आब्सू आरंभ से ही अलग बोडो राज्य की मांग करता रहा था। जबकि हाग्रामा क्षेत्रीय परिषद के गठन से संतुष्ठ थे।
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सार्वजनिक जीवन में आने के बाद बीएलटी ने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट का गठन कर लिया था। हाग्रामा के नेतृत्व में बीटीसी के साथ उस क्षेत्र में पड़ने वाले विधानसभा क्षेत्रों में भी बीपीएफ उम्मीदवार विजयी होते रहे।
यूजी ब्रह्मा के नेतृत्व में गठित यूनाइटेड प्रोग्रेसिव पार्टी (लिबरल) ने हर चुनाव में हाग्रामा को चुनौती देने की कोशिश की , लेकिन सफलता नहीं मिली। जबकि यूजी ब्रह्मा को आब्सू का समर्थन था। लेकिन 2020 के बोडो समझौते के बाद वहां के राजनीतिक माहौल में हलचल है। इसका संकेत गत् 12-13 फरवरी को असम के बाक्सा जिले के तामुलपुर में संपन्न विशेष अधिवेशन में दिखा।
इसका आयोजन आब्सू की पहल पर किया गया था। उस अधिवेशन में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडलैंड के नेताओं के साथ हाग्रामा से असंतुष्ठ सभी नेता दिखे। हाग्रामा के पूर्व सहयोगी और कोकराझाड़ से पूर्व सांसद रहे सांसुमा खांगुर बसुमतारी भी शार्मिील हुए। हाग्रामा ने उनका टिकट काटकर दूसरे के अपनी पार्टी का टिकट दिया तो सांसुमा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए।
बोडो नेताओं की आपसी लड़ाई में गैर बोडो निर्दलीय उम्मीदवार जीत गया। महत्वपूर्ण यह है कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडलैंड के नेताओं का रुख क्या होगा। फिलहाल किसी नए राजनीतिक दल के गठन से इनकार किया गया है। हाग्रामा दूरदर्शी नेता हैं। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडलैंड के सभी गुटों को एकजुट करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडलैंड के नेताओं का जगह-जगह स्वागत हो रहा है।
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नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडलैंड के तीन गुट पहले ही भूमिगत जीवन से बाहर आकर केंद्र के साथ शांति वार्ता कर रहे थे, लेकिन चौथे गुट को मुख्य धारा में लाने का श्रेय हाग्रामा को है। एक गुट के नेता गोविंद बसुमतारी पहले से यूपीपीएल के साथ थे।
चुनाव में भी अप्रत्यक्ष रूप से काम किया था, लेकिन हाग्रामा को विशेष क्षति नहीं पहुंचा पाए। लेकिन बोडो नेताओं की आपसी फूट का लाभ गैर बोडो को मिला। यही वजह है कि बीपीएफ को कोकराझाड़ संसदीय सीट से हाथ धोना पड़ा। तामुलपुर विशेष अधिवेशन ने आब्सू अध्यक्ष पद से प्रमोद बोड़ो ने इस्तीफा दे दिया है।
वे अब राजनीति में आने के इच्छुक हैं। वे शायद ही हाग्रामा के साथ जाना पसंद करें। ऐसे में उनके लिए यूपीपीएल ही एकमात्र विकल्प है। सबसे महत्वपूर्ण है कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडलैंड के नेता का नजरिया। क्योंकि कुछ नेता हाग्रामा के संपर्क में हैं।
नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडलैंड के नेताओं का जगह-जगह स्वागत हो रहा है। इसके पीछे भी हाग्रामा की रणनीति है। आयोजन के पीछे उनकी पार्टी सक्रिय है। यह भी संभव है कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड के नेताओं में फूट फड़ जाए। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकार प्रमोद बोड़ो को महत्व दे रहे हैं।
सशस्त्र समर्पण समारोह और प्रधानमंत्री की रैली में प्रमोद बोड़ो को मंच पर स्थान दिया गया और भाषण देने का अवसर भी। इसके पीछे भाजपा की अपनी रणनीति है। इस बात को हाग्रामा भी समझ में रहे हैं कि प्रमोद बोडो उन्हें चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।
यही वजह है कि गत 13 फरवरी को कोकराझाड़ में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने प्रमोद बोड़ो पर हमला किया और कहा कि अगला चुनाव भी वे जीतेंगे और प्रमोद बोड़ो को जीतने नहीं देंगे। उनका आरोप है कि प्रमोद बोड़ो ने जनता को अलग बोडो राज्य का झूठा सपना दिखाकर ठगा है। बोडो जनता उन पर विश्वास नहीं कर सकती है।
दरअसल, नए बोडो समझौते पर आब्सू की तरफ से प्रमोद बोड़ो ने हस्ताक्षर किया है। समझौते में इस बात का उल्लेख है कि अब किसी बोडो समस्या के लिए आंदोलन नहीं होगा। सभी मांगे मानी ली गई हैं। उसी बात को हाग्रामा को प्रमोद बोड़ो के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि हाग्रामा खुद समझौते के समय मौजूद थे।
भारतीय जनता पार्टी की दिक्कत यह है कि वह हाग्रामा पर भरोसा नहीं कर सकती है। भले ही उनकी पार्टी राज्य सरकार में शामिल है। हाग्रामा मौका देखकर रंग बदलते हैं। इसके पहले वह कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार का समर्थन कर रहे थे। राज्य में जिस दल की सरकार होती है, वे उसके साथ शामिल हो जाते हैं, इसलिए भाजपा गैर हाग्रामा शक्तियों की संभावना तलाश रही है।
लेकिन नए बोडो समझौते के बाद बोडोलैंड में विकास की नई संभावनाएं बनी हैं। यदि सारे बोडो नेता मिलकर आगे बढ़े तो अच्छा होगा। बोडो आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना आत्मघाती संघर्ष रहा है। वैचारिक और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अलग हो सकती है, लेकिन उस क्षेत्र का विकास पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
(लेखक गुवाहाटी से प्रकाशित दैनिक पूर्वोदय के संपादक और पूर्वोत्तर मामले के जानकार हैं।)