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मुरैना बियॉन्ड द बीहड़: एक यात्रा मुरैना की, जहां मौजूद हैं 27 दार्शनिक स्थल

सार

कोई कहता है कि भगवान कृष्ण अपनी गय्या चराते हुए इस ओर दूर निकल आते थे और यहां से मुड़ कर गोकुल जाते थे। जिस स्थान से वह मुड़ते थे कालांतर में उस स्थान का नाम मुरैना पड़ा।
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मुरैना शहर में जैन मंदिरों से लेकर शिव, माता और शनि मंदिर मौजूद हैं जिनकी बड़ी मान्यता है। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार
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मध्य प्रदेश का एक ऐसा स्थान जो ज्यादातर जाना जाता रहा है चम्बल के बीहड़ों के लिए। इन बीहड़ों में कभी बागी हुआ करते थे। अगर मैं आपसे कहूं कि इस बार मैं आपको लेकर जाना चाहती हूं मुरैना, तो हैरान न होइएगा। डरने की जरूरत नहीं है। विश्वास कीजिए आपको कुछ नया और अनोखा दिखाउंगी। चम्बल के बीहड़ों की कहानी मात्र 3 से चार दशक पुरानी है, लेकिन इस स्थान का इतिहास सदियों पुराना है। क्या आप विश्वास करेंगे कि मुरैना में एक नहीं दो नहीं बल्कि पूरे के पूरे 27 दार्शनिक स्थल मौजूद हैं। इस स्थान का इतिहास सतयुग, द्वापर से लेकर प्रागैतिहासिक काल तक जाता है। 

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इन स्थलों के बारे में कम ही लोग जानते हैं। मैंने भी जब तक मुरैना को एक्सप्लोर नहीं किया था तब तक मुझे भी पता कहां था। मेरे लिए भी मुरैना दस्युओं का क्षेत्र मात्र था। तो चलिए रोमांच से भरे इस सफर पर मेरे साथ। मुरैना मध्य प्रदेश के शीर्ष के जैसा है, जिसकी सरहदें राजस्थान और उत्तर प्रदेश से मिलती हैं। इसका नाम भी कई कारणों से पड़ा। 

मुरैना नाम पड़ने के पीछे ये हैं कारण 

कोई कहता है कि भगवान कृष्ण अपनी गय्या चराते हुए इस ओर दूर निकल आते थे और यहां से मुड़ कर गोकुल जाते थे। जिस स्थान से वह मुड़ते थे कालांतर में उस स्थान का नाम मुरैना पड़ा। कोई कहता है कि यहां बहुत घना वन हुआ करता था।  उस वन में बड़ी संख्या में मोर हुआ करते थे। इस वन को मयूरवन कहा जाता था। मयूरवन का अपभ्रंश रूप ही मुरैना है।  

मुरैना शहर में जैन मंदिरों से लेकर शिव, माता और शनि मंदिर मौजूद हैं जिनकी बड़ी मान्यता है। यहां एक अनोखा शिव मंदिर है जिसे आलोपी शंकर मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर में एक जलरी में दो शिवलिंग मौजूद हैं। ऐसा मंदिर आपने भारत में कहीं और नहीं देखा होगा। शिवरात्रि में पहाड़ी पर बने इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां ईश्वरा महादेव का रहस्मयी मंदिर पहाड़गढ़ के जंगलों में मोजूद है। इस मंदिर पर सुबह ब्रम्ह महूरत में कोई अद्रश्य शक्ति बेलपत्र, हल्दी ,चावल चढ़ा पूजा कर जाती है। सदियां बीत गई लेकिन आज तक कोई इस रहस्य का पता नहीं लगा पाया है। 

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यहां एक शनि मंदिर है। इस मंदिर की कहानी बड़ी दिलचस्प है। कहते हैं इस मंदिर में शनि भगवान की जो मूर्ति है वह भगवान राम के समय की है। लंका दहन के समय हनुमान जी ने ही शनि भगवान को लंका से यहां फेंका था।  

चम्बल के जंगल अपने भीतर छुपाए हैं अनेक अद्भुत नगीने। यहां पहाड़गढ़ क्षेत्र में लिखी छाज नमक स्थान पर पहाड़ की घाटी में प्रागैतिहासिक काल के भित्तीय चित्र मिलते हैं। इन चित्रों का समय भीमबेटका का समकालीन माना जाता है। 

ये दो किले हैं प्रसिद्ध

मुरैना जिले में दो किले भी देखने लायक हैं। एक पहाड़गढ़ दूसरा सबलगढ़। पहाड़गढ़ का किला राव दलकूदेवजी के पौत्र राव दानसिंह जी ने सन 1446 ईस्वीं में बनवाया था। सबलगढ़ का किला 18वीं शताब्दी में सबला गुर्जर ने बनवाना शुरू किया था। इसे पूरा राजा गोपाल सिंह ने कराया था।

