मंत्रिमंडल के साथियों और विधायकों के असंतोष पड़ा भारी
- फोटो : Shivsena
नारायण राणे की बगावत
2005 में जब सोनिया गांधी के प्रश्रय से नारायण राणे ने शिवसेना से बगावत की तब विधायक दल का नेता होने के बावजूद नारायण राणे अपने साथ बमुश्किल 10 विधायक ही ले जा सके । उन्हें अलग गुट के रूप में मान्यता भी नहीं मिली बल्कि नारायण राणे को अपने विधायकों से त्यागपत्र दिलाकर उपचुनाव का सामना करना पड़ा।
छगन भुजबल और नारायण राणे की बगावत में सिर्फ इतना अंतर था की छगन भुजबल को बगावत के बाद शिवसैनिकों के रोष से बचने के लिए छिपना छुपाना पड़ा था। जबकि नारायण राणे ने सड़क पर उतर कर शिव सैनिकों के साथ मुकाबला भी किया था।
जब नारायण राणे उप चुनाव लड़ने के लिए कणकवली गए तब वहां गए कई शिव सैनिकों को राणे समर्थकों ने जमकर धुनाई भी की थी। नारायण राणे के भय से उद्धव ठाकरे के निजी सचिव मिलिंद नार्वेकर और शिवसेना नेता सुभाष देसाई को सुरक्षा व्यवस्था भी प्रदान करनी पड़ी थी । फिर भी उस बगावत में नारायण राणे पर उद्धव ठाकरे भारी पड़े थे। यही हाल राज ठाकरे का भी रहा।
शिवसेना को जानने वाले अधिकांश विशेषज्ञों का मानना था कि राज ठाकरे शिवसेना को नियंत्रित करने में उद्धव ठाकरे पर 20 पड़ेंगे। किंतु स्वयं बालासाहेब ठाकरे की मौजूदगी और उद्धव ठाकरे के परिश्रम के कारण राज ठाकरे विशेषज्ञों की आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाए।
2007 के मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में वे विफल रहे। 2008 में जब राज ठाकरे ने मराठी मानुष का मुद्दा जमकर उछाला और शिवसेना को मराठी मुद्दे से हटकर हिंदुत्व के कारण गैर मराठियों की पार्टी बताना प्रारंभ किया। तब मुंबई ,पुणे और नासिक में राज ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को कुछ हद तक स्थापित करने में कामयाब हुए थे।
तब भी शिवसेना के पास राज ठाकरे की तुलना में 3 गुना से कहीं अधिक विधायक संख्या थी । राज ठाकरे के 13 विधायकों की तुलना में शिवसेना के 45 विधायक निर्वाचित हुए थे । कालांतर में राज ठाकरे हाशिए पर चले गए।
मौजूदा परिस्थितियां अलग
इस बार परिस्थितियां बिल्कुल बदली हुई हैं। शिवसेना के कुल 55 विधायकों में से 39 एकनाथ शिंदे के साथ हैं। संभवत: विश्वास मत हासिल करने तक यह आंकड़ा और बढ़ जाए । शिंदे की बगावत के बाद जब उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी आहूत की तब मुंबई के परिसर के सात जिला प्रमुखों में से 5 जिस तरह से एकनाथ शिंदे के पक्ष में दिखाई दिए ,उससे साफ संकेत गया है कि उद्धव ठाकरे शिवसेना पर अपना नियंत्रण हो चुके हैं।
सांसदों में भी उद्धव ठाकरे की तुलना में एकनाथ शिंदे के समर्थकों का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। चूंकि महाराष्ट्र की अधिकांश महानगर पालिकाओं में समय अवधि पूर्ण होने के कारण वहां प्रशासक नियुक्त किए जा चुके हैं, इसलिए पार्षदों में किसको बढ़त हासिल है यह अभी सटीक संख्या नहीं बताई जा सकती।
किंतु इतना तय है की ठाणे, कल्याण - डोंबिवली ,उल्हासनगर और भिवंडी -निजामपुर जैसी शिवसेना के नियंत्रण वाली महानगरपालिका अब शिंदे गुट के नियंत्रण में है । मुंबई में भी यदि शिंदे गुट उद्धव ठाकरे गुट पर भारी पड़ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मुंबई में प्रकाश सुर्वे, यामिनी जाधव ,दिलीप लांडे, मंगेश कुडालकर जैसे विधायक एकनाथ शिंदे के साथ जा चुके हैं। जिन नगर सेवकों को अब कांग्रेस और राकांपा के साथ मिलकर जीत की संभावना नजर नहीं आएगी वह शिंदे का सहारा लेने में संकोच नहीं करेंगे। विधायक दल जिस तरह से एकनाथ शिंदे के प्रभुत्व में है उसके कारण मुंबई के उद्धव ठाकरे गुट के विधायक चाहे आदित्य ठाकरे हों ,सुनील राऊत, सुनील प्रभु या रविंद्र वायकर इनकी भी सदस्यता पर संवैधानिक संकट आसन्न है।
आने वाले दिनों में यदि निर्वाचन आयोग के समक्ष भी एकनाथ शिंदे गुट दावा पेश करता है तो उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह और संगठन अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
जब हेमचंद्र गुप्ते ने शिवसेना से विद्रोह किया था तब राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने इस विद्रोह को महत्त्व भी नहीं दिया था । जब छगन भुजबल शिवसेना से बागी हुए थे तब वे शिवसेना का कैडर हिला पाने में कामयाब नहीं हुए थे। जब नारायण राणे उद्धव ठाकरे को चुनौती देते हुए शिवसेना से बाहर गए थे तब भी शिवसेना का कैडर टस से मस नहीं हुआ था, लेकिन इस बार जहां भी शिव सैनिकों ने प्रदर्शन करने का उत्साह दिखाया वहां उनसे कई गुना ज्यादा शिवसेना के बागी सशक्त नजर आए।
चाहे जलगांव में गुलाबराव पाटिल हो कोकण में भरत गोगावले हों, मराठवाड़ा में तानाजी सावंत या फिर कल्याण में श्रीकांत शिंदे इनके समर्थक शिव सैनिकों पर भारी पड़ रहे हैं । शिवसेना का न तो विधायक दल प्रबल है और ना ही सड़क पर उतरने वाली उनकी मारधाड़ करने वाली सेना। ऐसे में संभव है एकनाथ शिंदे शिवसेना के विधायक दल के साथ साथ पूरी शिवसेना को ही अपने नियंत्रण में करने में कामयाब हो जाएं । यदि यह संभव हुआ तो शिवसेना बालासाहेब ठाकरे के विचारों वाली तो होगी पर ठाकरे वंश से मुक्त हो जाएगी ।
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