अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मद्देनज़र यह भारत के लिए एक झटके से कम नहीं है। इसके पीछे चीन की एक और सामरिक मंशा दिखाई देती है।
मगर डोकलाम घटनाक्रम के बाद उसने जिस तरह भारतीय पड़ोसियों से खुलकर दोस्ती और मदद देने का रवैया अपनाया है, उससे भारत उलझन में है। अभी तक कूटनीतिक और बैक डोर सियासत के ज़रिए संभवतः हिन्दुस्तान कोई संदेश या संवाद चीन को नहीं दे सका है। चीन को इसके दो लाभ हुए हैं। एक तो भारत मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया है और दूसरा पड़ोसियों की निग़ाह में भारत का क़द बौना हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मद्देनज़र यह भारत के लिए एक झटके से कम नहीं है। इसके पीछे चीन की एक और सामरिक मंशा दिखाई देती है। एशिया में भारत, अमेरिका का भरोसेमंद साथी माना जा रहा है। ऐसे में वह चाहेगा कि अमेरिका के साथ तीख़े तनाव की स्थिति में भारत उसे कोई नुक़सान और अमेरिका को कोई लाभ न पहुंचा सके। इसलिए उसने हिंदुस्तान के इर्द गिर्द बसे मुल्क़ों के माध्यम से भारत का सिरदर्द बढ़ाने का पूरा प्रबंध कर लिया है। भारत खुलकर अमेरिका की मदद नहीं कर पाएगा तो दोनों देशों के मधुर रिश्तों पर भी असर पड़ेगा। इससे चीन का मक़सद पूरा होता है। इसे देखते हुए भारत के लिए यह अत्यंत संवेदनशील समय है।
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