नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की तस्वीर
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राज्यसभा में विधेयक पेश करते गृह मंत्री अमित शाह
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सरकार की तैयारी में कमी
दरअसल, जैसी तैयारी उसने धारा 370 हटाने और तीन तलाक कानून पास होने और अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले की थी, वैसी तैयारी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर नहीं की थी, यह साबित हो गया है। अगर तैयारी की होती तो जामिया मिलिया से लेकर सुदूर केरल तक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नही हुए होते।
कानून बन चुके विधेयक के विरोधी जिस पुरजोर तरीके से न केवल सरकार पर हमलावर हैं बल्कि विपक्ष को एक नई एकजुटता का जो अवसर मिल गया है, उसमें पूरी तरह सरकार खुफिया एजेंसियों और एक दल के तौर पर भारतीय जनता पार्टी के जमीनी नेटवर्क की असफलता ही कही जाएगी, वे उसका अंदाजा ही नहीं लगा सके।
भाजपा और समूचे संघ परिवार ने अब जाकर इस कानून के पक्ष में अभियान चलाना शुरू किया है, जब सब तरफ विरोध हो रहा है। इसमें भी भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं को नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी का फर्क ठीक से पता नहीं है। वे अधिनियम बन जाने के बाद भी मैं सीएबी और एनआरसी के समर्थन में कैंपेन चला रहा हैं।
अब भी सीएए और एनआरसी को भाजपा तक अलग-अलग नहीं देख पा रही है। ऐसे में किसी भ्रमित किए गए समुदाय से दाेनों कों अलग-अलग देखने की मांग करना कैसे जायज हो सकता है? जरूरी है कि सरकार और उसका तंत्र सुप्रीम कोर्ट मेंं जवाब देने के अलावा जनता के बीच नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बारे में बहुत ही स्पष्टता से समझाए और दाेनों का फर्क समझाए और एनआरसी को लेकर भी जारी भ्रम को स्पष्ट करे।
अन्यथा लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में देश की संपत्ति को नष्ट करने और भाईचारे के तानेबाने को नष्ट करने में अपनी सियासत चमकाने की कोशिश कर रहे लोग सफल हो सकते हैँं, वे सफल हुए तो देश को भारी नुकसान होगा।
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