दोनों पार्टियों में टिकट बांटने के लिए बैठकों पर बैठकें हुईं। जोड़- तोड़ जुगाडों के सत्र चले। गोपनीयता का आवरण ओढ़ा गया। हर दिन राजनीतिक हानि- लाभ का नया चौघड़िया रचने की कोशिशें हुईं। चेहरों के हिसाब से दर्पण सजाने के उपक्रम हुए। इतना कुछ हुआ कि भगवान भी अगर इस टिकट वितरण का विश्लेषण करने बैठें तो चकरा जाएं।
यानी एक दिन पहले पार्टी में शामिल को भी टिकट मिले तो उन बुजुर्गों को भी टिकट से नवाजा गया जो खुद चार धाम की यात्रा पर जाने की तैयारी में थे।
कुछ को टिकट दिया भी उस क्षेत्र से, जहां उसे अपनी नेतागिरी का नारियल फोड़ना है। एक ऐसे नाराज माने जाने वाले विधायक को भी टिकट दिया गया, जिसने नाउम्मीदी में टिकटों की घोषणा से पहले ही राजधानी में अपना सरकारी आवास खाली कर दिया था।
कहीं भाई- भाई या सगे रिश्तेदारों को लड़ा दिया गया तो कहीं सालों से मेहनत करते कार्यकर्ता के हाथ में ऐन वक्त पर तुलसी पत्र पकड़ा दिया गया। कई उन मंत्रियों और विधायकों को फिर से टिकट मिल गया, जिन्होंने पांच साल में सिर्फ माल कमाया, अकड़ दिखाई और पब्लिक की गालियां खाईं।
टिकट जुगाड़ने के लिए कहीं धमक काम आई, कहीं पैसा काम आया। कहीं सेवा का तड़का लगा तो कहीं चरणोदक काम आया। अगर इस समूची प्रक्रिया में कोई ठगा गया तो वह मतदाता।
चुनाव पर क्या होगा इसका असर?
जाहिर है कि जब दो प्रमुख दलों में इतने बड़े पैमाने पर बगावत है तो उसका असर चुनाव नतीजों पर पड़ेगा ही। अभी करीब एक दर्जन टिकटवंचित उम्मीदवार छोटे दलों के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरने का एलान कर चुके हैं। नाम वापसी तक यह संख्या और बढ़ सकती है। हालांकि, नाराजों को बिठाने और चुप कराने के लिए दोनोॆ दलों में बड़े नेता साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाने में लगे हैं।
लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ता यह बखूबी जानता है कि बड़े नेताओं द्वारा उससे किए वादे भी ज्यादातर चुनावी वादों की तरह खोखले अथवा आधे-अधूरे होते हैं। साथ में यह भी सच है कि बड़े दलों में अब वो ऋषि राजनेता नहीं रहे, जिनकी कार्यकर्ता के मन पर पकड़ थी और जो शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ता के बीच रेशमी धागे का काम करते थे। जो गरल को भी अमृत के भाव से पी सकते थे, पिला सकते थे।
ऐसे दिग्गत नेताओं का नैतिक प्रभाव खत्म होने के बाद आजकल कार्यकर्ताओं को मनाने का फार्मूला मोटे तौर पर अगले चुनाव में टिकट के वादे, सत्ता में आने पर किसी पद की रेवड़ी, किसी कार्यकर्ता के घर जाकर चाय आदि पीने की दरियादिली या फिर बात-बेबात उसकी पीठ थपथपाने, मंच से तारीफ के दो शब्द कहकर भावनात्मक शोषण करने या फिर कैश डीलिंग के रूप में भी हो सकता है।
ध्यान रहे कि राजनीति में ‘ठगना’ शब्द के अनेकार्थ हैं और वो परिस्थिति तथा पात्र के हिसाब से बदलते रहते हैं। चुनाव के मंगलाचरण में अगर बड़े नेताओं का यह ‘समझाइश कैम्पेन’ खास सफल नहीं रहा और घोषित तौर पर बैठे प्रत्याशी ने अघोषित रूप से अंदर ही अंदर पार्टी प्रत्याशी को पलीता लगा दिया तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।
धूमिल होती राजनीति की बुनियादी नैतिकता
यहां सबसे बड़ा सवाल तो राजनीति में बुनियादी नैतिकता का है? लोकतंत्र में चुनाव टिकट की आकांक्षा रखना स्वाभाविक है, लेकिन उसे जीने-मरने का सवाल बना देना क्या संदेश देता है? क्या चुनाव का टिकट मिलना कोई कुबेर के खजाने की चाभी है या उसका न मिलना घर के कर्ता पुरूष की असामयिक मौत है? टिकट न मिलने पर इतना शोक और रूदन क्यों? और मिल जाने पर आकाश स्पर्श का परमानंद क्यों?
दरअसल राजनीतिक व्यवस्था मूलत: लोकतंत्र को चलाने और इस तंत्र के असल मालिक लोक के जीवन को सुचारू और समृद्ध बनाने के लिए है, लोकतांत्रिक माफिया बनने के लिए तो नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के अमृत काल में यह कड़वा सच है कि राजनीति अब अधिकांश लोगों के लिए शुद्ध रूप से चौतरफा लाभ का धंधा है। इसीलिए वो इसे छोड़ना तो दूर इसे किसी सेठ की गद्दी की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखना चाहते हैं ताकि पावर, पैसा और प्रतिष्ठा की गंगोत्री सूख न सके।
कहीं यह ‘परिवारवाद’ के रूप में है तो कहीं ‘पैतृक सेवावाद’ के रूप में है, जिसे इस कथित जनसेवा का चस्का लगा, वह दूसरों को यह ‘मौका’ भूलकर भी नहीं देना चाहता। और जिसे यह अब तक नहीं मिला, वो इसे पाने के लिए अघोरी साधना करने के लिए भी तैयार है।
अफसोस, कि जिस जन की सेवा के लिए चुनाव टिकट रूपी एंट्री पास तैयार किया गया है, वह ‘जन’ पहले भी हतप्रभ था, आज भी है और शायद आगे भी रहेगा।
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