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कोरोना संकट और आत्मनिर्भर भारत: मनरेगा को कृषि से जोड़कर बदली जा सकती है यूपी की तस्वीर

सार

  • कृषि क्षेत्र में सालाना वृद्धि दर 4 फीसदी से नीचे है।
  • कृषि को उद्योग का दर्जा देना होगा तथा बिचौलिया संस्कृति से भी मुक्ति दिलानी होगी।
  • अब कोरोना के चलते स्थितियां बदली हुई हैं। बीमारू राज्यों के ऊपर दोहरा दबाव है।
  • मंदी के चलते रीयल स्टेट इतनी जल्दी उबरने की स्थिति में नहीं है।
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कृषि क्षेत्र में निवेश को लेकर कोई भी सरकार गंभीर नजर नहीं आई। - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने आखिरी बार वर्ष 2016 में किसानों की आत्महत्या के संदर्भ में स्पेसिफिक रिपोर्ट जारी की थी। आखिरी बार इसलिए की 2015 के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों की आत्महत्या को लेकर जारी होने वाली स्पेसिफिक रिपोर्ट पर रोक लगा दी थी।

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एनसीआरबी की इस अंतिम 'एक्सिडेंटल डेथ एंड सुसाइड' रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि देश में प्रतिदिन 31 किसान और महीने में 948 किसान किसी ना किसी कारण से आत्महत्या करने को मजबूर हैं।

आंकड़े बताते हैं कि 1995 से लेकर 2016 तक भारत में 3,29,907 किसानों ने आत्महत्या की। इन आत्महत्याओं की जड़ में सबसे बड़ा कारक किसानों का कर्ज के बोझ तले दबा होना पाया गया।
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दरअसल, आत्महत्या करने वाले किसानों में एक बड़ी आबादी गन्ना, प्याज, टमाटर जैसी नगदी फसल बोने वाले किसानों की रही है। नई सदी की शुरुआत के बाद भी कृषि क्षेत्र में निवेश को लेकर कोई भी सरकार गंभीर नजर नहीं आई।

कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी जैसी तात्कालिक राहत देने वाला राजनीतिक कदम तो उठाया, लेकिन कृषि क्षेत्र की बेहतरी और किसानों की आय में बढ़ोतरी को लेकर कोई दीघर्कालीन योजना पर ध्यान केंद्रित नहीं किया।

किसानों को इससे आंशिक राहत तो मिल गई, लेकिन आत्महत्या के रिकॉर्ड में कुछ खास अंतर नहीं पड़ा।

2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई तब उस पर भी इसी तरह का दबाव था। भाजपा ने कृषि क्षेत्र में निवेश के साथ किसानों की आय बढ़ाने का वादा करके सत्ता में पहुंची थी।

कांग्रेस के इतर भाजपा सरकार ने कर्जमाफी जैसे तात्कालिक एवं राजनीतिक कदम उठाने की बजाय कृषि क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के मूल पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास तो किया, लेकिन पिछले छह सालों में खाद्यान्न के दाम में छोटी-मोटी बढ़ोतरी के अलावा कोई गुणात्मक बदलाव नहीं कर पाई है, जिससे कृषि क्षेत्र में कोई क्रांति आ जाए।

किसानों की आय में बढ़ोतरी किए बगैर कोई भी राहत ऊंट के मुंह में जीरा से ज्यादा कुछ नहीं है। केवल कर्जमाफी, अनुदान या मूल्यों में आंशिक बढ़ोतरी के जरिए किसानों की आय को दोगुना किया जाना मुश्किल है। कृषि क्षेत्र की हालत बिना किसी बड़े निवेश के बदल पाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।

जब तक इस क्षेत्र को खाद्य प्रसंस्करण से जोड़कर किसानों को खुद अपने उत्पादन का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक कोई सकारात्मक बदलाव संभव नहीं है।
 
मात्र छह वर्षों में किसी बड़े चमत्कारिक बदलाव की उम्मीद तो नहीं की जा सकती है, लेकिन सही दिशा में सही तरीके से आगे बढ़ा जाए तो यह मुश्किल भी नहीं है। कृषि भी अन्य उद्योगों की तरह लाभ का सौदा बन सकता है।

मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में छोटे-छोटे कदमों के जरिए इस दिशा में बढ़ना शुरू किया, लेकिन दूसरे कार्यकाल में कृषि को लेकर बीते एक साल में कोई गंभीरता नजर नहीं आई है।

पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने फसलों की एमएसपी में बृद्धि, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, राष्ट्रीय कृषि बाजार, फसल बीमा योजना, मोर क्राप पर ड्रॉप तथा किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को लागू किया, इसमें वेयरहाउस और गोदामों की क्षमता वृद्धि जैसी बुनियादी उन्नयन भी शामिल हैं। परंतु इतने मात्र से कृषि क्षेत्र भारत की जीडीपी में बड़ा योगदान नहीं कर पाएगा।
 

किसानों को केवल सिस्टम का शिकार नहीं होना पड़ता है, बल्कि...