इस सब के अलावा मुरैना में 8वीं शताब्दी का ककनमठ मौजूद है। इस अद्भुत संरचना को देख कोई भी दांतों तले ऊंगली दबा ले। इस मठ की ऊंचाई लगभग 100 फीट है। यहां के लोगों के अनुसार आकाशीय बिजली गिरने से मठ के शिखर के बाहरी हिस्से छतिग्रस्त हो गए थे। आज मठ का शिखर बिना किसी सीमेंट के खड़ा है। इसके पत्थर एक के ऊपर एक बस रखे भर जान पड़ते हैं। इस मठ के भीतर शिवलिंग है, जिसके दर्शन करने लोग आते हैं। यह एक संरक्षित इमारत है। मठ के प्रांगण में मठ के टूटे हुए हिस्से रखे हुए हैं।

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इन मंदिरों को फिर से स्थापित करने का श्रेय जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
मुरैना शहर से 28 किमी दूर स्थित है बटेश्वर के शिव मंदिर। ये अद्भुत संरचनाएं 14वीं शताब्दी में आए भूकंप से जमीदोज हो गईं थीं। इन मंदिरों को फिर से स्थापित करने का श्रेय जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को। जिन्होंने बड़ी मशक्कत कर पत्थरों के टुकड़ों को जोड़ कर इन शिवालयों को पुनः खड़ा किया है। 

सबसे बारीक मूर्तिकला

यहीं मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पडावली गांव। इस ग्राम में मौजूद है गढ़ी पडावली। दसवीं शताब्दी में इस मंदिर को कच्छपघाट राजाओं ने बनवाया था। इस मंदिर की स्थापत्यकला अनोखी है। भारत में जितने भी ऐसे मंदिर हैं जैसे, जोधपुर के पास ओसिया का मंदिर, खजुराहो के मंदिर, ओडिशा में कोणार्क का सूर्य मंदिर। इन सब में अगर सबसे बारीक मूर्तिकला कहीं देखने को मिलती है तो वह पड़ावली के इस छोटे से शिव मंदिर में।  

पड़ावली से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मितावली। इस छोटे से ग्राम में पहाड़ की चोटी पर स्थित है चौंसठ योगिनी मंदिर। ये अद्भुत संरचना प्रेरक है उस आर्किटेक्ट के लिए जिसने हमारे संसद भवन का निर्माण किया। इस गोल संरचना के भीतर 64 मंदिर हैं जिनमें कभी चौंसठ योगनियां पूजा किया करती थीं। 

मुरैना में वाइल्ड लाइफ

मुरैना जिले में वाइल्ड लाइफ भी मौजूद है। यहां देश का सबसे अनोखा अभयारण्य पड़ता है। यह अभयारण्य 5,400 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। मुरैना जिले में राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है। इस अनोखे अभयारण्य की सीमा तीन राज्यों को छूती है। यह देश का एक संरक्षित क्षेत्र है, जो गंभीर रूप से विलुप्तप्राय घड़ियाल, लालमुकुट कछुआ और विलुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन की रक्षा के लिए बनाया गया है।

इस अभयारण्य को जीव जंतुओं के लिए अनुकूल बनाती है मध्य प्रदेश की सदानिरी नदी चम्बल। चम्बल देश की एक मात्र नदी है जिसमें मृदा का अपरदन होता है और हर साल मानसून में नदी अपने औसत बहाव से कई गुना ऊंचे स्तर तक बहती है। जिसके परिणाम स्वरुप बाढ़ के हालात बनते हैं। जब पानी उतरता है तो अपने साथ मिटटी भी बहा ले जाता है जिसके चलते भूमि में बड़े गड्ढे और नालियां बन जाती हैं। नदी के नजदीक बने इस क्षेत्र में जलीय जीव जंतु, और पक्षी अपना घर बनाते हैं।

चम्बल नदी ही एक ऐसी नदी है जहां घड़ियाल पाए जाते हैं। इसीलिए इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया है। यहां अप्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में आते हैं। घड़ियालों को संरक्षित करने के लिए एक इको सेंटर भी बनाया गया है। इस सेंटर में घड़ियालों की ब्रीडिंग और बच्चों का रखरखाव पुनर्वास तक किया जाता है। सर्दियों में यहां बर्ड वाचिंग के लिए सैलानी दूर-दूर से आते हैं। 

आप जब मुरैना जाएं तो यहां की प्रसिद्ध गजक चखना न भूलें हाल ही में मुरैना की गजक को जी आई टैग मिला है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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