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Mother's Day 2020: लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो हमसे खफा नहीं होती

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मां की कोमल भावनाएं हर स्थिति में बच्चों के साथ और पास होती है
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मां संपूर्ण भावों की जननी है। प्रकृति में जीव-जंतुओं से लेकर मनुष्य तक हर किसी में भावों का बीजारोपण मां से होता है। जिसे हर बच्चा अपने जन्म से पूर्व मां के गर्भ में महसूस करना आरंभ कर देता है और जन्म के उपरांत जीवन के हर पड़ाव में महसूस करता है। वह शैशवावस्था का उसका पहला कदम हो या वृद्धावस्था की स्थितियां।

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मां की कोमल भावनाएं हर स्थिति में उसके साथ और पास होती है। किंतु यह विडंबना ही है कि हमारे भीतर भावों का बीजारोपण करने वाली मां की भावनाओं को हम आज तक जान और समझ नहीं सके हैं। मां, जिसने अपना सर्वस्व अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया  जिसके संदर्भ में कहा जाता है ‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती’। 

ऐसा कहकर मां की दुनिया को बच्चों की दुनिया तक सीमित कर दिया गया। जिसमें मां के अपने भाव और विचार इस बेतरतीब दुनिया में कहीं खो गए। आज कई अर्थों में मां के प्रति प्रेम और सम्मान तो दिखता है किंतु समर्पण के भाव को ‘मदर्स डे’ की औपचारिकताओं, जनमानस के द्वारा मां-बहन के संबंधों को तार-तार कर अपशब्दों, वृद्धाश्रम में जीवन का अंतिम समय काटती माओं की सजल आंखों में देखा जा सकता है। 
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आधुनिक समय में मनुष्य के भीतर उपयोगितावादी प्रवृति इतनी अधिक हावी हो गई है कि उसके समक्ष सभी संबंध धराशायी हो गए हैं फिर चाहे वह नौ महीने गर्भ में रखने वाली मां ही क्यों न हो?

मां विस्तृत फलक पर विचार भी है। हमारी संस्कृति में मां को सृजन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। वह सृष्टि की जननी और उसका आरंभ हैं। इसीलिए वह पूजनीय है और पिता से पूर्व स्मरणीय व वंदनीय है। मां सिर्फ भाव नहीं एक विचार भी है। जिसमें जन्म देनी वाली मां से लेकर पालन पोषण करने वाली मातृभूमि की आस्था, विश्वास की श्रद्धापूर्ण अभिव्यक्ति होती है। 

तभी तो राष्ट्रीय आंदोलन में मां के इसी मातृत्व भाव को राष्ट्र के विचार के साथ जोड़ा गया था और मातृभूमि के लिए मातृत्व भाव के उद्धारक गुणों का उल्लेख किया गया। इसी मातृत्व भाव ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भारत माता की छवि को निर्मित किया। 

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क्या कोई जानता है एक मां, मां के अतिरिक्त भी कोई पहचान रखती है?
'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ की संकल्पना ने राष्ट्रीय आंदोलन में मातृशक्ति को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिसके संदर्भ में सरोजनी नायडू कहती हैं कि ‘पालना झुलाने वाले हाथ ही विश्व पर शासन करते हैं...चूंकि सारी दुनिया की नारियों में मातृत्व का नैसर्गिक गुण समान है इसलिए वे बड़ी आसानी से प्रत्येक स्त्री से सखी भाव पैदा कर सकती हैं’। 

हमारे देश में जननी और जन्मभूमि एक दूसरे के पूरक और पूजनीय हैं। मां के स्वरूप का यह विस्तार वैदिक साहित्य से लेकर आज के समय के उपलब्ध साहित्य में देखा जा सकता है। तभी तो मातृदिवस, मातृभाषा दिवस आदि को ‘मां’ के भाव के साथ मनाया जाता है।

मगर आज मां के प्रति यह भाव बोध व्यवहार में देखने को नहीं मिलता है। मां के इन भावबोधों की अनदेखी ही उसके संपूर्ण जीवन को परिवार और बच्चों की धुरी में बांधकर रख देती है। उसका अपना व्यक्तित्व उसका न होकर पति और बच्चों के साथ एकात्म हो जाता है, जिसमें मां की पहचान खो जाती है। उसके सपने, उसकी ख्वाहिशें सब उसका परिवार हो जाता है। वह खुद भी तो खुद को खो देती है। 

क्या कोई जानता है एक मां, मां के अतिरिक्त भी कोई पहचान रखती है? माओं की पहचान उनके परिवार और बच्चों से होती है। उनका अपना व्यक्तित्व तो उनके पत्नी से मां बनने के साथ ही पूरी तरह से गुम हो जाता है। मां, घर की वो मजबूत दीवार बना दी जाती है जो हमेशा पूरी तत्परता के साथ दिन-रात खड़ी रहती है ताकि उसके बच्चे व परिवार सुरक्षित रह सके। 

मगर क्या कभी बच्चों ने उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा? यह प्रश्न आज के समय का महत्वपूर्ण प्रश्न है। माएं जो अपना पूरा जीवन घर और परिवार के लिए होम कर देती हैं पर क्या उन्हें उनके उसी भावबोध के साथ समझा गया? कदाचित उत्तर मिलेगा-नहीं। हमारी संस्कृति में जहां मां को पूजनीय माना उसे जननी, जन्मभूमि माना, पिता व गुरु से अधिक माता को श्रेष्ठ तो माना ही किंतु सामाजिक व्यवहार की भाव भूमि पर उसकी स्थिति क्या है उसे हम सभी भलीभांति परिचित है!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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