कोरोना काल में कृषि क्षेत्र को भी मंदी का सामना करना पड़ रहा है। - फोटो : ANI
कृषि क्षेत्र में सालाना वृद्धि दर 4 फीसदी से नीचे है। इस दौरान वास्तविक कृषि आय आधा फीसदी से भी कम रही है। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए 2016 में गठित दलवई समिति ने भी अनुमान लगाया है कि किसानों की आय में 10.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुए बगैर यह संभव नहीं है।

किसानों की आय को आधा फीसदी से 10.4 तक बढ़ाने के लिए केवल छोटे-छोटे उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए कृषि को उद्योग का दर्जा देना होगा तथा बिचौलिया संस्कृति से भी मुक्ति दिलानी होगी। सिस्टम के ऑनलाइन होने के बावजूद कृषि से जुड़े विभागीय अधिकारियों के भ्रष्टाचार के चलते किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

किसानों को केवल सिस्टम का शिकार नहीं होना पड़ता है, बल्कि मौसम की अनिश्चितता का भी सामना करना पड़ता है। फसल बीमा को लेकर भी सरकार की नीति बहुत कारगर नहीं है। इसमें पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है।  

कृषि आय बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देना सबसे महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। केंद्र सरकार अगर सचमुच किसानों की बेहतरी को लेकर चिंतित है तो उसे महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना को कृषि से जोड़ना होगा।

कोरोना काल में उद्योगों के साथ कृषि क्षेत्र को भी मंदी का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना के इस विषम दौर में कई राज्य मनरेगा के जरिए ही गरीबों की लिक्विडिटी बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं। मनरेगा में भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं।

मजदूरों को काम देने के नाम पर बिना जरूरत के गड्ढे खुदवाने और भरवाने से बेहतर है कि एक पुख्ता रणनीति बनाकर इसे किसानों की खेती से जोड़ा जाए।

मनरेगा को कृषि से जोड़े जाने से किसान, सरकार और मजदूर तीनों को लाभ होगा। योजना का विकेंद्रीकरण होने से भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा।         
 
किसानों की दशा को बेहतर करने के केंद्र के प्रयास भले ही पर्याप्त नहीं हों, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य ने बीते ढाई वर्षों में इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर गन्ना और तिलहन जैसी नगदी फसल के उत्पादन में बड़ी छलांग लगाई है।

उत्तर प्रदेश में कर्जमाफी जैसी तात्कालिक कदम उठाने के साथ बुनियादी ढांचागत सुधार की तरफ भी ध्यान केंद्रित किया गया है।

योगी सरकार ने कृषि योजनाओं में किसानों को दिए जाने वाले लाभ एवं खाद्यान खरीद से बिचौलिया नेक्सस को बाहर करने में सफलता पाई है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने छोटे-मझोले किसानों को डीबीटी से जोड़कर आमदनी के लिकेज को बंद करने का काम किया है। किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी लागू कर बीच के सारे छेद बंद कर दिए हैं।
 
धान, गेहूं, आलू खरीद में तय समय सीमा में भुगतान करने की योजना ने बिचौलियों की जरूरत ही कम कर दी है। धान, गेहूं जैसे परंपरागत खाद्यान्नों पर एमएसपी बढ़ाकर किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में भी योगी सरकार ने कदम उठाया है, पर यह पूरी तरह पर्याप्त है, यह मान लेना जल्दबाजी होगी।

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों की परेशानी खत्म तो नहीं हो पाई है, लेकिन सरकार ने इसे कम करने में सफलता जरूर पाई है। इंटरप्राइज रिसोर्स प्लान यानी ईआरपी लागू कर यूपी ने गन्ना पर्ची के जरिए होने वाले खेल को खत्म कर दिया है।

ईआरपी के शुरू होने के बाद राज्य के 46.20 लाख किसानों के सर्वे, कैलेंडर, पर्ची की जानकारी ऑनलाइन मिल रही है। सपा-बसपा के पिछले एक दशक से ज्यादा के शासनकाल में यूपी 29 चीनी मिलें बंद हुईं। इन बंद चीनी मिलों ने गन्ना किसानों की परेशानी में दोहरा इजाफा किया।
 
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यूपी सरकार की बड़ी उपलब्धि खांडसारी लाइसेंस जारी करने की नीति है...

