लेकिन जो हुआ, वह गुजरात के भुज में आए भयावह भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा नहीं थी। यह मानवीय लापरवाही के कारण हुआ हादसा है, जो पुल के मेंटेनेंस के नाम पर की गई खानापूर्ति और इस ठेके के जरिए भारी मुनाफा कमाने की नीयत से की गई थी। इसके पहले दुनिया में तोड़फोड़, युद्ध, प्राकृतिक आपदा, घटिया निर्माण अथवा आतंकवादी घटनाओं के कारण पुलों को भारी नुकसान पहुंचा है और इस कारण लोगों को भी अपनी जानें गंवानी पड़ी है।
ऐसा ही एक भयानक हादसा पुर्तगाल में 1809 में हुआ था, जब वहां दूरा नदी पर बना एक पोंटून पुल टूट गया था और इसमें 4 हजार से अधिक लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं।
मोरबी पुल भी संभवत: सही मरम्मत न करने के कारण टूटा है। शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उसमें पुल की लोहे की रस्सियां बुरी तरह जंग खा गई थीं, जिन्हें नहीं बदला गया। मोरबी में झूलते पुल के तार जंग लगे हुए थे। इन्हें मरम्मत के दौरान बदला नहीं गया। इनकी मरम्मत की जाती तो यह हादसा नहीं होता। यह बात मोरबी पुल हादसा मामले के जांच अधिकारी और मोरबी के पुलिस उपाधीक्षक पीए झाला ने स्थानीय अदालत में पेश फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी रिपोर्ट में कही। पैसे बचाने के चक्कर में सैकड़ों लोगों की जान को दांव पर लगा दिया गया।
सरकार का रवैया पर प्रश्नचिन्ह
इस मामले में गुजरात सरकार का रवैया भी हैरान करने वाला है। सरकार दोषियों को सजा देने के बजाय, उन्हें बचाने में लगी ज्यादा लगती है। ओरेवा कंपनी के छोटे कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया है, लेकिन कंपनी के मालिक जयसुख पटेल के खिलाफ कार्रवाई तो दूर, एफआईआर में उनका नाम तक नहीं है। जयसुख पटेल के भाजपा नेताओं से अच्छे रिश्ते बताए जाते हैं। तानाशाह हिटलर को अपना आदर्श मानने वाले जयसुख भाई ने इस हादसे पर अफसोस तक नहीं जताया।
उधर निचली अदालत में अतिरिक्त सरकारी अभियोजक एचएस पांचाल ने बताया कि ओरेवा कंपनी के मैनेजर दीपक पारेख ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एमजे खान को बताया है कि कंपनी के प्रबंध निदेशक से लेकर निचले स्तर के कर्मचारियों तक, सभी ने खूब काम किया, लेकिन भगवान की इच्छा से ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई। इस बीच राज्य में इस भयंकर हादसे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं और आक्रोश सामने आ रहा है।
मोरबी व राजकोट बार एसोसिएशन ने कहा कि एसोसिएशन का कोई भी सदस्य घटना से जुड़े किसी भी आरोपी का मामला नहीं लड़ेगा। साथ ही वकीलों ने विरोध मार्च भी निकाला। हालांकि सरकार इस मामले में दुख जताने की पूरी कोशिश कर रही है।
मोरबी हादसे के मृतकों की याद में अहमदाबाद, सूरत में प्रार्थना सभाएं हुई। 2 नवंबर को राज्य में राजकीय शोक रखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मोरबी पहुंचे और घायलों से मिले। एक कार्यक्रम में मोरबी हादसे में मृत व्यक्तियों की याद में उनकी आंखों से आंसू भी आ गए।
मोरबी पहुंचे पीएम मोदी
- फोटो : ANI
सरकार-विपक्ष आमने सामने
मोरबी हादसे को लेकर गुजरात सरकार और भाजपा विपक्ष के निशाने पर है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पूछा कि मोरबी के पुल की दुर्घटना 'एक्ट ऑफ गॉड' है या 'एक्ट ऑफ फ्रॉड' है? साथ ही उन्होंने कहा कि 6 महीने से पुल की मरम्मत की जा रही थी, इसमें कितना खर्च आया? 5 दिनों में पुल गिर गया। 27 साल से बीजेपी की सरकार है, क्या यही है आपका विकास मॉडल?
कांग्रेस ने इस घटना की न्यायिक जांच की मांग की है। राज्य में इस बार पूरी ताकत से विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही आम आदमी पार्टी ने भी इस हादसे के लिए भाजपा को जमकर घेरा है।
भाजपा की परेशानी यह है कि यह हादसा राज्य में ऐन विधानसभा के मुहाने पर हुआ है। इस हादसे के बचाव में उसके पास कोई ठोस तर्क नहीं है। वह हादसे के लिए दोषी लोगों पर कार्रवाई करती दिखना भी चाहती है और इसके लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार कंपनी मालिक जयसुख भाई पटेल को कार्रवाई की आंच से बचाना भी चाहती है, क्योंकि इससे राज्य में पटेलों के नाराज होने का खतरा है। चुनाव की पूर्व बेला में वो कोई ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहती।
आश्चर्य की बात तो यह इस चुनावी मजबूरी को राजकोट के भाजपा सांसद मोहन भाई कुंडारिया के दुख और घोषणा की भी फिकर नहीं है, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी दोषी को नहीं बख्शा जाएगा। सांसद कुंडारिया ने इस हादसे में अपने परिवार के 12 सदस्यों को खोया है। यही नहीं मोरबी नगर पालिका के उपाध्यक्ष जयराज सिंह जडेजा ने भी इस घटना के लिए ओरेवा कंपनी के मालिक को जिम्मेदार ठहराया था।
जडेजा ने कहा था कि जयसुख भाई ने नगर पालिका से एनओसी लिए बिना ही 24 अक्टूबर को फीता काटकर पुल को आम लोगों के लिए खोल दिया था। उसने यह भी डीएम को लिखकर दिया था कि यदि कोई अनहोनी हुई तो जिम्मेदारी हमारी होगी।
प्रधानमंत्री ने भी मोरबी दौरे के दौरान कहा था कि इस मामले में किसी को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन हकीकत में वैसा कुछ होता दिख नहीं रहा। छोटे कर्मचारी मालिकों के निर्देश पर काम करते हैं, लेकिन अगर यह पूरा मामला ‘भगवान की इच्छा’ ही है तो इसका संदेश यह है कि चुनावी मजबूरियों के आगे सब कुछ बेमानी है।
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