एनडीए से अलग होना भारीपड़ा चिराग को?
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चिराग पासवान और लोजपा
दरअसल, बिहार चुनाव में जब चिराग पासवान ने बतौर पार्टी अध्यक्ष ये फैसला लिया कि वहां एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ेंगे तब भी उनके फैसले का पार्टी के भीतर कुछ नेताओं ने विरोध किया था। कई सवाल भी उठे थे और चर्चा तेज हो गई थी कि कहीं एलजेपी एनडीए से अलग तो नहीं हो रहा।
बिहार चुनाव के दौरान अचानक रामविलास पासवान के निधन से आहत चिराग ने फिर भी लड़ाई जारी रखी, लेकिन न तो कोई सिंपैथी वोट मिला, न विधानसभा में जीत मिली। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में एनडीए के साथ लड़ने पर उनके 6 सांसद जीत गए थे।
पशुपति पारस को चिराग की कार्यशैली पसंद नहीं थी और हर पद पर खुद ही बने रहने से उनकी नीयत पर शक था। दूसरी तरफ बिहार में अलग लड़ने से भाजपा और जेडीयू वैसे भी चिराग के खिलाफ था।
पासवान की जगह चिराग को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिलने की संभावना शून्य थी। ऐसे में पशुपति की महात्वाकांक्षाएं प्रबल हुईं और उन्होंने मंत्रिमंडल में सुगबुगाहट को देखते हुए आखिरकार अपनी चाल चल दी।
तो क्या ये मान लेना चाहिए कि चिराग पासवान से पार्टी नहीं संभल पा रही थी, या फिर वो अपने पिता से सियासत के गुणाभाग ठीक से सीख नहीं पाए थे या फिर चाचा पशुपति पारस की मंशा पर संदेह होते हुए भी वो कुछ न कर पाने की स्थिति और मजबूरी में थे?
दरअसल, 2024 के चुनाव से पहले अभी बहुत से राजनीतिक समीकरण बनने बिगड़ने वाले हैं। विपक्षी एकता की कोशिशें तेज़ हो चुकी हैं। यूपी में अखिलेश यादव को केन्द्र में रखकर ताना बाना बुना जाने लगा है। दोनों ही तरफ से बिसात बिछी हुई है, मोहरे सजाए जा रहे हैं।
ऐसे में चिराग पासवान चाचा से यूं ही हार मान जाएंगे और पिता की मेहनत से खड़ी गई पार्टी को यूं ही हाथ से जाने देंगे, ये संभव नहीं लगता। फिलहाल तो दोनों तरफ से मर्यादा में रहकर बयान आ रहे हैं, प्रेस कांफ्रेंस हो रही है लेकिन इसमें संदेह नहीं कि मर्यादाएं जल्दी टूट जाएं और एलजेपी दो धड़ों में बंट जाए।
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