वो नाना जिसे कैमरा कभी पकड़ नहीं पाया
- फोटो : Amar Ujala
1990 में फिल्म प्रहार के लिए नाना ने पुणे में मराठा लाइट इन्फैंट्री में असली मिलिट्री ट्रेनिंग ली। सुबह 4 बजे उठकर राइफल के साथ दौड़ना, ऑब्सटेकल कोर्स कम्प्लीट करना। कीचड़ में रेंगना। जवानों के साथ परेड करना। खूब मेहनत करना। तब यूनिट के अफसर ने कहा- नाना, इतना मत करो, फिल्म के लिए इतना काफी नहीं है। उसने जवाब दिया मैं फिल्म के लिए नहीं, उस 19 साल के लड़के को समझने के लिए कर रहा हूं, जो मेरी जगह बॉर्डर पर खड़ा है।
और फिर 1999, कारगिल। जब गोलियां चल रही थीं, तब वो बिना किसी अखबार को बताए, बिना कैमरे के, सीधे बटालिक पहुंच गए। 15 दिन तक बंकर में रहकर जवानों के साथ मातृभूमि की रक्षा में तैनात हो गए। जवानों ने कहा सर, आप यहां क्यों आए, यहां खतरा है। तब नाना ने कहा बेटा, खतरा है तभी तो आना था। नहीं तो ये वर्दी पहनने का हक कैसे बनता। सेना ने उन्हें सम्मान में टेरिटोरियल आर्मी में मानद कैप्टन बनाया। वो रैंक नाना को किसी स्टेज पर नहीं, एक बैरक में दी गई थी। नाना की राइफल, जो निशाना भी लगाती है और आंसू भी पोंछती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि नाना एक नेशनल लेवल का शार्प शूटर रहे हैं। जीवी मावलंकर शूटिंग चैम्पियनशिप में मेडलिस्ट। निशाना इतना सटीक इसलिए है, क्योंकि उसका मन शांत है और यही शांत मन जब 2015 में महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं देखकर अशांत हो गया, तो उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन शुरू किया। ये दान नहीं था, ये प्रायश्चित था।
वो खुद विदर्भ और मराठवाड़ा के उन घरों में गए, जहां अभी-अभी मातम बिछा था। उसने चेक नहीं थमाया, विधवा महिलाओं के हाथ में सिलाई मशीन थमाई और कहा रोना बंद करो, चलाना सीखो। उसने जेसीबी नहीं बुलाई, गांव वालों के साथ खुद फावड़ा लेकर नदी-नाले खोदे। ताकि अगली बार बारिश का पानी बह कर अरब सागर में न जाए, गांव के खेत में रहे। आज मराठवाड़ा के 500 से ज्यादा गांवों में जो पानी है, उस पानी में नाना का पसीना मिला हुआ है। आखिर में नाना पाटेकर महान अभिनेता इसलिए नहीं है कि वो अच्छा अभिनय करते रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों सहित अन्य पुरस्कारों से नवाजे गए हैं।
वो महान इसलिए हैं, क्योंकि इस चकाचौंध की दुनिया में भी वो अपनी मिट्टी से बेवफाई नहीं कर पाए। अंतिम समय तक वो एक सादे कुर्ते में, हाथ में राइफल, दिल में बप्पा और जेब में किसी किसान की चिट्ठी लिए जीते रहें। मुंबई के माहिम का 1BHK हम सबको याद दिलाता है- स्टार बनना आसान है, आदमी बने रहना सबसे मुश्किल अभिनय है।
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