और एक दिन बड़े भाई साजिद ने घोषणा कर दी कि अब दोनों भाई अपना काम करेंगे।
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दोनों भाइयों में अगाध प्रेम था। वाजिद को बनना था क्रिकेटर मगर पिताजी उस्ताद शराफ़त अली ख़ान साहब जो की किराना घराना के तबला के उस्ताद थे, उन्होंने वाहिद को गिटार ला कर दिया और उस दिन के बाद से वाजिद के हाथ से वो छूटा नहीं। रात को कपड़ा बांध बजाता था ताकि आवाज़ ना हो बस उंंगलियांं चल जाएंं।
पिताजी के साथ देश-विदेश में कई कॉन्सर्ट किए। मज़ार और दरगाह पर भी बजाया। साजिद के अंदर रिदम की ग़ज़ब की सेन्स थी तो वाजिद, ट्यून और मेलडी का चैम्पियन था।
कड़क पिताजी जब तक रियाज़ सुन नहीं लेते थे, खाना नहीं खाने देते थे। डिसप्लिन की वजह से दोनों भाई अपने पिताजी को हिट्लर समझते थे मगर आदर इतना था कि आज भी रियाज़ के बग़ैर कोई दिन नहीं जाता था।
एक बार नदीम श्रवण की रिकॉर्डिंग में 150 लोगों का ऑर्कस्ट्रा था जिसमें वाजिद गिटार बजा रहा था। किसी ने ग़लत सुर लगाया और श्रवण ने भला बुरा कहा वाजिद को। तुम्हें अभी बहुत सीखने की ज़रूरत है सुनते ही उसने अपना गिटार उठाया और घर आ गया।
बहुत अप्सेट था, तो बड़े भाई साजिद ने घोषणा कर दी कि अब दोनों भाई अपना काम करेंगे। एक अल्बम बनाया मगर रिलीज़ नहीं हुआ। फिर सोहैल खान की फ़िल्म में काम मिला - प्यार किया तो डरना क्या। गाना था तेरी जवानी बड़ी मस्त मस्त है।
सलमान खान ने बहुत साथ निभाया और इन दोनों भाइयों की ज़िंदगी और करियर को बड़े मक़ाम तक ले गए। सलमान ने अभी लॉक डाउन में “भाई भाई” नाम का गाना बनाया जिसका कॉम्पज़िशन साजिद वाजिद ने किया था। ये 25 साल की दोस्ती, दोनों भाइयों ने खूब निभाई। सलमान के घर पर गाने को महफ़िल में दोनों भाई हमेशा मौजूद होते थे।
वाजिद का जाना ग़लत है। असमय है।
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एक और बात। इनके पिताजी उस्ताद शराफ़त अली खान ने पंचम के साथ बहुत सारी फ़िल्मों में तबला डिपार्टमेंट सम्भाला है। पंचम जैसा रिदम सेन्स बहुत कम लोगों में होता है और ऐसे में उस्ताद जी का तबला सम्भालना यानी उनकी कला पर पकड़ का उदाहरण है। पाकिस्तान में आयोजित संगीत की कई महफ़िलों में उस्ताद जी ने शिरकत की थी।
वाजिद के नानाजी उस्ताद फ़ैयाज़ अहमद खान साहब को पद्मश्री और मामा उस्ताद नियाज़ अहमद खान साहब को तानसेन पुरस्कार से नवाज़ा गया था। इनके दादा उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खान क्लासिकल म्यूज़िक के बहुत प्रसिद्ध कलाकार थे। पूरा ख़ानदान शास्त्रीय संगीत को अपनी सेवा दे रहा था तो इन भाइयों के संगीत की समझ भी अपने आप में अलग ही थी।
वाजिद का जाना ग़लत है। असमय है। साजिद अकेले नहीं कर पाएगा कुछ भी क्योंकि उसका सारा प्यार वाजिद के लिए था। वो उसे इंडस्ट्री में भी प्रोटेक्ट कर के रखता था। कभी अकेले नहीं जाने देता था किसी मीटिंग में और साजिद मुंंहफट बना रहा क्योंकि वाजिद के दिल में हर किसी के लिए जगह थी।
अद्भुत जोड़ी, बहुत ग़लत टूटी है। हिंदुस्तानी वाद्य यंत्रों वाले गाने अब शायद नहीं सुनाई देंगे। वाजिद को नहीं जाना था। अच्छा आदमी होना ज़रूरी है। फ़िल्म संगीत के लिए भारी नुक़सान है। अच्छे लोग नहीं रहने से सब कुछ भारी हो जाता है।
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