पिछले 10 वर्षों के आंदोलनों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे कि सभी आंदोलन ‘संघर्ष’ के नहीं बल्कि ‘समझौतों’ के आंदोलन रहे हैं।
- फोटो : हिमांशु सोनी
आंदोलन संघर्ष, ज़ज़्बा, सबकुछ दांव पर लगाने की नीयत और व्यवस्था को बदल देने की ताकत के सामूहिक बोध से बनते हैं लेकिन अब इस सामूहिक बोध का लोप हो रहा है और आंदोलन मध्यवर्गीय आकांक्षाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। ऐसे में आंदोलनों की सफलता, व्यवस्था को बदलने में नहीं बल्कि उसके साथ समझौते करने में निहित हो गई है।
पिछले 10 वर्षों के आंदोलनों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे कि सभी आंदोलन ‘संघर्ष’ के नहीं बल्कि ‘समझौतों’ के आंदोलन रहे हैं। जबकि आंदोलन यथास्थिति के खिलाफ आक्रोश की सुनियोजित अभिव्यक्ति है जो सत्ता की व्यक्त-अव्यक्त, जनता विरोधी या संविधान विरोधी नीति-नियमों के खिलाफ विरोध का संगठित प्रयास है।
कुछ लोग यथास्थिति को बनाकर रखना चाहते हैं और कुछ लोग उसे तोड़ना चाहते हैं। इसी संघर्ष से आंदोलनों की उत्पत्ति होती है। इसलिए सत्ता जब-तब आंदोलनों को कुचलने से लेकर उन्हें ‘कॉ-ओप्ट’ (Co-opt) तक करती रही है। हाल के वर्षों में होने वाले मध्यवर्गीय और मांग आधारित आंदोलन सत्ता के सामने कोई खास चुनौती पेश नहीं कर पाए और न ही सत्ता पर उसका कोई खास दबाव नज़र आया। इसका एक कारण तो संगठित प्रयास में आई कमी है तो वहीं दूसरा, सत्ता द्वारा आंदोलनों को थका कर खत्म कर देने की रणनीति। लेकिन इसमें जो सबसे बड़ा कारण है वह है आंदोलनों के चरित्र का सामझौतावादी और सुविधाभोगी होना ।
आंदोलन की ताकत को कमजोर करने में मध्यवर्गीय बौद्धिक जमात की बड़ी भूमिका रही है।
- फोटो : हिमांशु सोनी
इसके चलते ही आंदोलनों में लोगों की भागीदारी भी उस स्तर पर नहीं देखने को मिल रही है जितनी की पहले के आंदोलनों में होती थी। स्व केंद्रण की वृत्ति ने सामूहिकता का लोप किया है, इसलिए आंदोलन जैसे सामूहिक प्रयास विफल हो रहे हैं। हाल के आंदोलन में कोई बहुत परिवर्तनकारी आंदोलन नज़र नहीं आता है और जो कुछ एक चुनौतीपूर्ण आंदोलन खड़े भी हुए हैं तो उन्हें या तो सत्ता ने नज़र अंदाज कर खत्म कर दिया या फिर उनकी परिणिति समझौते में हो गई। इसका सबसे मुफीद उदाहरण ‘अन्ना’ और ‘गन्ना’ किसानों का आंदोलन है।
आंदोलन की ताकत को कमजोर करने में मध्यवर्गीय बौद्धिक जमात की बड़ी भूमिका रही है। हाल के दिनों में हुए मध्यवर्गीय बौद्धिक ज़मात के आंदोलन की पड़ताल की जाए तो वह आंदोलन ‘संघर्ष’ से ज्यादा ‘इवेंट’ के प्रतीक बनकर रह गए हैं। यह जमात जो स्वयं को ‘ओपिनियन मेकर’ के तौर पर प्रस्तुत करती है उसने आंदोलनों के असर, तरीकों और ‘ईंटेंसिटी’ को काफी हद तक निष्प्रभावी किया है ।
आंदोलन की यह सुविधाभोगी प्रवृति कहीं न कहीं किसान और मजदूर आंदोलन की गंभीरता को संदेहास्पद बना रही है
- फोटो : अमर उजाला
इस जमात के लिए सड़क ‘जस्ट हैंग आउट’ और आंदोलन सामूहिक ‘सेल्फ़ी इवेंट’ बनकर रह गए हैं। आंदोलनों को लेकर इस तरह की प्रवृति ने सत्ता और जनता के नजरिए को बदल दिया है। हाल के आंदोलनों के प्रति जनता की राय बहुत सकारात्मक नहीं रही है और न ही जनता की बड़े पैमाने पर भागीदारी रही है। आप रामलीला मैदान में प्रायोजित आंदोलन से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के आंदोलन को ‘केस स्टडी’ के तौर पर देख सकते हैं।
इन आंदोलन में एक तरफ अलग-अलग पोस्टर, बैनर और तनी हुई मुट्ठी के साथ गूंजते नारे हैं (जो पुराने ट्रेड यूनियन की याद दिलाते हैं) जो कुछ सड़क नापते ही हांफने लगते हैं तो वहीं दूसरी तरफ इन आंदोलनों की एक हक़ीक़त और भी है जिसमें हाथ में पानी की बोतल, आंखों में धूप का चश्मा, मीडिया, मंच, सेल्फ़ी के साथ आभासी दुनिया में संघर्ष व बहस के साथ आंदोलन की गंभीरता नेपथ्य में चली जाती है । यही दूसरा पक्ष आज के आंदोलनों का प्रमुख पक्ष बन चुका है ।
आंदोलन की यह सुविधाभोगी प्रवृति कहीं न कहीं किसान और मजदूर आंदोलन की गंभीरता को संदेहास्पद बना रही है और लोकतन्त्र के इस मजबूत हथियार का मखौल उड़ा रही है। इस प्रवृति पर गंभीरता से विचार करने की अवश्यकता है आंदोलन मंच पर जगह पाने के लिए नहीं होते बल्कि सड़क पर ‘स्पेस’ बचाए व बनाए रखने के लिए होते हैं। आंदोलन की धार तभी बनी व बची रह सकती है जब संघर्ष, सड़क की जगह को बचाने के लिए, सड़क पर होगा वह भी पूरी गंभीरता और ‘कम्फर्ट ज़ोन’ से बाहर आकर। जबकि हाल के आंदोलनों की तस्वीरों को गौर से देखें तो उनमें सड़क से ज्यादा लोग मंच पर नज़र आते हैं। कई बार आंदोलन की परिणिति मंच पाने के संघर्ष में भी तब्दील हो जाती है ।
उसके साथ ही आंदोलनों को समझौते की नहीं संघर्ष की राह पर चलना होगा तभी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। जबकि हाल के ‘इवेंटनुमा’ आंदोलन, आंदोलनों की परंपरा को तो कमजोर कर ही रहे हैं उसके साथ ही आम जन-मानस में भी आंदोलन के प्रति विश्वास को खो रहे हैं । आंदोलनों की धार दिनों-दिन कमजोर होती जा रही है। सत्ता अब आंदोलन के इस मिजाज़ को अच्छे से समझ गई है। इसलिए उसे इन आंदोलनों से न तो कोई फ़र्क पड़ता है, न ही कोई दबाव महसूस होता है । ऐसा होना लोकतंत्र के लिए किसी भी सूरत में ठीक नहीं है।
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