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने वापस लौटे मजदूरों का डाटा तैयार करवाया है। - फोटो : अमर उजाला
बसपा सरकार में निगम की कई लाभकारी चीनी मिलों को औने-पौने दामों में निजी हाथों में बेचकर गन्ना किसानों और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया।

योगी आदित्यनाथ ने पूरी तरह बंद हो चुकी पूर्वांचल की पिपराइच और मुंडेरवा चीनी मिल फिर से शुरू कराकर इस बेल्ट के किसानों को फिर नकदी फसल की तरह बढ़ने को प्रोत्साहित किया है।

इन दोनों चीनी मिलों से 27-27 मेगावाट बिजली भी पैदा हो रही है, जिससे राज्य की बिजली की जरूरत पूरी हो रही है। पिपराइच चीनी मिल में 120 किलोलीटर की डिस्टलरी भी बनकर तैयार हो रही है। पिछली सरकारों की अनदेखी तथा पूर्वांचल के साथ सौतेले व्यवहार के चलते क्षेत्र की 12 चीनी मिलें बंद हो गई थीं।

योगी सरकार ने पूरे प्रदेश में तमाम कारणों बंद पड़ी डेढ़ दर्जन चीनी मिलों का संचालन सुनिश्चित कर गन्ना किसानों की बड़ी समस्या का समाधान किया है।
 
राज्य में गन्ना क्षेत्रफल 2017 में 20 लाख हेक्टयेर था, जो अब 28 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। यह इसलिये भी उल्लेखनीय है कि बड़े चीनी उत्पादक राज्य में शामिल महाराष्ट्र में गन्ना क्षेत्रफल 11 लाख हेक्टयेर से घटकर 8.40 लाख हेक्टयर तक सिमट गया है।

यूपी सरकार की बड़ी उपलब्धि खांडसारी लाइसेंस जारी करने की नीति है। पिछले 25 सालों से खांडसारी के नये लाइसेंस नहीं बन रहे थे, अब तक 100 से ज्यादा खांडसारी के लाइसेंस जारी किए हैं, जिसकी क्षमता 30 हजार डीटीसी यानी पिपराइच जैसी छह चीनी मिलों के बराबर है।

इन सुधारों का असर है कि बीते सीजन में दिसंबर तक 44.5 लाख टन चीनी उत्पादन करके सबसे बड़ा उत्पादक बने महराष्ट्र में इस बार मात्र 16.5 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। पिछले साल इसी अवधि में 31 लाख टन चीनी वाला यूपी अब तक 33.10 लाख टन चीनी का उत्पादन कर चुका है। तीसरे बड़े चीनी उत्पादक राज्य कर्नाटक में भी पिछली बार 21 लाख टन के मुकाबले इस बार मात्र 16.3 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।
 
अब कोरोना के चलते स्थितियां बदली हुई हैं। बीमारू राज्यों के ऊपर दोहरा दबाव है। प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली बड़ी धनराशि से ये राज्य वंचित रहेंगे तो दूसरी तरफ इन मजदूरों को अपने ही राज्य में काम उपलब्ध कराने की चिंता इसमें शामिल है।

उत्तर प्रदेश भी इसी दौर से गुजर रहा है। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने वापस लौटे मजदूरों का डाटा तैयार करवाया है, इनमें से कुछ कुशल मजदूरों को तो समायोजित किया जा सकेगा, लेकिन अकुशल मजदूरों को भवन निर्माण या फिर कृषि कार्यों के जरिए ही काम उपलब्ध कराया जा सकता है।

मंदी के चलते रीयल स्टेट इतनी जल्दी उबरने की स्थिति में नहीं है, लिहाजा मनरेगा और कृषि ही ऐसे दो कार्य हैं, जो इनकी आमदनी को बनाए रख सकते हैं।  योगी आदित्यनाथ ने इच्छाशक्ति दिखाते हुए इन दोनों कार्यों को एक साथ जोड़ देते हैं तो कृषि और मनरेगा दोनों लाभ का सौदा साबित हो सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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