यह ‘दिवस’ जीवन की भाग-दौड़, जद्दोजहद के बीच अपनों के साथ और जीवन को पुन: जीने की एक कोशिश है
- फोटो : Amar Ujala
हम सभी के जीवन का केंद्र मां रही है। बदलते समय और भाग-दौड़ भरी जिंदगी के बीच हमारे संबंध धीरे-धीरे शिथिल पड़ते जा रहे हैं। मातृत्व की छाया से बाहर हमने अपने लिए नए आशियाने बना लिए है, जिनमें सभी आधुनिक सुख-सुविधाएं तो मौजूद है लेकिन जो नहीं है, वह है अपनों का साथ। हम अपनों से पिछड़ रहे हैं और आधुनिकता से जुड़ रहे है। हम जीवन के श्रेष्ठ अनुपम उपहार मातृत्व के स्नेह की छाया से दूर होकर एकांगी व असहाय के रूप में जीवनयापन करने को मजबूर हो रहे है और जब कभी हम पीछे लौट भी रहे हैं तो केवल स्मृतियां को ही शेष पा रहे हैं।
यह ‘दिवस’ जीवन की भागदौड़, जद्दोजहद के बीच अपनों के साथ और जीवन को पुन: जीने की एक कोशिश है क्योंकि सब कुछ पाने की लालसा में हमारे माता-पिता हमसे छूट रहे हैं। ऐसे में यह ‘दिवस’ उनके स्मृति बनने से पूर्व उनके जीवन में प्रेम भरने व भावी पीढ़ी से उनके जीवनानुभवों को साझा करने का अवसर देता है। यह दिवस मातृत्व के सम्मान एवं उनके अस्तित्व के अहसास का दिवस है, जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था में कभी सम्मान नहीं दिया गया और वह आजीवन परिवार, समाज व युद्ध की भूमि में अपना शारीरिक व भावनात्मक लहू बहाती रही। हम भूल जाते हैं कि माताएं ही भविष्य के विषय में विचार कर सकती हैं, क्योंकि वे अपनी संतानों में भविष्य को जन्म देती है।
हम अक्सर दिवसों को मनाए जाने का विरोध करते हैं क्योंकि अपनों के लिए तो प्रत्येक दिन ही दिवस के समान होता है। मगर वर्तमान समय का यथार्थ है कि हम रोजगार व अन्य कारणों से अकेले रहने पर मजबूर है। ऐसे में यह दिवस थोड़े समय के लिए ही सही हमें उनके होने का अहसास कराता है और संबंधों को नई ऊर्जा देता है। अन्यथा महानगरों में अकेले जीवनयापन करते बुजुर्ग और उनकी दयनीय मृत्यु की अनेक घटनाएं मौजूद है, जिनके अपने ही अंतिम समय में उनके पास नहीं पहुंच पाते हैं और यह घटनाएं उनमें अपराधबोध को जन्म देती है, वह जीवनपर्यंत तक जिसमें घुटते रहते है। “वह जब थी/ उससे इस शहर को और इस घर को नहीं था कोई सरोकार कि अपनी पीड़ाओं और संघर्षों के साथ वह कितनी अकेली थी ...आज जब वह जा रही है तो लगने लगा है सहसा मुझे इस घर को और पूरे शहर को कि वह थी ... वह थी और अब नहीं रही”
अन्ना जार्विस द्वारा मई 1908 में वेस्ट वर्जिनिया के ग्राफ्टन में मेथोडिस्ट चर्च में पहला अधिकारिक मातृ दिवस मनाया था।
- फोटो : Amar Ujala
पूरी दुनिया में आज मातृत्व दिवस
आज मई का दूसरा रविवार है। इस कारण से 12 मई 2024 को ‘मातृ दिवस’ के रूप में विश्व (यूनाइटेड किगडम, इथोपिया, जर्मनी, जापान, सर्बिया, पैरु, फ़्रांस आदि में मनाया जा रहा है। ‘मातृ दिवस’ को मनाने का श्रेय कुछ लोग जूलिया वार्ड होवे को देते हैं तो कुछ ऐन रीव्स जार्विस की बेटी अन्ना जार्विस को। यह समय युद्धों का था। इस दिवस की परिकल्पना भी युद्ध के उपरांत किसी एक दिन को माताओं के त्याग का सम्मान करने के प्रति समर्पित ‘मदर्स पीस डे’ के रूप में की गई थी।
अन्ना जार्विस द्वारा मई 1908 में वेस्ट वर्जिनिया के ग्राफ्टन में मेथोडिस्ट चर्च में पहला अधिकारिक मातृ दिवस मनाया था। उन्होंने ‘मातृ दिवस’ को राष्ट्रीय अवकाश बनाने का अभियान चलाया था जिसके लिए उन्होंने ‘मदर्स दे इंटरनेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की थी। अधिकारिक रूप से मई 1914 में राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस के रूप में मनाए जाने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और इस दिवस को बच्चों के लिए किए गए माओं के त्याग का सम्मान करने के एक तरीके के रूप में मनाया जाने लगा।
भारत में भी आधुनिक जीवन शैली, बदलते भाव बोध के कारण रिश्तों में उत्पन्न दूरी को यह दिवस कम करने का प्रयास करता है। यह मां के त्याग, स्नेह और उसके भीतर के द्वंद्व को पुन: स्मृति का केंद्र बनाता है। ‘मातृत्व’ के पीछे स्त्री जीवन के संपूर्ण बलिदान को पुन: याद करने और अपनी माँ के विशेष होने का भाव जगाता है। अक्सर संबंधों में उदासीनता व समयाभाव के कारण हमारे लिए माएं पहले स्मृति और फिर कविता का केंद्र बन जाती है।
“मैं नहीं जानता पर क्योंकि नहीं देखा है कभी पर जो भी जहां भी लीपता होता है गोबर के घर आंगन, जो भी जहां भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुमकुम से अल्पना, जो भी जहां भी लोहे चिंता भरी आंखें लिए निहारता होता है दूर तक का पथ, वही हैं वहीं है मां।
भारतीय परिवारों में मां जीवन की लय होती है। यदि यह टूटती व छूटती है तो मनुष्य का संपूर्ण जीवन बिखर जाता है। आज के समय में मातृ दिवस हमें अपने जीवन की लय मां के स्नेह, निस्वार्थ प्रेम, त्याग को याद कराता है। ताकि हम समय रहते अपनों के प्रति कृतज्ञ हो सकें। अन्यथा समय की इस तेज़ धारा में सभी संबंध पीछे छूटते जा रहे हैं और अपनों में अकेलापन और अवसाद गहराता जा रहा है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।