भारत की आजादी के एक दिन पहले फिजो ने नगालैंड को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था।
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दरअसल, यह नगा बागियों की मूल मांग रही है। भारत की आजादी के एक दिन पहले फिजो ने नगालैंड को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था। उसके बाद वहां पर सुरक्षाबलों और नगा बागियों के बीच लंबा खूनी संघर्ष हुआ। हालांकि बाद के दिनों ने नगा बागी कई गुटों में विभक्त हो गए और उनके बीच जारी खूनी संघर्ष से आम नगा परेशान रहे। उसी दबाव में नगा बागियों पर भारत सरकार के साथ शांति समझौता आरंभ हुआ।
पहले नगा बागी नगालैंड की सीमा से सटे सभी राज्य के नगा बहुल इलाके को मिलकार नगालिम (ग्रेटर नगालैंड) की मांग कर रहे थे। लेकिन अन्य राज्यों के विरोध की वजह से भारत सरकार ने अन्य राज्यों के नगाओं को एक प्रशासनिक ढांचे के अंदर लाने से मना कर दिया। लेकिन नगा बागी और भारत सरकार के बीच एक प्रारूप समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। हालांकि वह समझौता आज तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हो पाया। लेकिन अब मुइवा का आरोप है कि भारत सरकार प्रारूप समझौते से पीछे हट रही है।
दूसरी तरह आम लोग वार्ता के पक्ष में हैं। यह उम्मीद बनी थी कि नगालैंड के राज्यपाल के रूप में भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी आरएन रवि को नियुक्त किए जाने के बाद वार्ता को गति मिलेगी। नए राज्यपाल नगा समस्या को अच्छी तरह से समझते हैं। इससे पहले भी वे एक अधिकारी के रूप में पूर्वोत्तर में तैनात थे। उन्हें सभी पक्षों की मानसिकता की जानकारी है। उन्हें 2014 में नगा समझौते का वार्ताकार नियुक्त किया गया था।
2005 में नगा समझौते के प्रारूप पर हस्ताक्षर के बाद से अन्य राज्यों में नगा समझौते को लेकर कई तरह की शंकाएं बनी हुई हैं। वहां के आम लोग और नागरिक संगठन इस समस्या का स्थाई समाधान चाहते हैं। पिछले छह दशक से जारी हिंसा की वजह से नगालैंड विकास की दौड़ में पिछड़ गया है। लेकिन मुइवा के ताजा बयान के बाद भारत सरकार किसी तरह से आगे बढ़ती है, यह देखना होगा। लेकिन पूर्वोत्तर में शांति के लिए यह समझौता जरूरी है।
(लेखक दैनिक पूर्वोत्तर के संपादक और पूर्वोत्तर मामले के जानकार हैं।)
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