उत्तराखण्ड के प्रति उनके भावनात्मक लगाव का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने दोनों पुत्रों की बहुएं गढ़वाल से चुनीं और इस भू-भाग से अपने पारिवारिक रिश्ते जोड़े।
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मुलायम सिंह यादव द्वारा गठित कौशिक समिति ने जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए राजधानी के लिए गैरसैण पर जोर दिया था। उस कमेटी ने गढ़वाल और कुमाऊं के बीच एक बफर डिविजन के गठन का सुझाव भी दिया था।
मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में ही पहली बार उत्तराखण्ड विकास विभाग के लिए अपर मुख्य सचिव की नियुक्ति हुई थी। इस नियुक्ति से उत्तराखण्ड के प्रति उनकी गंभीरता को आंका जा सकता है। उसके बाद काफी समय तक अतिरिक्त मुख्य सचिव का पद भारत सरकार ने समाप्त कर दिया था।
उत्तराखण्ड के लिए पहला कैबिनेट मंत्री नियुक्त करने वाले भी मुलायम सिंह यादव ही थे। उन्होंने 1989 में उत्तर प्रदेश की कमान संभालने पर उत्तरकाशी के बर्फिया लाल ज्वांठा को उत्तराखण्ड मंत्रालय का कैबिनेट मंत्री बनाया था, जबकि उससे पहले इस मंत्रालय को राज्यमंत्री संभालते थे।
उत्तराखण्ड के प्रति उनके भावनात्मक लगाव का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने दोनों पुत्रों की बहुएं गढ़वाल से चुनीं और इस भू-भाग से अपने पारिवारिक रिश्ते जोड़े। उनकी बड़ी बहू डिम्पल पौड़ी गढ़वाल के रावतों की बेटी और छोटी बहू अपर्णा उत्तरकाशी के बिष्टों की बेटी है।
मुजफ्फरनगर कांड के कलंक से कभी नहीं उबर पाए मुलायम
मुजफ्फरनगर कांड को लेकर उन्होंने सार्वजनिक मांगी थी जबकि आज के नेताओं से इस तरह की माफी की अपेक्षा नहीं की जाती। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर कांड समेत कई गोली कांडों के कारण उनकी छवि खलनायक की अवश्य बनी मगर वह इन कांडों के लिए अकेले दोषी नहीं थे। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन उपायुक्त दीपचंद के उस बहुचर्चित पत्र के अलोक में भी मुजफ्फरनगर कांड को देखा जाना जरुरी है।
सीबीआई जांच के अनुसार गढ़वाल के दो पुलिस अफसरों ने जवानों से स्टेनगन छीनकर आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसाईं थी। दोनों को बाद में उत्तराखंड में प्रमोशन। इनमें एक को सेवानिवृति के बाद भी दुबारा नियुक्ति मिली जबकि दूसरा दरोगा से लेकर DSP तक बना। मसूरी गोली कांड के दौरान एक गढ़वाली कॉन्स्टेबल ने बलबीर नेगी के सीने में संगीन घोंपी थी।
देहरादून का प्रेस क्लब भी मुलायम की ही देन है। वह पत्रकारों के सबसे बड़े मित्र और शुभ चिन्तक हुआ करते थे। मुझे याद है एक बार हमारी यूनियन के झांसी में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि मित्रता किसी की जाति, धर्म या राजनीतिक सम्बद्धता को देखकर नहीं होती। उन्होंने पत्रकार धुरन्धरों से पूछा कि आप हमारे पुराने मित्र हैं जबकि आपकी आरएसएस से करीबी जगजाहिर है। वास्तव में वह एक जमीनी नेता थे, इसलिए उन्हें जमीनी हकीकतों की जानकारी रहती थी।