निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर ने वर्ष 2007 में ट्रैफिक सिग्नल नाम की फिल्म बनाई थी। फिल्म भिखारियों के नेटवर्क पर आधारित थी। फिल्म में बखूबी दिखाया गया कि कैसे मुंबई के एक व्यस्त चौराहे के ट्रैफिक सिग्नल पर अलग-अलग तरीकों से भीख मांगी जाती है।
दरअसल, भारत ही नहीं, दुनिया के कई देश भिखारियों की समस्या से जूझ रहे हैं। आज किसी भी नगर या महानगर के करीब-करीब प्रत्येक चौराहे, भीड़भाड़ वाले बाजारों, मंदिरों या अन्य प्रार्थना स्थलों के बाहर भिखारियों को देख सकते हैं। विडंबना यह है कि भिखारियों को लेकर देश में कोई विशेष कानून नहीं है, लेकिन अब मिजोरम ने अब राह दिखाई है।
उत्तर पूर्व के छोटे से राज्य मिजोरम ने अपने यहां भीख मांगने को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया है। मिजोरम भिक्षावृत्ति निषेध विधेयक 2025 का मकसद केवल भीख मांगने पर रोक लगाना नहीं, बल्कि भिखारियों का पुनर्वास एवं उन्हें स्थाई आजीविका उपलब्ध कराना भी है।
भारत में भीख मांगना कोई नई समस्या नहीं है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में करीब 4 लाख भिखारी थे। हालांकि, वास्तविक संख्या इससे कई गुना अधिक है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत अधिकांश बड़े शहरों में भीख मांगना धंधा बन चुका है।
कुछ रिपोर्ट्स में यहां तक कहा गया है कि बड़े शहरों में एक भिखारी प्रतिदिन 500 से 1500 रुपए तक कमा लेता है। कई शहरों में भीख मांगना एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। ऐसी भी रिपोर्ट्स आई हैं कि भिखारियों को नियंत्रित करने वाले गिरोह उन्हें क्षेत्र बांटकर देते हैं।
बच्चों का अपहरण कर उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है। ट्रैफिक सिग्नल, रेलवे स्टेशन या धार्मिक स्थलों पर हर जगह भीख मांगने के ठेके होते हैं। भिखारियों के अलावा किन्नरों के गिरोह भी महानगरों के चौराहों पर जबरन वसूली करते मिल जाएंगे। इनकी संख्या भी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।
भारत में इस समस्या को लेकर कोई केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। हालांकि, राज्यों ने भिक्षावृत्ति रोकने के लिए अपने-अपने एक्ट बनाए हैं। इनमें सबसे प्रमुख बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 है, जिस पर कई राज्यों ने अपने कानून आधारित किए हैं, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगना अपराध माना गया है।
दोषी को जुर्माना या जेल की सजा दी जा सकती है। कई बार भिखारी को सुधारगृह भेजा जाता है। केंद्र और राज्य सरकारें भिखारियों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए कुछ योजनाएं भी चला रही हैं।
जैसे, दीनदयाल अंत्योदय योजना में शहरी गरीबों को रोजगार, स्वरोजगार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना, बेघर और भिक्षावृत्ति करने वालों को सुधारगृह में रखना, भीख मांगने वाले बच्चों को बाल गृहों में रखना, बड़े शहरों के भिखारियों को कौशल प्रशिक्षण केंद्रों में भेजना।
ऐसे समाचार भी हैं कि सरकार भिखारियों का डाटाबेस तैयार कर रही है, जिससे उन्हें आधार, जन-धन खाता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जा सके।
वैसे, देश की अदालतों की भिक्षावृत्ति को लेकर अलग राय है। वर्ष 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपना एक फैसला सुनाते हुए कहा था कि भीख मांगना अपराध नहीं है, बल्कि यह गरीबी और बेरोजगारी जैसी गहरी समस्याओं का परिणाम है।
अदालत ने दिल्ली और मुंबई में भीख को अपराध मानने वाले प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया। अदालत का स्पष्ट कहना था कि भिक्षावृत्ति की समस्या का समाधान दंड नहीं, बल्कि पुनर्वास है।
दुनिया के दूसरे देशों में भिक्षावृत्ति पर कानूनों की बात करें तो सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका के कुछ राज्यों में आक्रामक भीख मांगना अपराध है। हालांकि, यहां भी अदालतें इसे फ्रीडम ऑफ स्पीच मानती हैं। ब्रिटेन में वेग्रन्सी (आवारागर्दी) एक्ट 1824 अब ढीला कर दिया गया है। जर्मनी और फ्रांस में शांतिपूर्वक भीख मान्य है, लेकिन आक्रामक रूप से ऐसा करना अपराध है।
नॉर्वे और स्वीडन में स्थानीय स्तर पर भीख मांगने पर पाबंदी है। सऊदी अरब, यूएई एवं कतर में यह पूरी तरह गैर कानूनी है। दोषी पाए जाने पर जेल और विदेशी नागरिक होने पर देश से निष्कासन होता है। पड़ोसी देश चीन में भीख मांगने वालों को सुधारगृह भेजा जाता है। जापान में तो सामाजिक सुरक्षा इतनी मजबूत है कि भीख मांगना लगभग न के बराबर है।
न्यूजीलैंड में शांतिपूर्वक भीख वैध है, लेकिन धमकी या जबरदस्ती अपराध है। पड़ोसी देश पाकिस्तान में 20 लाख से अधिक लोग भिक्षावृत्ति में शामिल हैं। कराची, लाहौर, फै़सलाबाद, इस्लामाबाद जैसे बड़े शहरों में भीख एक संगठित कारोबार बन चुका है। वहां प्रोफेशनल भिखारी शब्द आम हो गया है, यानी ऐसे लोग जिनके लिए भीख एक स्थायी पेशा है।
विडंबना यह है कि जिन चौराहों, मंदिरों, सड़कों या बाजारों में भिखारी घूम रहे हैं, वहां से सरकार के जिम्मेदार लोग रोजाना गुजरते हैं। वो इस समस्या को देखकर भी अनदेखा करते हैं। या तो अब उनके लिए यह समस्या आम हो गई है या फिर उन्होंने हार मान ली है। मिजोरम ने राह तो दिखाई है।
हालांकि, मिजोरम की राजधानी आइजोल में मात्र 30 से कुछ अधिक भिखारी हैं, जिनमें से अधिकतर गैर स्थानीय हैं। छोटे राज्य में एक बार को यह ऐसा कानून लागू करना संभव हो सकता है, लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में नए सिरे से इस समस्या के निदान को लेकर कुछ हटकर सोचना होगा।
भिक्षावृत्ति को लेकर केंद्रीय कानून बनाना और उसे सख्ती से लागू कराना न केवल देशहित में है, बल्कि यह समय की मांग भी है। भिखारियों की बढ़ती संख्या के साथ विकसित भारत की कल्पना नहीं की जा सकती।
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