नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने आखिरी बार वर्ष 2016 में किसानों की आत्महत्या के संदर्भ में स्पेसिफिक रिपोर्ट जारी की थी। आखिरी बार इसलिए की 2015 के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों की आत्महत्या को लेकर जारी होने वाली स्पेसिफिक रिपोर्ट पर रोक लगा दी थी।
एनसीआरबी की इस अंतिम 'एक्सिडेंटल डेथ एंड सुसाइड' रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि देश में प्रतिदिन 31 किसान और महीने में 948 किसान किसी ना किसी कारण से आत्महत्या करने को मजबूर हैं।
आंकड़े बताते हैं कि 1995 से लेकर 2016 तक भारत में 3,29,907 किसानों ने आत्महत्या की। इन आत्महत्याओं की जड़ में सबसे बड़ा कारक किसानों का कर्ज के बोझ तले दबा होना पाया गया।
दरअसल, आत्महत्या करने वाले किसानों में एक बड़ी आबादी गन्ना, प्याज, टमाटर जैसी नगदी फसल बोने वाले किसानों की रही है। नई सदी की शुरुआत के बाद भी कृषि क्षेत्र में निवेश को लेकर कोई भी सरकार गंभीर नजर नहीं आई।
कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी जैसी तात्कालिक राहत देने वाला राजनीतिक कदम तो उठाया, लेकिन कृषि क्षेत्र की बेहतरी और किसानों की आय में बढ़ोतरी को लेकर कोई दीघर्कालीन योजना पर ध्यान केंद्रित नहीं किया।
किसानों को इससे आंशिक राहत तो मिल गई, लेकिन आत्महत्या के रिकॉर्ड में कुछ खास अंतर नहीं पड़ा।
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई तब उस पर भी इसी तरह का दबाव था। भाजपा ने कृषि क्षेत्र में निवेश के साथ किसानों की आय बढ़ाने का वादा करके सत्ता में पहुंची थी।
कांग्रेस के इतर भाजपा सरकार ने कर्जमाफी जैसे तात्कालिक एवं राजनीतिक कदम उठाने की बजाय कृषि क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के मूल पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास तो किया, लेकिन पिछले छह सालों में खाद्यान्न के दाम में छोटी-मोटी बढ़ोतरी के अलावा कोई गुणात्मक बदलाव नहीं कर पाई है, जिससे कृषि क्षेत्र में कोई क्रांति आ जाए।
किसानों की आय में बढ़ोतरी किए बगैर कोई भी राहत ऊंट के मुंह में जीरा से ज्यादा कुछ नहीं है। केवल कर्जमाफी, अनुदान या मूल्यों में आंशिक बढ़ोतरी के जरिए किसानों की आय को दोगुना किया जाना मुश्किल है। कृषि क्षेत्र की हालत बिना किसी बड़े निवेश के बदल पाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।
जब तक इस क्षेत्र को खाद्य प्रसंस्करण से जोड़कर किसानों को खुद अपने उत्पादन का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक कोई सकारात्मक बदलाव संभव नहीं है।
मात्र छह वर्षों में किसी बड़े चमत्कारिक बदलाव की उम्मीद तो नहीं की जा सकती है, लेकिन सही दिशा में सही तरीके से आगे बढ़ा जाए तो यह मुश्किल भी नहीं है। कृषि भी अन्य उद्योगों की तरह लाभ का सौदा बन सकता है।
मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में छोटे-छोटे कदमों के जरिए इस दिशा में बढ़ना शुरू किया, लेकिन दूसरे कार्यकाल में कृषि को लेकर बीते एक साल में कोई गंभीरता नजर नहीं आई है।
पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने फसलों की एमएसपी में बृद्धि, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, राष्ट्रीय कृषि बाजार, फसल बीमा योजना, मोर क्राप पर ड्रॉप तथा किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को लागू किया, इसमें वेयरहाउस और गोदामों की क्षमता वृद्धि जैसी बुनियादी उन्नयन भी शामिल हैं। परंतु इतने मात्र से कृषि क्षेत्र भारत की जीडीपी में बड़ा योगदान नहीं कर पाएगा।