इन मंदिरों को फिर से स्थापित करने का श्रेय जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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मुरैना शहर से 28 किमी दूर स्थित है बटेश्वर के शिव मंदिर। ये अद्भुत संरचनाएं 14वीं शताब्दी में आए भूकंप से जमीदोज हो गईं थीं। इन मंदिरों को फिर से स्थापित करने का श्रेय जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को। जिन्होंने बड़ी मशक्कत कर पत्थरों के टुकड़ों को जोड़ कर इन शिवालयों को पुनः खड़ा किया है।
सबसे बारीक मूर्तिकला
यहीं मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पडावली गांव। इस ग्राम में मौजूद है गढ़ी पडावली। दसवीं शताब्दी में इस मंदिर को कच्छपघाट राजाओं ने बनवाया था। इस मंदिर की स्थापत्यकला अनोखी है। भारत में जितने भी ऐसे मंदिर हैं जैसे, जोधपुर के पास ओसिया का मंदिर, खजुराहो के मंदिर, ओडिशा में कोणार्क का सूर्य मंदिर। इन सब में अगर सबसे बारीक मूर्तिकला कहीं देखने को मिलती है तो वह पड़ावली के इस छोटे से शिव मंदिर में।
पड़ावली से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मितावली। इस छोटे से ग्राम में पहाड़ की चोटी पर स्थित है चौंसठ योगिनी मंदिर। ये अद्भुत संरचना प्रेरक है उस आर्किटेक्ट के लिए जिसने हमारे संसद भवन का निर्माण किया। इस गोल संरचना के भीतर 64 मंदिर हैं जिनमें कभी चौंसठ योगनियां पूजा किया करती थीं।
मुरैना में वाइल्ड लाइफ
मुरैना जिले में वाइल्ड लाइफ भी मौजूद है। यहां देश का सबसे अनोखा अभयारण्य पड़ता है। यह अभयारण्य 5,400 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। मुरैना जिले में राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है। इस अनोखे अभयारण्य की सीमा तीन राज्यों को छूती है। यह देश का एक संरक्षित क्षेत्र है, जो गंभीर रूप से विलुप्तप्राय घड़ियाल, लालमुकुट कछुआ और विलुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन की रक्षा के लिए बनाया गया है।
इस अभयारण्य को जीव जंतुओं के लिए अनुकूल बनाती है मध्य प्रदेश की सदानिरी नदी चम्बल। चम्बल देश की एक मात्र नदी है जिसमें मृदा का अपरदन होता है और हर साल मानसून में नदी अपने औसत बहाव से कई गुना ऊंचे स्तर तक बहती है। जिसके परिणाम स्वरुप बाढ़ के हालात बनते हैं। जब पानी उतरता है तो अपने साथ मिटटी भी बहा ले जाता है जिसके चलते भूमि में बड़े गड्ढे और नालियां बन जाती हैं। नदी के नजदीक बने इस क्षेत्र में जलीय जीव जंतु, और पक्षी अपना घर बनाते हैं।
चम्बल नदी ही एक ऐसी नदी है जहां घड़ियाल पाए जाते हैं। इसीलिए इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया है। यहां अप्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में आते हैं। घड़ियालों को संरक्षित करने के लिए एक इको सेंटर भी बनाया गया है। इस सेंटर में घड़ियालों की ब्रीडिंग और बच्चों का रखरखाव पुनर्वास तक किया जाता है। सर्दियों में यहां बर्ड वाचिंग के लिए सैलानी दूर-दूर से आते हैं।
आप जब मुरैना जाएं तो यहां की प्रसिद्ध गजक चखना न भूलें हाल ही में मुरैना की गजक को जी आई टैग मिला है।
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