रेल की पटरियों से भूख नहीं कटती, देह कटती है।
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वे मर गए और तुम उन्हें कानून बता रहे हो। उन्होंने जलते पेट की खातिर जान दी है और तुम उनका माखौल उड़ा रहे हो। बुद्धिजीवियों! उन्हें तुम्हारे आंसू नहीं चाहिए। उन्हें तुम्हारी संवेदनाएं भी नहीं चाहिए। लेकिन उन्हें तुम्हारा उपहास भी नहीं चाहिए। उनकी खिल्ली उड़ाने का उनका अपमान करने का, उनको लांछित करने का तुम्हें हक नहीं है।
छद्म अक्लमंदो! अपने अहसास को मारकर जी रहे हो। कुदरत ने इसलिए तो जिंदगी की नेमत नहीं बख्शी। उन्हें तो हमारे लिए बनाए गए संविधान के तहत मिला जीने का अधिकार चाहिए। करोड़ों लोग अपनी रोजी रोटी खो बैठे हैं और आप कायदे कानून बघार रहे हो। आपके बंजर होते अहसास को चेतावनी अब रेल की पटरियों से कटे शरीर दे रहे है। अदम ने तो पैंतालीस साल पहले इस संकट को सूंघ लिया था, जब इंसानियत हिन्दुस्तान और इंडिया में बंटने लगी थी-
रंग रोगन से पुता, पहलू में लेकिन दिल नहीं, आज का इंसान भी कागज का पैकर हो गया/ माफ करिए, सच कहूं तो आज हिन्दुस्तान में, कोख ही जरखेज है, अहसास बंजर हो गया
सब्र की सीमा होती है। व्यवस्था के संचालकों के लिए छिपा हुआ संकेत है। रेल की पटरियों से भूख नहीं कटती। देह कटती है। हर भूखा पटरी पर देह छोड़ने के लिए नहीं आता। कटी देह से निकले रक्त की एक-एक बूंद से एक भूखी देह पैदा होती है। करोड़ों लोगों की बेरोजगारी और भुखमरी से पीड़ित मानवता का शाप मत लीजिए।
हाय री किस्मत कि खाली पेट बच्चा सो गया/ मां के कदमों से लिपट के बारहा मनुहार पे/ क्या गलत है कल को उसकी चेतना बागी बने/ पल रहा है बचपना जो भूख के अंगार पे।
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