्ट्र कतई स्वीकार नहीं कर सकता।
हमारे घरेलू उद्योगों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी है इसलिए देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय उद्योग के कौशल संसाधनों एवं प्रतिभाओं का बेहतर उपयोग करना जरुरी है । क्योंकि आयातित टैक्नोलाजी पर हम ब्लैकमेल का शिकार भी हो सकते है।
सुरक्षा मामलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सरकार और ऐकडेमिक जगत की भी बराबर की साझेदारी होनी चाहिए । इसके लिए मध्यम और लघु उद्योगों की प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण व स्वदेशीकरण में अहम भूमिका हो सकती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकी ढाँचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित। इसके बावजूद प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने काफी कम समय में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की।
स्वतंत्रता के बाद भारत का प्रयास यही रहा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन भी लाया जाए। जिससे देश के जीवन स्तर में संरचनात्मक सुधार हो सके। अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दबाव के कारण आज टेक्नोलॉजी की जरुरत बढ़ गई है।
वास्तव में वैज्ञानिक गतिविधियों को बनाए रखने के लिए तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय जन मानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अनिवार्य है। वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीय ज्ञान के सतत विकास और प्रसार के लिए हम सब को आगे आना होगा।
एक व्यक्ति और एक संस्था से ही यह काम सफल नहीं हो सकता है इसमें हम सब की सामूहिक और सार्थक भागीदारी की जरुरत है ।
कोरोना संकट के समय देश में स्वदेशी प्रौद्योगिकी को बड़े पैमाने पर विकसित करने की जरुरत है और इस दिशा में जो भी समस्याएं है उन्हें सरकार द्वारा अबिलम्ब दूर करना होगा तभी सही मायनों में हम कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती को भी दूर कर पाएंगे । हमें हमेशा यह बात याद रखनी होगी कि स्वदेशी व आत्मनिर्भरता का कोई विकल्प नहीं है।
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ विश्वविद्यालय में निदेशक और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं! )