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लंबे संघर्ष के बाद बोडो जनजातीय को मिला हक

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अमित शाह-एके भल्ला - फोटो : ANI
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एक लंबे आंदोलन के बाद असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में फैले बोडो जनजातीय को आखिर अपना हक मिल गया। वैसे उनका आंदोलन अलग राज्य के लिए आरंभ हुआ था, लेकिन 27 जनवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल तथा बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के अध्यक्ष हाग्रामा मोहिलारी की मौजूदगी में हुआ केंद्र सरकार, असम सरकार, बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद तथा उग्रवादी संगठन सभी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोड़ोलैंड के सभी चार गुटों  एवं ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के बीच हुआ नया बोडो समझौते से बहुत हद तक उनकी मांगे पूरी हो गई हैं। इसलिए यह माना जा रहा है कि अलग बोडो राज्य की मांग समाप्त हो जाएगी और असम का विभाजन नहीं होगा।

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समझौते से खुश सर्वानंद सोनोवाल ने बताया कि असम का विभाजन हुए बिना बोडो जनजातीय लोगों की मांगों को मान लिया गया है। इस समझौते से असम का विभाजन नहीं होगा और बोडो समस्या का समाधान हो जाएगा।

वैसे अलग बोडो राज्य की मांग 1966 में प्लेन ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम की अगुवाई में आरंभ हो गई थी। तब ‘उदयाचल’ नामक अलग राज्य के गठन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन को एक स्मारपत्र भी सौंपा गया गया था। बाद में उग्रवादी हिंसा आरंभ हो गई। उसी बीच ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन का गठन हुआ और इसके अध्यक्ष उपेन ब्रह्म ने असम को 50-50 बांटने के लिए लंबा आंदोलन किया।

इधर, सरकारी दमन बढ़ा तो एक के बाद दूसरे उग्रवादी संगठन का जन्म होने लगा। पहले बोड़ोलैंड सिक्यूरिटी फोर्स (बीएसएफ) नामक उग्रवादी संगठन का जन्म हुआ। 20 फरवरी, 1993 को भारत सरकार, असम सरकार ऑल बोड़ो छात्रसंघ (आब्सू) और बोड़ो पीपुल्स एक्शन कमिटी के बीच समझौता हुआ था। जिसके अंतर्गत बोड़ोलैड स्वायत्त परिषद का गठन हुआ। उसके बाद बीएसएफ ने हथियार डाल दिया। लेकिन गुटीय तनाव बढ़ा तो नए उग्रवादी संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड का गठन हुआ। उसमें भी विभाजन हुआ और हाग्रामा मोहिलारी के नेतृत्व में एक नय संगठन- बोडो लिबरेशन टाइगर्स का जन्म हुआ। इन दोनों संगठनों के बीच गुटीय हिंसा में सैंकड़ों लोग मारे गए। उतार-चढ़ाव के बीच आंदोलन चलता रहा।

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एक बार फिर से अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान 10 फरवरी, 2003 को भारत सरकार, असम सरकार और बोड़ोलैंड लिबरेशन टाइगर्स के बीच एक समझौता हुआ और बोडोलैंड टेरिटोरियल कॉउन्सिल गठन हुआ, लेकिन एनडीएफबी इसमें शामिल नहीं हुआ और हिंसा जारी रही। बाद के दिन में एनडीएफबी के अंदर भी विभाजन होता रहा और चार गुट बन गए। आब्सू का अलग राज्य का आंदोलन चलता रहा। आब्सू का मानना था कि अभी भी असम सरकार भेदभाव करती है। 

लेकिन भारत सरकार, राज्य सरकार और बोड़ोलैंड टेटोरियल काउंसिल के बीच 27 जनवरी 2020 को नई दिल्ली में एक समझौता हुआ, जिसके तहत बीटीसी का नया नाम बोड़ोलैंड टेटोरियल रीजन (बीटीआर) होगा।

इस समझौते के तहत बीटीआर को अधिक अधिकार मिलेंगे। नए समझौते में एनडीएफबी के सभी गुट  और आब्सू शामिल हो हुए हैं। इसके तहत बोड़ोलैंड टेटोरियल रीजन को पर्याप्त विधाई, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार मिल जाएंगे। परिषद के सदस्यों की संख्या 60 कर दी गई है। यानी उनके पास पूरी विधानसभा होगी। इससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी।

समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब पहाड़ी इलाके में बसे बोडो नागरिकों भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाएगा। अब तक यह सुविधा इस मैदान इलाके में बसे बोडो को मिलती थी। बोडो भाषा को असम की सरकारी भाषा की मान्यता दी गई है। बोडो भाषा के स्कूलों के लिए एक अलग निदेशालय का गठन होगा, ताकि उनकी भाषा का विकास हो सके। बोडो भाषा के लिए देवनागरी लिपि का प्रचलन भी प्रस्तावित है।

समझौते के तहत प्रमुख 11 सूत्रीय एजेंडा बनाया गया है। 11 पन्नों के हस्ताक्षर वाले समझौता मेमोरेंडम में बोडो भाषा, संस्कृति और संबंधित मामलों की रक्षा सुनिश्चित किए जाने की बात कही गई है। इसमें बोडो क्षेत्रों में केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, स्टेडियम समेत तमाम सुविधाओं को देने की बात कही गई है।

समझौते के मुताबिक एक मोनिटरिंग कमिटी का गठन किया जाएगा, जो बोडो के विकास से जुड़े सभी मामलों को देखेगी। इस कमिटी में केंद्रीय गृह मंत्रालय, असम सरकार, बीटीसी तथा बोडो संगठनों के अधिकारी शामिल होंगे। बोडो लोगों को कुछ विशिष्ट राजनीतिक अधिकार मुहैया कराने के संबंध में असम में विभिन्न वर्गों के लोगों के विचार जानेगी और उस आधार पर कार्य करेगी।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बोड़ोलैंड में रहने वाले गैर बोड़ो इसे स्वीकार कर लेंगे? क्या शेष असम के लोग बोड़ोलैंड के बढ़ते प्रभाव को सहज रूप से लेंगे? इस समझौते से भले ही बोड़ो जनजाति खुश है, लेकिन उस क्षेत्र में रहने वाले गैर बोड़ो की चिंता बढ़ गई है। वे लोग इसका विरोध कर रहे हैं।

बता दें कि बोड़ोलैंड में कुल आबादी का बीटीएडी में, बोडो आबादी लगभग 31%है। बीटीएडी में गैर-बोडो की बड़ी आबादी है जिसमें 15% मुस्लिम, 16% कोच राजवंशी, 14% बंगाली, 12% आदिवासीऔर 10% नेपाली शामिल हैं।

गैर बोडो के साथ भेदभाव की वजह से कई पर वहां पर सांप्रदायिक और गुटीय दंगे हो चुके हैं। बोडो और संथालों के बीच गहरे तनाव हैं। उनके बीच कई बार हिंसक झड़पे हो चुकी हैं। संथाल भी एसटी का दर्जा मांग रहे हैं। उनके उग्रवादी संगठन हैं। जो अभी शांति वार्ता कर रहे हैं।

कोच राजवंशी भी एसटी का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद की सारी सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। वैसे में गैर बोडो को परिषद के चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलता है। यदि उन्हें भी एसटी का दर्जा मिल गया तो पहले से एसटी का दर्जा पाने वाले बोडो के राजनीतिक अधिकार और सुविधाएं बंट जाएंगी। ये सारे सवाल अनुत्तरित हैं।

(लेखक उत्तर पूर्व मामले के जानकार और दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं।)
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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