पिछले पन्ने के बाद विराम लंबा हुआ। ये विराम केवल प्रकाशन पर था। विचारों का प्रवाह इतना तीव्र है कि कोई विचार मन से की-बोर्ड पर उतरे, उससे पहले ही एक नई तेज लहर आकर उस विचार को बहा ले जाती है। फिर अगला। फिर एक और थपेड़ा।
हर एक के मन में चल रहे जान और जहान के संघर्ष के बीच सामने दृश्य बायस्कोप की तरह तेजी से बदल रहे हैं। इन दृश्यों को कौन बदल रहा है, कहां से ये सब संचालित हो रहा है पता नहीं। पर ऐसा लग रहा है इसे कोई रोक नहीं पा रहा, ना किसी का बस चल रहा है।
हम इस बायस्कोप के एक गोले में अपना मुंह धंसाए, आंख गड़ाए देखे जा रहे थे और कब वुहान के अजीबोगरीब दृश्य बदल कर इटली से होते हुए हमारी अपनी तस्वीर दिखाने लगे, पता ही नहीं चला!! 50 दिन होने को आए और अब भी हम खुद को च्यूंटी काट कर पूछ रहे हैं कि ये हो क्या रहा है?
कब हम जनता कर्फ्यू को एक नया अनुभव मान कर इस तालाबंदी में चले गए और कब हम ताली और थाली बजाकर दिए जलाते हुए रिमोट से बदलते चैनल और व्हॉट्स एप संदेशों की बाढ़ में डूब गए, पता ही नहीं चला!!
दिल्ली से पलायन करते मजदूरों की तस्वीरों में छाले पड़ गए और अचानक औरंगाबाद में उनके ऊपर से रेल गुजर गई। पटरी पर पड़ी उनकी रोटियां भूख और बेबसी का प्रतीक बन गईं। टाटपट्टी बाखल के थूक के छींटे पहले सूखेंगे या फिर कोरोना में अपनों को खोने वालों के आंसू, तय करना मुश्किल है। इस बीच अव्यवस्था की गैस विशाखापट्टनम की एलजी पॉलीमर्स से लीक होकर मासूमों की जान ले गई जिसकी दुर्गंध जिम्मेदारों के मास्क के अंदर जा नहीं पाई।
लोग कहते हैं कि कोरोना ने सब कुछ थाम दिया। पर फिर भी सब कुछ थमा कहां है? सब कुछ दौड़ रहा है। विचार-चक्र तेज है। जो थमा है वो दौड़ने को आतुर है। मजदूरों का धैर्य तो बहुत पहले ही चूक गया था, बाकियों के प्रेशर कूकर का वॉल्व कब फटेगा और क्या कहर ढ़ाएगा ये इस पर निर्भर है कि सेफ्टी वॉल्व लगाने के लिए जिम्मेदार लोग इसे तीसरे चरण से आगे कैसे ले जाते हैं। दरअसल कोरोना हम सभी के चरित्र के साथ ही हमारे धैर्य की परीक्षा ले रहा है। कोरोना ने हमारे धैर्य को प्रत्यंचा पर चढ़ा रखा है। हम चूके और तीर छूटा।
पिछले सौ सालों में हमने धैर्य को हाशिये पर धकेल कर सिर्फ गति का पीछा किया। तेजी से चलने वाली गाडियां। तेजी से चलने वाली मशीनें। हवाई जहाज, रेल, कार, बाइक सब तेज चाहिए, और तेज बहुत तेज। तेजी से चांद पर पहुंचें। फिर मंगल। जल्दी से दफ्तर पहुंचें और फिर जल्दी से घर। जल्दी से तरक्की मिले और जल्दी से पैसा। जल्दी गाड़ी, जल्दी बंगला।
इस रफ्तार पर कोरोना ने ऐसा ब्रेक मारा कि दुनिया सहम गई। जरा सा, ना दिखाई देने वाला एक विषाणु। सबकुछ रोक दिया। सब सम पर भी लाया। राजा-रंक सब बराबर। गोरा-काला सब बराबर। देश चलाने वालों को भी हुआ और ठेला चलाने वालों को भी। नेता-अभिनेता सब बराबर। कितना भी पैसा हो, कोई फायदा नहीं। पैसों के पीछे भागने वाले बड़े पूंजीपति भी ये सोचने को मजबूर हैं कि पैसा रह जाए और जान चली जाए तो क्या हासिल होगा। पर दुनिया-जहान का सवाल है कि जान बचाने के चक्कर में जहान पूरा ही डूब जाएगा तो क्या होगा?