मां संपूर्ण भावों की जननी है। प्रकृति में जीव-जंतुओं से लेकर मनुष्य तक हर किसी में भावों का बीजारोपण मां से होता है। जिसे हर बच्चा अपने जन्म से पूर्व मां के गर्भ में महसूस करना आरंभ कर देता है और जन्म के उपरांत जीवन के हर पड़ाव में महसूस करता है। वह शैशवावस्था का उसका पहला कदम हो या वृद्धावस्था की स्थितियां।
मां की कोमल भावनाएं हर स्थिति में उसके साथ और पास होती है। किंतु यह विडंबना ही है कि हमारे भीतर भावों का बीजारोपण करने वाली मां की भावनाओं को हम आज तक जान और समझ नहीं सके हैं। मां, जिसने अपना सर्वस्व अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया जिसके संदर्भ में कहा जाता है ‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती’।
ऐसा कहकर मां की दुनिया को बच्चों की दुनिया तक सीमित कर दिया गया। जिसमें मां के अपने भाव और विचार इस बेतरतीब दुनिया में कहीं खो गए। आज कई अर्थों में मां के प्रति प्रेम और सम्मान तो दिखता है किंतु समर्पण के भाव को ‘मदर्स डे’ की औपचारिकताओं, जनमानस के द्वारा मां-बहन के संबंधों को तार-तार कर अपशब्दों, वृद्धाश्रम में जीवन का अंतिम समय काटती माओं की सजल आंखों में देखा जा सकता है।
आधुनिक समय में मनुष्य के भीतर उपयोगितावादी प्रवृति इतनी अधिक हावी हो गई है कि उसके समक्ष सभी संबंध धराशायी हो गए हैं फिर चाहे वह नौ महीने गर्भ में रखने वाली मां ही क्यों न हो?
मां विस्तृत फलक पर विचार भी है। हमारी संस्कृति में मां को सृजन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। वह सृष्टि की जननी और उसका आरंभ हैं। इसीलिए वह पूजनीय है और पिता से पूर्व स्मरणीय व वंदनीय है। मां सिर्फ भाव नहीं एक विचार भी है। जिसमें जन्म देनी वाली मां से लेकर पालन पोषण करने वाली मातृभूमि की आस्था, विश्वास की श्रद्धापूर्ण अभिव्यक्ति होती है।
तभी तो राष्ट्रीय आंदोलन में मां के इसी मातृत्व भाव को राष्ट्र के विचार के साथ जोड़ा गया था और मातृभूमि के लिए मातृत्व भाव के उद्धारक गुणों का उल्लेख किया गया। इसी मातृत्व भाव ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भारत माता की छवि को निर्मित किया।