महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में और अधिक कदम उठाने की आवश्यकता है।
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भारतीय संविधान और देश की बेटियां
भारतीय संविधान महिलाओं को कई अधिकार प्रदान करता है, जिनमे अनुच्छेद 14 में कानूनी समानता, अनुच्छेद 15 (3) में जाति, धर्म, लिंग एवं जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव न करना, अनुच्छेद 16 (1) में लोक सेवाओं में बिना भेदभाव के अवसर की समानता, अनुच्छेद 19 (1) में समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 21 में स्त्री एवं पुरुष दोनों को प्राण एवं दैहिक स्वाधीनता से वंचित न करना, अनुच्छेद 29-30 में शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार, अनुच्छेद 32 में संवैधानिक उपचारों का अधिकार, अनुच्छेद 39 (घ) में पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार, अनुच्छेद 40 में पंचायती राज्य संस्थाओं में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था, अनुच्छेद 42 में महिलाओं हेतु प्रसूति सहायता प्राप्ति की व्यवस्था, अनुच्छेद 51 (क) (ड) में भारत के सभी लोग ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों इत्यादि प्रमुख हैं।
2050 में, भारत हमारे संविधान के 100 साल पूरे होने का जश्न मनाएगा। हमारा संविधान, सभी नागरिकों को समानता की गारंटी देता है फिर भी अंतराल लगभग हर जगह मौजूद हैं। विश्व स्तर पर, भारत जन्म के समय लड़कों और लड़कियों के सबसे विषम अनुपात के लिए पांचवें स्थान पर है, और औसतन, देश भर में हर घंटे महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ 22 अपराध किए जाते हैं। भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर भारत में 54 प्रतिशत है।
एक सर्वे के अनुसार राजधानी दिल्ली में 55 प्रतिशत महिलाओं ने सार्वजनिक स्थानों पर यौन या शारीरिक हिंसा का अनुभव किया है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नीतिगत पहलों की स्पष्ट रूप से आवश्यकता है क्योंकि भारत में लैंगिक असमानता आर्थिक विकास की पृष्ठभूमि में भी बनी हुई है।
भारतीय महिलाएं अवैतनिक देखभाल के काम का बोझ उठाती हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महिलाओं की अहम भूमिका रही है। यह अनुमान है कि भारत में महिलाएं वैश्विक औसत 40% के मुकाबले सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मात्र 17% का योगदान करती हैं।
यह एक महत्वपूर्ण अंतर को दर्शाता है। हालांकि वे खेती और डेयरी क्षेत्र में मजबूत हैं, भारत के तेजी से शहरीकरण ने अभी तक अधिक महिलाओं को श्रम बल में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया है। ग्लोबल जेंडर इक्वेलिटी इंडेक्स 2019 के अनुसार, भारत 129 देशों में से 95 वें स्थान पर है और यह वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2019-2020 में 112 वें स्थान पर है।
इन सूचकांकों से पता चलता है कि भारतीय महिलाओं को कार्यस्थल में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है या वे समान लाभ महिलाओं को प्रदान नहीं किए गए हैं जो उनके पुरुष समकक्षों को दिए जाते हैं।
यद्यपि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और स्किल इंडिया व मुद्रा लोन के बाद इसमें कुछ सुधार हुआ है, महिलाओं की उद्यमशीलता उच्च स्तर पर है। आंकड़े बताते हैं कि 2025 तक लगभग 10 करोड़ उद्यमियों को वित्त पोषित किया जाएगा, जिनमें से 50% महिलाएं होंगी।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में और अधिक कदम उठाने की आवश्यकता है। लड़कियों की स्थिति सुधारनी है तो शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर देना ही होगा, हमें अपनी सोच को बदलना होगा। बेटियां भी बुढ़ापे का सहारा बन सकती हैं, सामाजिक मान्यताएँ बदलने में समय लगता है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अब बहुत समय नहीं लगेगा।
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